अबयज़ ख़ान
पप्पा.. अब भी पहले जैसे ही थे.. दिन बदल गए थे.. पप्पा नहीं बदले। उम्र की थकान उनके चेहरे से ज़ाहिर हो जाती है। लेकिन बच्चों की ख़ातिर वो आज भी उफ़ तक नहीं करते। मेरे लिए दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा प्यारा है, तो मेरे पप्पा ही हैं। मां ने मुझे जन्म दिया है.. लेकिन पप्पा ने तो ज़िंदगी का ककहरा सिखाया है। एक हमारे पप्पा ही तो हैं, जिनके कंधो पर हम छोटी सी उम्र से ही ढेरों सपने संजो लेते हैं। होश संभालने के बाद पापा के सामने ही तो सबसे पहले हाथ फैलाया था। और पप्पा ने जेब से एक चवन्नी निकाल कर हाथ पर रख दी थी। उसके बाद तो ये सिलसिला सा चल निकला था। जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत होती.. पप्पा के पास पहुंच जाते। दुनिया की तमाम मुश्किलें आ जाएं.. बस फिक्र क्या करना.. आखिर मेरे पप्पा जो हैं। सुबह क्लीनिक जाने वाले पप्पा जब शाम को थके-हारे घर लौटते थे.. तब झट से उनकी गोदी में चढ़ जाते थे। निगाहें कुछ खोजती थीं... शायद पप्पा बाज़ार से कोई चीज़ लाए हैं। कुछ खाने की चीज़... और पप्पा अपने बच्चों के मन की बात समझ जाते थे... घर लौटते वक्त उनके हाथ में कुछ न कुछ ज़रूर होता था। और पप्पा का लाड़ तो पूछिए मत। उनका बस चलता.. तो आसमान से तारे भी तोड़कर ले आते। झुलसती गर्मी हो, कड़कड़ाती सर्दी हो, या फिर बरसात.. कड़ी धूप में मीलों का सफ़र... टपकती हुई किराए के घर की छत...दीवारों में सीलन.. तमाम दुश्वारियां सामने थीं.. लेकिन पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। उंगली पकड़कर साथ चलने वाले पप्पा हमारी खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे।

जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे.. पप्पा के सामने फ़रमाइशों की झोली बढ़ती जा रही थी। मुश्किलों के उस दौर में भी प्यारे पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। हमें पालने और पढ़ाने के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया। अपनी ऐशो-आराम की उम्र उन्होंने हमारा मुस्तकबिल बनाने में गुज़ार दी। वक्त के साथ हम बढ़े होने लगे। कभी पापा की उंगली पकड़कर चलने वाले हम अब उनके कंधे से उचकने की कोशिश करने लगे। हम ये सोचकर कितने खुश होते थे.. कि हम पप्पा से बड़े हो रहे हैं। बार-बार पप्पा के बराबर खड़े होकर उनकी लंबाई से ऊपर जाने की कोशिश करते। लेकिन पप्पा अपने बच्चों के बड़े होने पर हमसे भी ज्यादा खुश होते थे। बेशक उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं। फिर स्कूल से निकलकर कॉलेज का ज़माना आया। अब बारी थी.. घर से दूर दूसरे शहर में जाने की। लेकिन पप्पा अब भी खुश थे.. कि उनके बच्चे बड़े हो रहे हैं। लेकिन बच्चे तो अपनी ही दुनिया में मस्त थे। चवन्नी या एक रुपये से अब काम नहीं चलता था। अब पप्पा के सामने जेब खर्च की मोटी फ़रमाइश होती थी। फिर कॉलेज के बाद बारी आई नौकरी की। छोटे शहर से बड़े शहर का रुख हुआ। हम अब भी खुश थे.. बड़े शहर की चकाचौंध और नौकरी में पूरी तरह खो गए थे। पप्पा की गोद में सोने वाले अब पप्पा से मीलों दूर थे। पप्पा अब भी खुश थे.. लेकिन अब उनकी आंखे नम थीं.. क्योंकि बच्चे अब सचमुच बड़े हो गए थे... और उनसे बहुत दूर भी हो गए थे। और मेरे प्यारे पप्पा फिर से अकले हो गए।
अबयज़ ख़ान

ये ख़बर किसी का भी दिल दहला सकती है। हो सकता है इसको पढ़ने के बाद आपके रोएं भी खड़े हो जाएं.. लेकिन ये ख़बर एकदम सच है.. इसी ज़मीन पर एक मुल्क ऐसा भी है, जहां लोग मिनटों में एक हाथी को चट कर गए। सुनकर अटपटा लग रहा है न आपको.. लेकिन ये एकदम सच है.. इंसान ने हैवान का रूप इख्तियार कर एक हाथी को चट कर दिया। एक हुजूम देखते ही देखते विशालकाय हाथी को हज़म कर गया.. और किसी को डकार भी नहीं आई। छह हज़ार किलो का हाथी, डेढ़ घंटे से भी कम वक्त में ख़त्म हो गया.. देखते ही देखते हाथी की बोटी-बोटी कर दी गईं... और मैदान में कुछ बचा, तो सिर्फ़ हाथी का कंकाल..अगर आपको अब भी यकीन नहीं है, तो ये तस्वीरें देख लीजिए... जो इस कहानी को खुद-ब-खुद बयां कर रही हैं। क्योंकि तस्वीरें कभी झूठ नही बोलतीं...


हाथी का गोश्त खाने के शौकीन इन लोगों ने भालों और नुकीले हथियारों से उसका काम तमाम कर दिया। इन लोगों ने तो दरिंदगी की इंतिहा पार कर दी...जंगल में बीमारी से तड़प-तड़प कर हाथी मौत की नींद सो गया.. और उसे बचाने वाले हाथ उसकी मौत पर जश्न मनाने में जुटे थे। मामला जिम्बाब्वे के गोरालिज़ू नेशनल पार्क का है. जहां बीमारी की वजह से एक हाथी की मौत हो गई.. जैसे ही ये ख़बर इलाके में आम हुई.. एक हुजूम हाथी की तरफ़ उमड़ पड़ा... मरे हुए हाथी को देखते ही लोगों ने आव देखा न ताव.. भीड़ में जिसको भी मौका मिला.. वो हाथी का गोश्त खाने के लिए पागल हो गया... भूखी भीड़ मरे हुए हाथी पर टूट पड़ी। दरिंदगी की हद पार करते हुए लोगों ने उसकी बोटी-बोटी कर डाली... भूखे भेड़ियों की तरह लोगों ने उसके जिस्म से गोश्त के पारचे उतारना शुरु कर दिये। जिसको जो मिला, उसने मरे हुए हाथी पर वही आज़माया। तीर-तलवारों से लेकर छोटे-छोटे भालाओं तक, हाथी पर हर तरह के हथियार का इस्तेमाल किया गया... बच्चों से लेकर बड़े तक सब इस जश्न में शामिल थे...


गांव-गांव से लोग हाथी का गोश्त खाने के लिए उमड़ पड़े... हाथी के दोश्त की दावत आम हो गई... लोग बोरे और बर्तनों में भरकर गोश्त अपने घर ले गए.. लेकिन कुछ लोग तो ऐसे थे, जो हाथी के गोश्त को कच्चा ही चबा गए... गोश्त को झपटने के लिए हालत ये थी, कि लोग एक दूसरे से गुत्थमगुत्था भी हो गए... देखते ही देखते मिनटों में ही छह हज़ार किलो का हाथी कंकाल में बदल गया.. हालांकि इस घटना के बाद इंसान और जानवर में फर्क करना ज़रा मुश्किल हो रहा है... लेकिन इंसान अपना काम तमाम कर चुका था.. अब बारी जानवरों की थी... और इंसान के बाद वहां कुत्ते भी अपने लिए बोटी-हड्डी की तलाश में मंडराने लगे.. पापी पेट के लिए इंसान सचमुच हैवान बन गया.. एक मरे हुए हाथी के लिए इससे बुरा क्या होगा, कि उसकी मौत पर मातम मनाने के बजाए, लोग उसके मातम का जश्न मना रहे थे...
अबयज़ ख़ान
मां... मैंने कभी ख़ुदा की सूरत तो नहीं देखी..
मगर तेरे चेहरे में मुझे भगवान नज़र आता है..



मां जब मैंने इस दुनिया में आंखे खोली थीं... तो सबसे पहले तेरा ही चेहरा नज़र आया था.. तुम्हारे नाज़ुक हाथों में मेरी परवरिश हुई.. उंगली पकड़कर आपने ही तो मुझे चलना सिखाया था.. जब मैंने बोलना शुरु किया था, तो सबसे पहले मेरे मुंह से मां ही तो निकला था.. और तुम कैसे ख़ुशी से चहकी थीं... देखो-देखो.. उसने मुझे मां कहा है... घुटनों के बल चलते वक्त जब मुझे ज़रा सी ठेस लग जाती थी, तो कैसे तुम्हारा कलेजा छलनी हो जाता था.. जब मैंने होश संभाला, तब सबसे पहले तुमने ही मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था... उसके बाद स्कूल जाने से पहले तुमने ही तो मुझे घर में क ख ग घ सिखाया था... तुम मेरी मां के बाद मेरी पहली टीचर भी तो बनीं थीं... फिर जब मैं पापा की उंगली पकड़कर स्कूल जाने लगा, तो तुम सुबह सवेरे ही मेरे लिए उठ जाती थीं... पहले मुझे नहलाना-धुलाना, फिर जल्दी से नाश्ता बनाना.. मां तुम्हारे दिन की शुरुआत तो इसी के साथ ही होती थी...

जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा...फिर मेरी फ़रमाइशें बढ़ने लगीं... मेरे नख़रे बढ़ने लगे... मेरी शैतानियां बढ़ने लगीं.. लेकिन तुमने हमेशा किसी साए की तरह मेरा साथ निभाया... मैं बीमार हुआ, तुम रातों को भी मेरी ख़ातिर नहीं सोईं... मुझे दर्द हुआ.. तुम हमेशा मेरी ख़ातिर रोईं... लेकिन मेरी एहसानफ़रामोशी तो देखो...तुम्हारे खाने से लेकर तुम्हारी बातों तक हर किसी में मुझे ऐब निकालने की आदत थी.. लेकिन तुमने तो कभी उफ़ तक नहीं की... मैंने कितनी बार ज़िद की होगी तुमसे.. लेकिन तुम कभी ख़फ़ा भी तो नहीं होती थी... कितनी बार तुमसे झूठ भी बोला होगा.. लेकिन कभी मुझे सज़ा तक नहीं दी... मुझे अगर ज़ख्म हो जाए... तो मेरी मां की तो जान ही निकल जाती थी... मेरे स्कूल से देर हो जाने पर कैसे तुम बैचेन हो जाया करती थीं... जब पापा कभी मुझे डांटते थे, तो कैसे तुम मुझे अपने पीछे छिपा लिया करती थीं...

ज़िदगी की धूप में ख़ुद को खड़ा करने वाली मां, हर घड़ी सिर्फ़ मेरे लिए ही दुआ करती है...
मैं जब बड़ा हुआ तो स्कूल से कॉलेज जाने का वक्त आया.. लेकिन घर से बाहर जाने के बारे में सुनकर ही मां कैसे परेशान सी हो गई थीं.. उनके जिगर का टुकड़ा उनसे कहां रहेगा.. कैसे रहेगा.. उसे खाना कौन खिलाएगा, कौन उसके नख़रों को बर्दाश्त करेगा... लेकिन मुझे तो जाना था.. अब घर की दहलीज़ तो छूटना ही थी.. मां ने भी अपने बच्चे के बेहतर मुस्तकबिल के लिए दिल पर पत्थर रख लिया था... अब मां दूर हो गई थी... अब उससे बात करने के लिए एक फ़ोन का ही सहारा था... दूसरे शहर में अब मां की अहमियत का अंदाज़ा हुआ था... अब याद आती थी.. मां के हाथ की बनी खीर.. बचपन में उनके हाथ से सिले कपड़े.. घर के पीछे वाले पेड़ पर मां के हाथ का बनाया हुआ झूला.. गर्मी में आम का पन्ना.. सर्दियों में मां के हाथ का बुना हुआ स्वेटर.. अभी तो घर छूटा था... लेकिन मंज़िल तो किसी दूसरे शहर में थी...

पढ़ाई मुकम्मल होने के बाद अब तलाश थी नौकरी की... लेकिन अपने घर में नौकरी का कोई ज़रिया नहीं था... अब छोटे शहर से बड़े शहर की तरफ़ रूख़ करना मजबूरी थी... मां की आंखे नम नहीं थीं... बल्कि अब उनकी आंखों से ज़ार-ज़ार आंसू बह रहे थे.. बेटा अब बहुत दूर जा रहा था... जिगर का टुकड़ा अब शायद परदेसी होने वाला था... उसका दाना-पानी दूसरे शहर में ही लिखा था... अब घर नहीं छूटा था.. अब पापा के साथ मां भी छूट गई थी... घर से विदाई के वक्त पापा ने दिल को तसल्ली दे ली थी... लेकिन मां तो आख़िर मां थी... उसका लख़्ते-जिगर उसका नूरे-नज़र अब जा रहा था दूर-बहुत दूर... लेकिन एक बार फिर मां ने अपने अरमानों को जज़्ब कर लिया था... बेटा अब बड़े शहर में था.. लेकिन परदेस में वक्त ने सबकुछ बदल डाला था...

अब मां से सिर्फ़ फोन पर ही थोड़ी सी गुफ्तुगू होती है... अब मुनव्वर राना और निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लों में मां याद आती है... अब अकेले में तन्हाई में मां याद आती है... अब मां के हाथ की करेले की सब्ज़ी बहुत मीठी लगती है... अब मां घर लौटकर मां की गोद में न तो रोने का वक्त है और न ही मां की गोद में सोने का... अब मां बहुत दूर है... उस छोटे से गांव में जहां वो बेसन की रोटी पर देसी घी लगाती थी... जहां मिट्टी के चूल्हे पर आंखे जलाती है...जहां मेरी ख़ातिर अब भी वो पापा से लड़ जाती है... अब मां याद आती है... सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ, याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ। बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे, आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ। मां मुझे फिर से ले चलो उसी बचपन में जहां मेरी शैतानियां हों... और तुम्हारा ढेर सारा लाड़-प्यार... मेरा वादा है कि फिर मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगा.. कभी नहीं.. कभी नहीं... कभी नहीं...
अबयज़ ख़ान


मेरी किस्मत और मेरा चांद
मुझसे खेल रहे थे लुकाछिपी का खेल

मेरा चांद मेरे क़रीब आकर भी दूर हो जाता
और मेरी किस्मत मुझे ठेंगा दिखा जाती।

चौदहवीं की रौशनी में चमकने के बावजूद
नजूमी के पन्नों में दमकने के बावजूद

दूरियों का दायरा...
चांद और किस्मत के दरम्यान और बढ़ गया

और मैं फ़ैसला लेने में लाचार था
कि मेरी किस्मत बुलंद है
या मेरा चांद मेरी ज़िंदगी है

आख़िर ज़िंदगी के एक मोड़ पर
मेरा चांद बेज़िया होने लगा
और किस्मत ने लुकाछिपी के
इस खेल में मुझे मात दे दी।।
(बेज़िया मतलब डूबना)
अबयज़ ख़ान
बंसत निकल चुका था... हर तरफ फागुन की मस्ती छाई थी.. खेतों में गेंहूं की फसल कट चुकी थी... गन्ना भी खेतों से उठ चुका था... दिल्ली में बहुत दिन रहने के बाद अकेलेपन में घर की याद सताने लगी थी... मैंने दफ्तर से कुछ दिन की छुट्टी ली और अपने घर चला गया... घर दिल्ली से दो सौ किलोमीटर था, लेकिन अपना था... सफर काटना मुश्किल हो रहा था... मन कर रहा था, कि उड़ते हुए घर पहुंच जाऊं... घरवाले बहुत याद आ रहे थे... सात घंटे की थकान भरा सफ़र पूरा करने के बाद मैं घर पहुंचा, तो घर में सूने चेहरों पर मुस्कुराहट लौट आई थी.. मेरे जाने से मानों घर खिल चुका था... घरवाले भी जानते थे, कि मैं दो-या तीन दिन की छुट्टी पर ही आया हूं.. लेकिन उनके लिए इतना ही काफी था, कि मैं उनकी नज़रों के सामने हूं...नाते-रिश्तेदारों से मुलाकात के बाद मैंने अपने खेत पर जाने का फैसला किया... चाचा को साथ लेकर मैं जंगल में अपने खेत पर निकल गया... गन्ने की फसल पूरी तरह उठ चुकी थी... खेत की मेंडों पर चारों तरफ लिप्टिस और पॉपुलर के पेड़ लगा दिये गये थे.. लिप्टस के पेड़ तो अब छाया भी देने लगे थे... बाकी खेत में गन्ने की पेड़ी थी... बीच-बीच में मैंथा भी बो दिया गया था... खेत अपनी तारीफ अपने मुंह से कर रहा था..

मेरा मन किया कि अब वापस दिल्ली न जाकर यहीं रुक जाऊं... अब कौन है दिल्ली में.. किसके लिए वापस जाऊं... यहां तो सभी अपने हैं.. मां-बाप हैं.. भाई हैं.. अपना घर है... और सबसे बड़ी बात अपनापन है... कम से कम मां के हाथ का खाना तो मिलेगा... दिल्ली में ढंग से खाना भी नसीब नहीं होता... मां के हाथ का खाना खाए हुए तो महीनों बीत जाते हैं... शकरकंद की खीर खाए हुए तो कई साल हो गये... लेकिन इस बार घर पर मां से कहकर गन्ने के रस की खीर ज़रूर बनवाई थी.. बहुत मज़ा आया था उसे खाने में.. कई साल बाद गन्ने के रस की खीर खाने का मौका मिला था...मेरे दिल ने फिर कहा... अब दिल्ली लौटकर क्या करोगे... कोई नहीं है वहां तुम्हारा... सिवाए नौकरी के... वो भी मज़दूरों जैसी... न खाने का होश... न जीने का... लेकिन फिर कहीं मन में एक ख्याल आ जाता.. कि घर पर मैं करूंगा भी क्या... न कोई नौकरी.. न कोई कारोबार...

लेकिन मन ने कहा..नहीं..नहीं.. अभी नहीं... इतनी जल्दी नहीं... अभी कुछ दिन और देखता हूं... शायद कोई बात बन जाए... इसी उधेड़बुन में छुट्टी के तीन दिन कहां गुज़र गये... पता भी नहीं चला... ऐसा लगा जैसे हवा का एक झोका आया... और सबकुछ उड़ाकर ले गया... मां की आंखों में आंसू थे.. इन तीन दिन में उनसे दो लफ्ज़ ढंग से बाते भी नहीं हुई थीं.. वक्त तो जैसे तूफ़ान की तरह उड़ गया था...
दिल्ली के लिए रावनगी की तैयारी शुरु हो गई... इसी बीच मैंने मौका निकालकर पापा से कह ही दिया...

पापा.. अब दिल्ली में मन नहीं लगता.. वापस घर आने को दिल करता है..
हां... तो आ जाओ.. इसमें परेशानी क्या है...
परेशानी तो कोई नहीं है.. लेकिन मैं सोच रहा हूं, कुछ दिन नौकरी और कर लूं... फिर जल्द ही यहां वापस लौट आऊंगा...
कोई बात नहीं.. तुम अपना मन बना लो... फिर जब चाहें आ जाना.. यहां तो तुम्हारा घर है...
पापा की इतनी सी बात ने बड़ा सहारा दे दिया...

अनमने मन से घरवालों से विदाई लेकर दिल्ली के लिए रवानगी की... लेकिन घर से निकलते वक्त भी दिल कह रहा था, कि वापस मत जाओ.. वहां कौन है तुम्हारा... किसके लिए जा रहे हो.. लेकिन क्या करता.. नौकरी जो ठहरी...

फिज़ा भी मुखालिफ थी.. रास्ते मुख्तलिफ थे... हम कहां मुकाबिल थे.. सारा ज़माना मुख़ालिफ़ था..
अबयज़ ख़ान
अरे कहां हैं...आप..? आपके सपनों की कार अब आपसे विदा ले रही है... और आप खामोश हैं... पहले आपका स्कूटर आपसे विदा हुआ.. और अब आपकी कार... अरे वही कार जिसके लिए आपने अपनी जेब काटकर कुछ रुपये गुल्लक में जमा किया थे... वही कार जिसके लिए आपने अपना पुराना स्कूटर भी बेच दिया था... चार पहियों वाली छोटी सी वही कार, जिसे शोरूम से घर लाने के बाद आप सीना चौड़ाकर घूमते थे.. जिसके लिए, आपने आनन-फानन में आंगन के बाहर एक गैराज भी तैयार कराया था.. अरे भई कार आ रही है, तो गैराज क्यों नहीं होगा... वरना कार खड़ी कहां होगी... कार आने के बाद उसकी आवभगत में क्या जश्न हुआ था.. कार को देखने के लिए पूरा मोहल्ला जमा हो गया था.. मजाल क्या कोई बच्चा उसे छू तो ले... उस पर ज़रा सी खरोंच भी आ जाए तो उफ्फ़ जान ही निकल जाए.. वही कार जिसमें बैठकर आप अपने-अपनों को ही भूल जाते थे..

वही कार जिसने सोसाइटी में आपका स्टेटस सिंबल बढ़ा दिया था... अपने बीवी बच्चों के साथ आप जब उस कार में बैठते थे, तो शायद खुद को किसी लॉर्ड से कम नहीं समझते थे.. घर में सपनों की कार ने आपको बड़ा आदमी बनाया था, तो साथ में अदब और सलीका भी सिखाया था... कपड़े पहनने का सलीका सिखाया था.. अब कार में बैठने के लिए क्रीज़ वाले ही कपड़े पहने जाते थे.. कार ज़रा सी गंदी हो जाए, तो फिर क्या.. पूरा घर मिलकर उसकी धुलाई-सफ़ाई में लग जाता था.. कार ने ज़रा सी खिचखिच क्या की, बस ज़रा देर में ही पहुंच गई गैराज... उसके नाज़-नखरे उठाने के लिए पूरा घर लग जाता था.. बात-बात में आप कहीं जाने के बहाने ढूंढते थे, ताकि कार को गैराज से निकालकर कहीं तफ़रीह ही कर आएं.. कार में बैठने के बाद रूतबा ऐसा बढ़ा था, कि अब नु्क्कड़ की चाय पीने के बजाए रेस्त्रां में बैठकर गप्पें नोश फ़रमाई जाती थीं... कहीं बाहर खाना खाने के बहाने ढूंढे जाते थे... बेगम और बच्चों के साथ गर्मियों की छु्ट्टियों में पहाड़ पर जाने के प्रोग्राम बनते थे..

इधर छुटिटयों का ऐलान हुआ, उधर पूरा घर जुट गया तैयारियों में... पीछे डिग्गी में भरा ढेर सारा सामान.. और चल दिये मंज़िल की ओर... और कार बेफिक्र हर कहीं आपके साथ जाने को तैयार.. हरदम तैयार... बस स्टार्ट करने की देर है.. और लो जी चल पड़ी अपनी मंज़िल की तरफ़... फिर चाहें कैसी ही सड़क हो.. सड़क ऊबड़-खाबड़ हो या फिर उसमें गड्ढे हों...पथरीली हो, या फिर पहाड़ की चढ़ाई, बेचारी ने उफ़्फ तक नहीं की... कार में चलने के बाद आपकी शाहखर्ची भी बढ़ गई थी.. भले ही पैसे से आप अमीर न बने हों, लेकिन कार ने आपका रूतबा तो ज़रूर बढ़ाया था... अब आप सादा फिल्टर के बजाए सिगार पीने लगे थे.. यार दोस्तों में कार की शानदार सवारी के किस्से बार-बार सुनाए जाते थे... आपकी बेगम मोहल्ले भर की औरतों को कार के किस्से-कहानियां सुनाती थीं.. और आपके पप्पू की तो पूछिए ही मत.. स्कूल में सब बच्चे अब पप्पू से दोस्ती करना चाहते थे, ताकि किसी बहाने पप्पू की कार में चड्डू खाने को मिल जाए.. चड्डू न सही कम से कम कार तो देखने को मिल ही जाएगी...

वक्त का पहिया घूमा तो मारूति ने मिडिल क्लास से निकलकर गरीब आदमी के घर में कदम रखा... सेकेंड हेंड मारूति के चलन ने उन लोगों को भी कार वाला बना दिया, जो खुद को 'बे'कार समझते थे... कार ने आम आदमी का इतना ख्याल रखा, कि 20 से 50 हज़ार की हैसियत वाले भी मारूति 800 की बदौलत कार वाले हो गए... लेकिन अब आप बड़े आदमी हो गए, तो उस छोटी सी कार को भला क्यों याद रखेंगे... वक्त के साथ आपके सपने भी बड़े होने लगे हैं... अब मारूति को छोड़कर आप लक्ज़री कार में सवार हो चुके हैं... अब आपको अपनी कार का शीशा हाथ से ऊपर चढ़ाने की ज़रूरत नहीं हैं... अब आपकी गाड़ी में सब कुछ ऑटोमेटिक है... बड़ी कार के साथ रूतबा और भी बढ़ा हो गया है...अब आप ऐसी की ठंडी हवा में लक्ज़री कार की सवारी का लुत्फ़ लेते हैं..देश की बड़ी आबादी को कार वाला बनाने वाली मारूति 800 जा रही है... कभी न लौटकर आने के लिए.. लेकिन आपको क्या.. आपकी बला से...

26 साल का लंबा अरसा तय करने के बाद मारूति कंपनी ने उस कार को बंद करने का फैसला किया है, जो हिंदुस्तान के मिडिल क्लास के परिवार को ढोती थी...जो किसी वक्त में हिंदुस्तान के सुखी परिवार का स्टेट्स सिंबल बन चुकी थी.. 14 दिसंबर 1983 को जब इंदिरा गांधी ने इसे गुड़गांव से लॉंच किया था, तो कार बाज़ार में तहलका मच गया था... हालांकि भारत में उस वक्त कुछ गिनी-चुनी ही कारें थीं.. और वो भी अमीरों के शौक में शामिल थीं... मिडिल क्लास तो तब कार के बारे में सोच भी नहीं सकता था.. मारूति से सिर्फ़ खानदान ही नहीं जुड़े थे, बल्कि इस कार के साथ जज़्बात जुड़े थे... 26 बरस में मारूति ने करीब 28 लाख से ज्यादा 800 मॉडल की कारें बेचीं.. लेकिन आज वही कंपनी कह रही है, कि हम भावनाओं को हावी नहीं होने देते.. देश में ख़तरनाक होती आबोहवा के लिए अब इस बेचारी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है... लेकिन कोई ये नहीं कहता कि सड़कों पर दनानदन दौड़ रही कारें भी तो इसके लिए ज़िम्मेदार हैं... फिर बेचारी अकेली मारूति 800 पर ही तोहमत क्यों..? कंपनी ने बाकी सभी कारों को यूरो-4 पर अपग्रेड कर लिया है, और मिडिल क्लास के बाद आम आदमी की इस कार पर किसी को ज़रा भी तरस नहीं खाया...
अबयज़ ख़ान
इस बार ब्लॉग की पोस्ट बिल्कुल ही अलग सी है.. इस बार कलम नहीं सिर्फ तस्वीरें बोलेंगी... देखने में भले ही ये तस्वीरें मामूली सी हों... लेकिन इनके पीछे कई सदियां छिपी हुई हैं.. इन तस्वीरों में जीकर तमाम पीढ़ियां गुज़र गईं... ये तस्वीरें बेशक गुजरे ज़माने की दास्तान बयान करती हों... लेकिन इन तस्वीरों के पीछे फोटोग्राफी की कई दास्तानें छिपी हैं... एक दौर छिपा है, जिसकी कहानियां हम आज की पीढ़ी को सुनाते हैं.. ये तस्वीरें गुज़रा ज़माना याद कराती हैं.. तो बचपन के दिनों को याद कराकर आंखों को भी नम कर देती हैं...

अब ज़रा चाची की इस इस तस्वीर को ही गौर से देख लीजिए... फोटो खिंचवाने का ये भी एक अनूठा ही शौक था.. फोटो स्टूडियो में नकली मोटरसाईकिल पर बैठकर फोटो खिंचवाने का भी अपना ही अलग मज़ा था... और पीछे सवारी भी बैठी हो, फिर तो क्या कहने... क्यों जी कुछ याद आया.. आंटी जी की इस तस्वीर को देखकर.. घर के पास वाले मेलों में तो अपने भी ऐसी तस्वीरे ज़रूर खिंचवाई होगी...

चलिए अब एक और तस्वीर से आपको रूबरू कराते हैं.. 80 से 90 के दौरान अगर आपकी शादी हुई होगी, तो अपनी बेगम के साथ आपने भी तस्वीर तो ज़रूर खिंचवाई होगी.. क्या कमाल के फोटग्राफर हुआ करते थे... आपके इशारे से पहले ही समझ जाते थे, कि आपको ऐसी तस्वीर चाहिए, जिससे ये साबित हो जाए, कि आप उसके लिए चांद ही तोड़कर ले आए.. ढूंढिए अपने घर में भी कोई ऐसी तस्वीर...चांद में से झांकते शौहर जनाब अपनी बीवी को दिलासा दिला रहे हैं कि बेगम मान भी जाओ.. असली न सही, कम से कम आपके लिए चांद तो ले ही आया.. लेकिन बेगम हैं कि फोटो में भी रूठी-रूठी नज़र आती हैं.. तस्वीर में चांद भी है, दिल भी है, लेकिन दिलरुबा रूठी-रूठी सी है.. इंडियन फोटोग्राफी का पूरा कमाल है.. लेकिन कमाल ये है कि बेगम हैं कि मानती ही नहीं.. कुछ याद करिए.. आपने भी ऐसी तस्वीर ज़रूर बनवाई होगी.. तो निकालिए अपनी एलबम और गुज़रे ज़माने को भी ज़रा याद कर लीजिए..

अब एक तस्वीर यारबाज़ों के लिए.. ये उनके लिए जिन्हें काम के बाद यारी का बड़ा शौक था.. दोस्तों के साथ घूमने जाने के बहाने ढूंढते थे... और बात-बात पर पहुंच जाते थे फोटोग्राफर भाईसाहब के पास.. नए-नए कपड़ों और सूटबूट में सजधजकर पहुंच गए तस्वीर खिंचवाने.. लेकिन वो तस्वीर ही क्या जिसमें टशन न हो.. जिसमें अदा न हो.. दोस्तों का साथ हो और एक्टिंग न हो, तो फिर क्या कहने.. फोटोग्राफर की दुकान पर अदा दिखाने का पूरा सामान मौजूद होता था.. बस फिर क्या था.. हाथ में पकड़ा टेलीफोन और पीछे टेलिविज़न.. बगल में खड़े हो गए साथी.. क्या कमाल की पिक्चर होती थी.. पीछे पहाड़ों का नज़ारा, कुर्सी पर बैठकर बन गये लाट साहब.. फोटोग्राफर ने कहा स्माइल प्लीज़... और लो जी खिंच गई तस्वीर... अपने यार दोस्तों के साथ तो आपने भी ज़रूर खिंचवाई होगी ऐसी तस्वीर.. क्यों जी याद आए दोस्तों के साथ कुछ पुराने दिन..यारबाज़ी के दिन...

ये तस्वीर देखकर आपको हंसी तो आ रही होगी, लेकिन हंसियेगा मत.. कभी न कभी तो आपने भी किसी के साथ ऐसी तस्वीर खिंचवाई होगी.. रानी मुखर्जी न सही, प्रीती जिन्टा ही सही.. कुछ नहीं तो माधुरी के साथ ही.. आपके दिल ने भी धक-धक तो किया ही होगा... अरे क्या हुआ असली न सही.. तो उसकी तस्वीर ही सही... कम से कम तस्वीर ने तसव्वुर करने को कब मना किया है... पीछे पहाड़ों का खूबसूरत नज़ारा और बगल में रानी मुखर्जी हो.. तो किस कमबख्त का मन नहीं करेगा...एक अदद तस्वीर बनवाने के लिए... बस रानी मुखर्जी की कमर में डाल दिया हाथ.. कौन सा रानी मुखर्जी मना कर रही है.. और फिर वैसे भी फोटोग्राफर तो पूरे ही पैसे लेगा.. और फिर जब मौका मिल रहा है, तो क्यों न कैश करा लिया जाए... मेला भी याद रहेगा.. और मेले में खिंचवाई तस्वीर भी..तस्वीरें भले ही पुराने दौर की हों... लेकिन एक दौर को याद करा गईं... कुछ भूला-बिसरा वक्त..