अबयज़ ख़ान


मोबाइल मनचलों को राहत की सांस देता है
उदास दिलों को मैसेज की आस देता है
सब्र इस बात का है कि जब सो जाते हैं सब घरवाले
मोबाइल माशूका के पास होता है।
अब पड़ोसी की छत पर जाना
और मुन्ने का ख़त पहुंचाना
कितनी पुरानी बात है..
अब तो एक घंटी में दिलरुबा दिल के पास है।
अच्छी बात ये है कि पकड़े जाने का भी डर नहीं
ढूंढता रहे आपको लड़की का भाई
या अब्बा..
मोबाइल में न सतीश होगा
न सलीम होगा
न किशन न जयकिशन होगा.।
आपका नाम या तो लल्लू होगा
या फिर उल्लू होगा..
लेकिन दोस्त उल्लू नाम सुनकर उदास मत होना
सनम को इसका दोष मत देना
उसकी फ़ोन बुक में कई पप्पू भी होंगे
कई उल्लू होंगे, उल्लू के पट्ठे भी होंगे।।
एक गर्लफ्रेंड पर 4 ब्वॉयफ्रेड का चलन तो पुराना है
फिर ये तो मोबाइल प्यार का ज़माना है
यहां रॉन्ग नंबर से पहचान होती है
फिर फ़ोन से जान और क़रीब होती है।
बातचीत से बढ़ती हैं नज़दीकियां
लेकिन इस प्यार में न बेक़रारी होती है
न मज़ेदारी होती है...
अब न इसरार होता है
न इक़रार होता है..
इज़हार की बात तो छोड़ दीजिए..
बैटरी के साथ प्यार वीक होता जाता है...
वेलेडिटी के साथ टल्कटाइम ख़त्म हो जाता है..
और सिम बदलने के साथ मोबाइल से प्यार डिलीट हो जाता है।।
अबयज़ ख़ान

अदालत में अजीब मुकदमा
गवाह भी बकरी
और सबूत भी बकरी


मामला समझ से थोड़ा परे चला जाता है लेकिन यही है इस मुकदमे की हकीकत...एक बकरी के मालिकाना हक के लिए चला ऐसा केस जिसमें फैसला भी बकरी की गवाही से ही हुआ
दरअसल इस अजब गजब मुकदमे की शुरुआत हुई एक बकरी पर हुए विवाद से...

खंडवा के अकबर ने गजराज नाम के एक शख्स से 3700 रुपए में एक बकरा खरीदा था...लेकिन जब अकबर इस बकरे को बेचने के लिए बाज़ार में गया तो विनोद बारेला नाम के एक शख्स ने बकरे पर अपना मालिकाना हक जता दिया
विनोद के इल्जाम के मुताबिक अकबर का बकरा दरअसल उसका था जो चार दिन पहले गुम हो गया था...और इसी वजह से विनोद ने अकबर और गजराज के खिलाफ चोरी का मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था
जिसके बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को पकड़ लिया था
बकरी चोरी का इल्जाम लगते ही अकबर सकते में आ गया...क्योंकि ये साबित करना बहुत मुश्किल था कि बकरा उसका है और उसने बकरा चोरी नहीं किया था...खुद को बचाने के लिए अकबर ने कोर्ट की शरण ली औऱ फिर शुरु हुआ ये अजीबोगरीब मुकदमा



तस्वीरें उसी वक्त की हैं जब दोनों पक्षों के साथ बकरियों और बकरे को कोर्ट में पेश किया गया था...इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कैसे ये तीनों कोर्ट के सामने खड़े हैं...इस अजीबोगरीब मुकदमे को देखने के लिए लोगों की भीड़ भी मौजूद थी....

अदालत के सामने दोनों पक्ष दो बकरियों को लेकर आए औऱ दोनों का दावा था कि उनके पास विवादित बकरे की असली मां थी
मामला पेचीदा था औऱ मुश्किल भी...विवादित बकरा काले  रंग का था और जिन बकरियों को मां बताने का दावा किया जा रहा था वो दोनों भी काली थीं...जज साहब के लिए भी फैसला देना आसान नहीं था...



इस मुश्किल से निकलने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला गया...बकरे को दोनों बकरियों के साथ छोड़ देने का फैसला किया गया और माना गया कि बकरा जिस बकरी के पास चला जाएगा वही उसकी मां है और उसी का मालिक बकरे का असली मालिक होगा
और फिर मुकदमा आगे बढ़ा.,..देखिए कैसे इन दोनों बकरियों के पास इस बकरे को छोड़ दिया गया है...हर कोई सांसें थामें इस मंजर को देख रहा था...क्योंकि लोग इस नायाब मुकदमे का नतीजा जानना चाह रहे थे...और फिर आखिरकार वो लम्हा आ ही गया जब बकरे ने अपनी मां को पहचान लिया...देखिए कैसे ये छोटा बकरा धीरे धीरे चलते हुए अपनी असली मां के पास चला गया...

जिस बकरी के पास ये बकरा गया था वो गजराज की थी जिसने अकबर को बकरा बेचा था...और ये देखने के बाद कोर्ट ने फैसला सुना दिया कि अकबर ही बकरे का असली मालिक है और गजराज ने अकबर को बकरा बेचा था ना कि चुराया था
एक बकरी के जरिए चोरी के मुकदमे का फैसला...इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ हो...लेकिन खंडवा की अदालत के इस फैसले ने दो बेगुनाहों को सजा मिलने से बचा लिया खंडवा के लोगों के लिए ये अनोखा केस था लेकिन अदालत और जज की सूझबूझ ने इस अजीब से दिख रहे केस को भी सुलझा दिया
अबयज़ ख़ान
पापा आज आप बहुत याद आ रहे हो, बहुत याद आ रही है। आपके बिना जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई है। मेरे पापा की एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूं... और कुछ लिखने की हिम्मत नहीं है।
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कुछ इस तरह से हमने गुजारी किसी के साथ
जैसे के अजनबी हो कोई अजनबी के साथ

कैसा मज़ाक था, ये मेरी जिंदगी के साथ
जलता गया वजूद मेरा, रौशनी के साथ

कुछ दोस्ती के साथ हैं, कुछ दुश्मनी के साथ
रिश्ते बड़े अजीब हैं, तेरी गली के साथ

उसने भी हमसे प्यार किया था, हजार बार
दिल की लगी के साथ नहीं, दिल्लगी के साथ

उसके सितम का कोई भी पहलू बुरा नहीं
तरके-ताल्लुकात भी हैं सादगी के साथ

ए दिल बड़ा अजीब है अपना भी मामला
जीना उसी के साथ है, मरना उसी के साथ

'क़ासिम' तेरे ख्याले परेशां का क्या हुआ
क्यों तूने उसको छोड़ दिया बेदिली के साथ

अबयज़ ख़ान
जून का तीसरा इतवार... दुनियाभर केबच्चों के लिए फादर्स डे.. लेकिन इसी जून की पहली तारीख मेरे पप्पा को मुझसे छीनकर ले गई। एकपल को ऐसा लगा जैसे सबकुछ ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। ऐसा लगा जैसे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। शायद मेरे घर को किसी की नज़र लग गई.. हमेशा मुस्कुराने वाले मेरे पप्पा बड़े चुपके से हमें छोड़कर चलते बने। ग़म तो यह कि हमसे कुछ कहा भी नहीं। मेरे प्यारे पप्पा जब मेरे सिर सेहरा सजाने का ख्वाब देख रहे थे, तभी मौत आई और ज़िंदगी को धोखा देकर पप्पा को मुझसे छीनकर ले गई। पिछले साल फादर्स डे पर अपने पप्पा के लिए मैने चंद लाइनें लिखी थीं.. ऐसा लग रहा है जैसे एक-एक लाइन दिल को चीरकर रख देगी। पप्पा अगर कोई ख़ता हो गई हो, तो उसे माफ कर देना।

पप्पा.. अब भी पहले जैसे ही थे.. दिन बदल गए थे.. पप्पा नहीं बदले। उम्र की थकान उनके चेहरे से ज़ाहिर हो जाती थी। लेकिन बच्चों की ख़ातिर वो आज भी उफ़ तक नहीं करते थे। मेरे लिए दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा प्यारा था, तो मेरे पप्पा। मां ने मुझे जन्म दिया है.. लेकिन पप्पा ने तो ज़िंदगी का ककहरा सिखाया था। एक हमारे पप्पा ही तो थे जिनके कंधो पर हमने छोटी सी उम्र से ही ढेरों सपने संजो लिए थे।होश संभालने के बाद पापा के सामने ही तो सबसे पहले हाथ फैलाया था। और पप्पा ने जेब से एक चवन्नी निकाल कर हाथ पर रख दी थी। उसके बाद तो ये सिलसिला सा चल निकला था। जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत होती.. पप्पा के पास पहुंच जाते। दुनिया की तमाम मुश्किलें आ जाएं.. बस फिक्र क्या करना.. आखिर मेरे पप्पा जो थे। सुबह क्लीनिक जाने वाले पप्पा जब शाम को थके-हारे घर लौटते थे.. तब झट से उनकी गोदी में चढ़ जाते थे। निगाहें कुछ खोजती थीं... शायद पप्पा बाज़ार से कोई चीज़ लाए हैं। कुछ खाने की चीज़... और पप्पा अपने बच्चों के मन की बात समझ जाते थे... घर लौटते वक्त उनके हाथ में कुछ न कुछ ज़रूर होता था। पप्पा का लाड़ तो पूछिए मत। उनका बस चलता.. तो आसमान से तारे भी तोड़कर ले आते। झुलसती गर्मी हो, कड़कड़ाती सर्दी हो, या फिर बरसात.. कड़ी धूप में मीलों का सफ़र... टपकती हुई किराए के घर की छत...दीवारों में सीलन.. तमाम दुश्वारियां सामने थीं.. लेकिन पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। उंगली पकड़कर साथ चलने वाले पप्पा हमारी खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे।


जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे.. पप्पा के सामने फ़रमाइशों की झोली बढ़ती जा रही थी। मुश्किलों के उस दौर में भी प्यारे पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। हमें पालने और पढ़ाने के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया। अपनी ऐशो-आराम की उम्र उन्होंने हमारा मुस्तकबिल बनाने में गुज़ार दी। वक्त के साथ हम बढ़े होने लगे। कभी पापा की उंगली पकड़कर चलने वाले हम अब उनके कंधे से उचकने की कोशिश करने लगे। हम ये सोचकर कितने खुश होते थे.. कि हम पप्पा से बड़े हो रहे हैं। बार-बार पप्पा के बराबर खड़े होकर उनकी लंबाई से ऊपर जाने की कोशिश करते। लेकिन पप्पा अपने बच्चों के बड़े होने पर हमसे भी ज्यादा खुश होते थे। बेशक उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं। फिर स्कूल से निकलकर कॉलेज का ज़माना आया। अब बारी थी.. घर से दूर दूसरे शहर में जाने की। लेकिन पप्पा अब भी खुश थे.. कि उनके बच्चे बड़े हो रहे हैं। लेकिन बच्चे तो अपनी ही दुनिया में मस्त थे। चवन्नी या एक रुपये से अब काम नहीं चलता था। अब पप्पा के सामने जेब खर्च की मोटी फ़रमाइश होती थी। फिर कॉलेज के बाद बारी आई नौकरी की। छोटे शहर से बड़े शहर का रुख हुआ। हम अब भी खुश थे.. बड़े शहर की चकाचौंध और नौकरी में पूरी तरह खो गए थे। पप्पा की गोद में सोने वाले अब पप्पा से मीलों दूर थे। पप्पा अब भी खुश थे.. लेकिन अब उनकी आंखे नम थीं.. क्योंकि बच्चे अब सचमुच बड़े हो गए थे... और उनसे बहुत दूर भी हो गए थे। और मेरे प्यारे पप्पा फिर से अकले हो गए।

अबयज़ ख़ान
इस तस्वीर को देखकर कुछ याद आया आपको... बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर में इसका भी बड़ा योगदान है। छोटा परिवार, सुखी परिवार.. लड़का हो या लड़की बच्चे दो ही अच्छे... दो बच्चों के बाद बस करो.. नसबंदी कराओ गर्व से जियो... गाड़ियों से लेकर मौहल्ले भर की दीवारें इन नारों से पटी रहती थीं.. घर के छोटे बच्चे बिना कोई मतलब समझे इन्हें पढ़ते, और फिर घर में जाकर वहीं बात दोहराते। मां-बाप अगर बच्चों को अपने साथ लेकर बाहर जाते, तो उनको अपने पीछे छुपा लेते, कि कहीं बच्चे दीवार पर लिखे परिवार नियोजन के विज्ञापन को न पढ़ लें। 60 बरस हो गए देश को, सरकार के नारे पानी में बह गए और आबादी का विस्फोट जारी रहा। तस्वीर देखनी हो, तो सिर्फ दिल्ली दर्शन कर लीजिए। पैर रखने की जगह नहीं है इस शहर में। आबादी तकरीबन 1 करोड़ 50 लाख से भी ज्यादा। दिल्ली में तो इंसानों के साथ-साथ गाड़ियां भी इतनी हो गई हैं.. कि सड़क पर पैर रखना भी मुश्किल हो गया है। भला हो मेट्रो का.. लेकिन वो बेचारी भी क्या करे.. रोज़ बढ़ती जा रही इस आबादी के बोझ से कैसे निपटे।

अब ज़रा देश के हाल पर भी नज़र डाल लीजिए। 2009 में भारत की आबादी 119 करोड़ 80 लाख दर्ज की गई। 18 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यूपी ब्राज़ील के बराबर पहुंच गया है। आबादी महामानव की तरफ मुंह फैलाए खड़ी है.. खाने वाले ज्यादा हो गए हैं... उपज कम हो रही है, नतीजा महंगाई ने आम इँसान की नाक में नकेल डाल दी है। और शरद पवार को भी बहाना बनाने का एक और मौका मिल गया। लेकिन आबादी पर ब्रेक लगाने के मामले में सभी चुप हैं। सरकार की तमाम कोशिशें फेल हो गईं.. लेकिन पिछले दिनों दो बड़ी मस्त ख़बरें आईं...

पहली ख़बर भोपाल से आई...
-300 से ज्यादा नसबंदी कराने वाले व्यक्ति को परिवार कल्याण कार्यक्रम में सक्रिय योगदान देने के लिए नैनो कार दी जाएगी।
-200 अथवा उससे ज्यादा नसबंदी के आपरेशन कराने वाले व्यक्ति को मोपेड बतौर पुरस्कार में दी जाएगी। खास बात ये है कि भोपाल में इस सुनहरी घोषणा का ऐलान खुद वहां के कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने गांधी मेडिकल कालेज में किया था। अब कलेक्टर साहब को कौन बताए कि एक नैनो के लिए कोई भला 300 शिकार कहां से फांसकर लाएगा। वो भी सिर्फ नैनो के लिए.. इससे तो वो 3000 रुपये महीने की आसान किस्त पर वैसे ही नैनो ख़रीद लेगा। और भला 200 नसबंदी के लिए कौन भला मोपेड लेगा। अब सरकार को कौन बताए, कि आजकल मोपेड का नहीं, फर्राटेदार बाइक का ज़माना है। हां अब कोई नैनो के लिए काग़ज़ों में ही 300 शिकार फांस ले, तो अलग बात है।
दूसरी ख़बर भी मध्य प्रदेश से ही आई..
ख़बर सागर ज़िले से थी, जहां के कलेक्टर ने ऐलान किया कि अगर कोई 5 या उससे ज्यादा लोगों को नसबंदी के लिए प्रेरित करे, तो उसे बंदूक का लाइसेंस मिलेगा। जो लोग खुद से भी नसबंदी के लिए आएंगे उनको भी बंदूक के लाइसेंस में प्राथमिकता मिलेगी। इस ख़बर पर मेरे एक दोस्त ने ठहाका लगाया, कि ''भईया.. जब नसबंदी ही करा लेगा तो बंदूक से खाक निशाना लगाएगा और फिर अब शिकार करेगा भी तो किसका...''

नसबंदी वालों को इनाम का सरकारी ऐलान पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी नसबंदी कराने वालों को कभी कैश, तो कभी कुछ और छोटे-मोटे इनाम का लालच देकर नसबंदी कराई जाती थी.. इन छोटे-मोटे इनामों का फायदा छोटे-मोटे दलाल टाइप के लोग खूब उठाते थे। इनाम के लालच में कईयों की तो जबरन नसबंदी करा दी जाती थी। कई तो ऐसे लोग भी जाल में फंस जाते थे, जिनकी पहले ही नस बंद हो चुकी थी। नसबंदी के इनाम के लालच में कई बुढ्ढे भी इस जाल में फांस लिये जाते थे। इस चक्कर में कई ऐसे लोग भी शिकार हो जोते थे, जिनकी ज़िंदगी फुटपाथ पर बसर होती थी। अख़बारों में ख़बरें छपतीं, लेकिन कुछ दिन हो-हल्ला मचने के बाद सबकुछ शांत हो जाता था।

समझ नहीं आता कि सरकार आखिर ऐसी बेकार की स्कीमें बनाती क्यों है। क्या देश की आबादी पर लगाम लगाने के लिए यही एक सबसे अच्छा तरीका है। सरकार में हिम्मत है, तो कानून बनाए। 2 बच्चों के बाद कानूनन रोक लगाए। लेकिन ऐसा सरकार भला कैसे कर सकती है। ऐसा हुआ, तो नेताओं को वोट कैसे मिलेंगे। जब संसद में बैठे नेता ही 10-10 बच्चों के बाप होंगे, तो फिर देश की जनता का क्या कसूर। ये तो वही बात हो गई, कि शराब और सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उसके बाद भी सरकार उसकी बिक्री पर रोक नहीं लगाती, क्योंकि उससे सरकार के ख़ज़ाने में सबसे ज्यादा पैसा आता है। ऐ हिंदुस्तान तेरे हाल पर रोना आया।
अबयज़ ख़ान
जंगल में आग लगी.. चारों तरफ़ हाहाकार मचा था.. आग की लपटें आसमान को छू रही थीं। जंगल से निकलकर धुआं बस्ती की फिज़ा में दम घोंटने लगा। आग इतनी भयानक हो चुकी थी, मानो पल भर में ही जंगल को राख कर देगी। तपिश ऐसी कि वहां एक पल भी रुकना नामुमकिन हो चुका था। बेबस जानवर जंगल से जानवर शहर की तरफ भाग रहे थे। जिंदगी बचाने के लिए उनके पास इसके सिवा शायद कोई ज़रिया नहीं था। चंद आतिश परस्तों ने कुछ रंग-बिरंगे काग़ज़ के टुकड़ों के लिए हरे-भरे जंगल को आग के हवाले कर दिया था।

बेज़ुबान जानवर बेबस थे.. उनका घर जल रहा था.. लेकिन कोई आग बुझाने वाला नहीं था। जानवरों की बस्ती में कुछ आतिशी इंसानों ने शोलों को हवा दे दी थी। कुछ बेज़ुबान तो इस आग में जलकर खाक हो गए, तो कुछ दम घुटने से ही इस दुनिया से रुखसत हो गए। जंगल जल रहा था, लेकिन पास की इंसानी बस्ती में किसी को भी अपना फर्ज़ याद नहीं आया.. जंगल से निकलकर जानवर बस्ती में पहुंचने लगे.. तो तमाशबीनों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया.. किसी ने दौड़ा-दौड़ाकर शेर को मार डाला.. तो कोई हाथियों पर पत्थरों की बरसात करने लगा।

अपना घर छोड़कर बेघर हुए इन जानवरों की सुध लेने वाला कोई नहीं था। शहर में इंसानी भेष में जानवर थे.. जो उनकी हालत पर तरस खाने के बजाए बेज़ुबानों पर ज़ुल्म कर रहे थे। इधर जंगल में आग भड़कती ही जा रही थी। मीलों में फैला जंगल आहिस्ता-आहिस्ता आग के आगोश में समाता जा रहा था। लेकिन किसी में इतनी ताकत नहीं थी, जो उस जंगल को आग से बचा ले। जंगल में बड़े से पीपल के पेड़ पर एक चिड़िया भी रहती थी.. इस आग में उसका घर भी छूटने वाला था... उसकी आंखो में आंसू थे.. उसे गम था अपना आशियाना छिन जाने का।

लेकिन चिड़िया से जंगल की आग देखी न गई। अचानक वो घोंसले से बाहर आई और कुछ दूर एक छोटे से तालाब पर पहुंची, वहां से उसने अपनी चोंच में दो बूंद पानी लिया, और लाकर उसे जंगल के ऊपर छिड़क दिया। इसके बाद वो फिर तालाब पर गई, दो बूंद पानी लाई और उसे जंगल पर छिड़क दिया। इसी तरह उसने दस-बारह बार किया। जब वो ऐसा करके थक गई तो अपने घोंसले में बैठकर सुस्ताने लगी। तभी सामने वाले पेड़ पर मौजूद अजगर ने उसकी तरफ देखा और बोला तुझे क्या लगता था, कि तेरी चोंच में पानी लाने से जंगल की आग बुझ जाएगी। तू क्यूं इतनी मेहनत कर रही थी। चिड़िया ने जवाब दिया। मैं भी जानती हूं कि मेरे चोंच में पानी लाने से जंगल की आग नहीं बुझने वाली। लेकिन कल जब इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा, तो मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बल्कि आग बुझाने वाले में लिखा जाएगा।
अबयज़ ख़ान
सभी दोस्तों से ये पुरखुलूस गुज़ारिश है, कि एक बार इस ग़ज़ल को पढ़ने की ज़हमत ज़रूर करें। बड़े अरसे बाद क़लम उठाई है, शायद ग़लतियां भी बहुत हों। ग़ज़ल कभी बहुत ज्यादा लिखी नहीं। कभी-कभार काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ उकेरने की गुस्ताखियां की हैं। इस बार भी शायद कुछ ऐसा ही है। लिखने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन किसी पैमाने पर उतरने वाली ग़ज़ल बन नहीं पाई। मीटर और पैरामीटर से अपना दूर तक भी वास्ता नहीं है। लिहाज़ा उसके लिए तो ज़रूर माफ़ करें। अगर आपको पसंद आ जाए तो इस अदीब की इसलाह ज़रूर करें।


जब से उसकी टेढ़ी नज़र हो गई।
दोस्तों जिंदगी दर-बदर हो गई।।

वो क्या गए हमसे रूठकर यारों।
महफिले और मुख़्तसर हो गईं।।

नफ़रतों के दायरे जब से बढ़ने लगे।
दिल की गलियां भी और तंग हो गईं।।

संगदिल के संग रहना ही ज़ेरेनसीब था।
जीती बाज़ी हारना अब किस्मत हो गई।।

उजले लिबास में लोग दिल के काले हैं।
मसीहाओं की अब यही पहचान हो गई।।

प्यार की बस्ती में धोखा ही धोखा है।
रंग बदलना लोगों की फितरत हो गई।।

प्यार, नफ़रत, ग़म, गुस्सा और फरेब।
ज़िंदगी की अब यही कहानी हो गई।।