अबयज़ ख़ान
पप्पू अब फेल नहीं होगा, जब से ये ख़बर आई है, पप्पू के साथ-साथ उसके मां-बाप के चेहरे भी खिल उठे हैं। पंजे को वोट देने वाले मां-बाप को लग रहा है कि उनका वोट कामयाब हो गया है। पिछली दस साल से एक ही क्लास में पप्पू रिकॉर्ड बना रहा था, लेकिन न तो गिनीज़ बुक वाले उसका नाम दर्ज़ कर रहे थे और न ही लिम्का बुक में उनके बेटे का नाम छप रहा था। और तो और बोर्ड वाले भी उससे पीछा छुड़ाने के मूड में नहीं थे। लेकिन सरकार को पप्पू का ख्याल आया। उसके मां-बाप के आंसुओं का ख्याल आया, जो पिछले दस साल से इस बात का इंतज़ार कर रही थीं, कि इस बार तो उनका लाडला दसवीं की सीड़ी पार कर ही लेगा।


लेकिन जब से वो गाना आया कि मां का लाडला बिगड़ गया, पप्पू और आवारा हो गया था। मां-बाप से लेकर पप्पू के यार-दोस्त तक इस इंतज़ार में थे, कि कब पप्पू पास होगा और उन्हें मिठाई खाने को मिलेगी। लेकिन पप्पू ने तो जैसे कसम खा ली थी। वो तो भला हो, बहन मायावती और कपिल सिब्बल जी का। सिब्बल जी ने दसवीं से बोर्ड ख़त्म कराने का सुझाव दिया, तो बहन जी ने फटाफट अपने स्टेट में ये फ़रमान लागू भी कर दिया कि अब दसवीं में कोई फेल नहीं होगा। अगर छह में से पांच सब्जेक्ट में भी पास होते हैं, तो अगली क्लास के लिए बेड़ा पार। मतलब ये कि पप्पू की दस साल की तपस्या रंग लाई। लेकिन कुछ बच्चे तो ऐसे भी हैं, जो पप्पू नहीं बनना चाहते। उनको तो एक्ज़ाम का ऐसा कीड़ा सवार है कि पूछिए मत।

इधर मंत्री जी ने ऐलान किया, उधर टीवी कैमरे बच्चों के पीछे दौड़ पड़े। हर किसी को उनकी बाइट की फिक्र थी, बहुत से पप्पू कैमरों के सामने चहक रहे थे, कि बढ़िया हुआ, अब झंझट से मुक्ति मिली। फेल-पास का चक्कर ही ख़त्म हो गया। कोई माया जी को कोटि-कोटि नमन कर रहा था, तो कोई सिब्बल साहब को साधुवाद दे रहा था। चलो किसी ने तो हमारी सुनी। किसी ने तो हमारा दर्द समझा। आखिर जो पप्पू घिसट-घिसट कर दसवीं के बाद की गिनती भूल गया था, अब कम से कम ग्यारह पर तो आयेगा।

लेकिन बहुत से पड़ाकू शायद इससे खुश नहीं थे,वो सिर्फ़ अपने ही बारे में सोच रहे थे, उनके लिए बिल्कुल नहीं, जिनके बाप-दादा भी बेटे के दसवीं पास होने का सपना देखते-देखते गुज़र गये।
पप्पू स्कूल से बाहर निकल गया, शादी के बाद पप्पू के बच्चे भी दसवीं में आ गये, और अब पप्पू अपने बच्चों के साथ उसी क्लास में है। हद तो तब हो गई, जब बच्चे पार कर गये और पप्पू किनारे पर ही रह गये। लेकिन अगर सिब्बल साहब की चली, तो उनकी ज़िंदगी में भी आयेगा एक सुनहरा दिन जब उनके मौहल्ले में भी बटेगी मिठाई और फिर हर कोई कहेगा कि पप्पू पास हो गया।
अबयज़ ख़ान
ये बच्चे नहीं पटाखा हैं। ज़ीटीवी पर आजकल एक शो आ रहा है लिटिल चैंप्स। इसमें शामिल सभी 12 बच्चे एक से बढ़कर एक हैं। इतनी कम उम्र में इन बच्चों को सुरों की इतनी समझ है, कि अच्छा-अच्छा आदमी दांतो तले उंगली दबा ले। लेकिन यहां पर नई बात ये नहीं है। बल्कि दिलचस्प तो ये है कि इस प्रोग्राम में एक छोटी से एंकर है, जो अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर सकती है। दरअसल अफशां नाम की ये बच्ची आई तो थी सिंगर बनने, लेकिन उसकी हाज़िर जवाबी देखकर अभिजीत और अलका ने उसे एंकर बनाने का फैसला कर लिया। अफ़शा मुसानी नाम की ये बच्ची जब स्टेज पर एंकरिंग करती है, तो बड़ों-बड़ों के कान काट लेती है।

चार या पांच साल की इस बच्ची को देखकर यकीन ही नहीं होता कि ये अपनी उम्र से इतनी ज्यादा समझदार है। यूं तो स्टेज पर खड़े होना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती, लेकिन अफ़शां मुसानी की अदाकारी में वो कॉंफिडेंस है कि पूछिए मत। उसकी हाज़िर जवाबी का आलम ये कि अभिजीत और अलका याज्ञिक तो क्या बड़े-बड़े धुरंधर उसके सामने खुद को चित्त समझते हैं। दिलचस्प नज़ारा तो तब देखने को मिला था, जब मुंबई की ये बच्ची सिंगर बनने के लिए ऑडिशन देने आई थी। लेकिन ऑडिशन के दौरान उसने वो मस्ती की, कि आयोजकों का इरादा ही बदल गया। जब ऑडिशन के दौरान अलका याज्ञिक ने उससे सवाल पूछे, तो उसने ऐसे चटपटे जवाब दिये कि हर कोई उसके जवाबों पर लोटपोट हो गया।

बच्ची के जवाबों पर हंसते हुए अलका ने उसकी मम्मी से पूछा कि इसके जन्म के वक्त आपने क्या खाया था, तो उससे पहले ही अफ़शां बोल पड़ी, मेरी मम्मी ने बड़ा-पाव खाया था। मैं इस प्रोग्राम को लगातार देखता हूं, सिर्फ़ इसी को नहीं बल्कि बच्चों से जुड़े शायद सभी प्रोग्राम। इसकी एक वजह भी है। जो काम हम अपने बचपन में नहीं कर पाए, उन्हें ये बच्चे इतने कॉन्फिडेंस से पूरा कर रहे हैं कि सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। दरअसल हमारे ज़माने में न तो इतनी सुविधाएं थीं और न ही हमारे घरवालों ने प्रतिभा को तराशने की ज़रूरत महसूस की। अगर कभी छिपकर टीवी देख लिया, या कॉमिक्स पड़ ली, तो समझिए धुनाई होना पक्की बात थी। और अगर कहीं क्रिकेट खेलने चले गये, तो समझिये उस दिन शामत तय थी।

मां-बाप को बस एक ही चीज़ से मतलब था, कि बच्चे पढ़कर नवाब बनें। लेकिन आज ज़माना बदल गया है, आज के बच्चे कहते हैं कि पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे ख़राब और खेलेगो कूदोगे, तो बनोगे नवाब।। और ऐसा हो भी रहा है, आज़ के ज़माने के बच्चे तो रफ्तार से भी तेज़ दौड़ रहे हैं। साथ में उनके मां-बाप भी कदम से कदमताल मिलाकर अपने बच्चों के लिए खून-पसीना एक कर रहे हैं। कलर्स पर बालिका वधु और सलोनी धूम मचाए हुए हैं, तो कई चैनल्स बच्चों को लेकर प्रोग्राम बना रहे हैं। अब ये बच्चों के टैलेंट का कमाल है, या बाज़ार की बढ़ती मांग। अब एनिमेटिड प्रोग्राम और कार्टून नेटवर्क बच्चों की फेवरिट लिस्ट में नहीं हैं। अब वो खुद स्टेज पर खड़े होकर अपने सुरों का संग्राम छेड़ रहे हैं, तो ठहाकों से लोगों के मन में गुदगुदी पैदा कर रहे हैं।

आमिर खान की फिल्म तारे ज़मीं पर को शायद ही कोई भूला होगा, जिसमें नन्हें दर्शील सफ़ारी ने अपनी एक्टिंग से दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया था। तो स्लमडॉग मिलेनियर के अज़हर और रुबीना को कौन नहीं जानता, जो अपनी एक्टिग की वजह से आज देशभर में नाम कमा रहे हैं। इन बच्चों को इतनी कम उम्र में नेम-फ़ेम-गेम मिल गया जब इनमें से कई को अपना नाड़ा बांधना भी नहीं आता होगा। पहले मां-बाप अपने बच्चों से अपना नाम रोशन करने के लिए कहते थे, लेकिन आज उनकी पहचान अपने बच्चों से ही है। आज सलोनी, अविका, अज़हर, रुबीना, दर्शील ओर अफ़शां के मां-बाप को उन्हीं की वजह से पहचान मिली है। ये बच्चे अब ख़बर बनते हैं, इनकी हर हलचल पर मीडिया की नज़र रहती है। इनकी हर हलचल, टीवी चैनल्स की हेडलाइन बनती है। ये बच्चे वाकई लाजवाब हैं, इनकी कामयाबी देखकर रश्क होता है। इनको देखकर लगता है कि हिंदुस्तान सचमुच तरक्की के रास्ते पर बढ़ चला है। ये बच्चे उधम नहीं मचा रहे हैं, बल्कि ये तो धूम मचा रहे हैं। इन बच्चों को देखकर कई बार मन होता है कि इन्हें किसी म्यूज़ियम में रख लूं, तो कई बार खुद से भी जलन होती है। कि हम बचपन में इतने बुद्धु कैसे रह गये।
अबयज़ ख़ान
22 मई 2009 की तपती दोपहरी थी... सूरज क़हर बरसा रहा था। हर तरफ़ आग ही आग बरस रही थी। दफ्तर से मन उचट चुका था, तो ज़िंदगी में भी घमासान मचा हुआ था। दिल और दिमाग दोनों ही काम नहीं कर रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। किसी से बात करके भी मन का बोझ हल्का नहीं हुआ, तो दफ्तर से छुट्टी ले ली। पहले समझ नहीं आया कि क्या करूं, फिर अचानक मन में आया कि चलो कहीं घूम लिया जाए। तभी अचानक पापा का फोन आया कि वो जयपुर जाना चाहते हैं, पापा ने फोन पर पूछा, क्या तुम भी चलोगे? मैंने हां कर दी। पापा के साथ मैं भी राजस्थान टूर पर निकल पड़ा। गर्मी झुलसा रही थी, लेकिन मन बहलाने के लिए घूमने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।

देर शाम जयपुर पहुंचा, तो हम लोग छोटे भाई के कमरे पर रुके। फ्रेश होने के बाद कुछ देर इधर-उधर की बातें की, उसके बाद हम तीनों घूमने निकल गये। जयपुर का किला और हवामहल देखने के बाद भी मन उदास ही था। सीने पर एक बड़ा बोझ था, जो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। देर शाम जयपुर के मशहूर इस्माइल रोड पर भी निकले, बाज़ार भी घूमा, सोचा कुछ ख़रीदारी कर लूं, लेकिन जयपुर में मन रमा नहीं। इसके बाद अगला पड़ाव था अजमेर। मशहूर ख्वाजा संत मोईनुद्दीन चिश्ती का शहर। पहाड़ी पर बसे इस शहर में चढ़ाई ने काफ़ी थका दिया। वैसे भी जयपुर से अजमेर का रास्ता करीब तीन घंटे से ज्यादा का था। थकान तो पहले से ही थी। अजमेर पहुंचा तो दरगाह जाना भी ज़रूरी था। लेकिन दरगाह पर पहुंचते ही ऐसा लगा कि हम कहां आ गये।

मज़ार पर मन्नतों के लिए हज़ारों ज़ायरीन पहुंचे थे, लेकिन मज़ार पर पैसों का खेल देखकर एक बारगी खुद को झटका लगा, कि क्या यही ख्वाजा का दरबार है, जहां कदम-क़दम पर लोग पैसे उगाहने के लिए खड़े थे। शुरुआत चप्पलों से हुई, जिसके पांच रुपये देना पड़े। उसके बाद गेट पर खड़े लोग किसी भी तरह पैसे लेने के लिए उतावले थे। कोई फूलों के बहाने पैसे ले रहा था, तो कोई ख्वाजा के दर पे लंगर कराने के नाम पर पैसे मांग रहा था। इन सब से निकलकर जब ख्वाजा की मज़ार पर पहुंचे, तो वहां एक औरत के चीखने की आवाज़ सुनी। मालूम किया तो पता चला कि उससे भी लोग ज़बरन पैसे उगाहने में लगे थे। अफ़सोस हुआ कि ये लोग मुसलमानों की कैसी इमेज बना रहे हैं। मुझे याद आये दिल्ली के लोटस और अक्षरधाम टैंपिल जहां न तो कोई टिकट लगता है, उल्टे आपके जूते-चप्पल भी हिफ़ाज़त से रखे जाते हैं। लेकिन ख्वाजा के दर पर कुछ लोग मुसलमानों की इमेज को ख़राब करने में लगे थे। आज अगर ख्वाजा देखते होंगे तो उन्हें भी इस हालत पर अफ़सोस तो होता ही होगा।

ख़ैर यहां से आगे बढ़े तो प्यार-मोहब्बत के शहर आगरा का रुख किया। ट्रेन ने जैसे ही आगरा शहर में एंट्री की, बदबू के मारे जीना मुश्किल हो गया। समझ नहीं आया कि हम उसी शहर में दाख़िल हो रहे हैं, जहां दुनिया का सातवां अजूबा हैं। रेलवे लाइन के किनारे बिखरी गंदगी ने नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर दिया। बदबू से बचते हुए बड़ी मुश्किल से स्टेशन पहुंचे, तो उसके बाहर का हाल भी पूछिए मत। हर तरफ़ गंदगी ही गंदगी का नज़ारा। लालू जी ने रेल को तो प्रोफिट में ला दिया, लेकिन गंदगी देखकर प्रोफ़िट का राज़ समझ में आ गया। ताज के रास्ते में तो गंदगी का वो आलम था, कि पूछिए मत। बड़ा अफ़सोस हुआ वहां की हालत पर, गंदगी देखकर मन में ख्याल आया कि आखिर क्या सोचते होंगे परदेसी महमान इस शहर के बारे में।

लोकिन ताज पर पहुंचकर सारी थकान काफ़ूर हो गई। आलमपनाह की बेपनाह ख़ूबसूरत इमारत देखकर दिल बाग़-बाग हो गया। प्यार की इतनी खूबसूरत निशानी तो क्या, मैंने अपनी ज़िंदगी में ऐसा शानदार अजूबा भी नहीं देखा था।
शाहजहां ने अपनी महबूबा को प्यार का वो तोहफ़ा दिया था, जिसे शाहजहां और मुमताज तो क्या इस दुनिया में आने वाला हर शख्स ताउम्र याद रखेगा। आज के दौर में न तो कोई ऐसा प्यार करने वाला शाहजहां मिलेगा और न ही कोई इतनी किस्मत वाली मुमताज़ महल होगी। और न ही कोई ऐसा दिलखर्च शहंशाह होगा। जो अपनी महबूबा के लिए मरने से पहले ही सफ़ेद पत्थर का हसीन मकबरा बनवा सकता हो। दुनिया का ये अजूबा वाकई लाजवाब है। अनमोल है, बेशकीमती है। दुनिया में इस जैसी इमारत न तो कोई बनवा सकता है और न ही शायद बनवा पाएगा। सफ़ेद संगमरमर से बनी ये इमारत उस प्यार की कहानी को अमर कर रही है, जो आज से लगभग चार सौ साल पहले लिखी गई थी। और उस ज़माने में लिखी गई थी, जब प्यार को किसी गुनाह के दर्जे में रका गया था। इस कहानी में सिर्फ़ प्यार का टिव्स्ट नहीं था, बल्कि ये तो चार सौ साल का इतिहास भी समेटे हुए थी।

पहली बार में तो ताज को देखने पर आंखें चकाचौंध से भर जाती हैं। यकीन ही नहीं होता कि अपने मुल्क में भी इतना नायाब नमूना है, जिसे देखने दुनियाभर से हर साल लाखों लोग हिंदुस्तान के इस शहर में आते हैं। वाकई ये अपने आप में लाजवाब है। ताज नगरी के बाद मैंने घर लौटने का फैसला कर लिया, क्योंकि इस हसीन इमारत को देखने के बाद फिर कहीं और जाने का मन ही नहीं हुआ। ताज की मीठी-मीठी यादों के साथ आगरा का मशहूर पेठा ख़रीदकर मैंने इस शहर से से विदाई ली, और फिर चल पड़ा अपने घर के लिए। जहां मां बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रही थीं। हर बार की तरह इस बार भी उनके पास मुझसे करने के लिए ढेर सारी बातें थीं, मेरे लिए उनकी रसोई में ढेर सारे पकवान भी इंतज़ार कर रहे थे... बस फिर क्या था, मैंने आगरा से पकड़ी बस और फिर इस शहर को अलविदा कहकर अपने घर के लिए रवाना हो गया। और आगरा की यादें कहीं पीछे छूट गईं।
अबयज़ ख़ान
नवाबों के इस शहर की हर अदा निराली है। तहज़ीब और उर्दू के इस शहर में चाकू की धार भले ही कुंद पड़ चुकी हो, लेकिन इस शहर में रफ्तार बाकी है। दिल्ली से करीब सवा दौ सौ किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे 24 पर बसा ये शहर मेहमानों के इस्तकबाल में हाथ फैलाए खड़ा रहता है। नवाबी आन-बान और लज़ीज़ खानो के अलावा इस शहर ने शायरी में भी अपना एक मुकाम बनाया है। लेकिन आज बात सिर्फ़ खाने की। और खाने में भी रामपुर के मशहूर हब्शी हल्वे की। नाम भले ही अटपटा सा लगे, लेकिन आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, दरअसल इस हल्वे का नाम अफ्रीका में रहने वाले हब्शियों के नाम पर ही पड़ा है। रामपुर के नवाब कल्बे अली खां जब साउथ अफ्रीका गये थे, तो वहां का हब्शी हल्वा उन्हें बेहद पसंद आया। इतना पसंद आया, कि वो हल्वा बनाने वाले करीगर को ही वहां से अपने साथ ले आये। और फिर रामपुर में बनाया जाने लगा ख़ास हब्शी हल्वा।
इस हल्वे की खास बात ये है कि इसे कमज़ोरी और ताकत की अहम दवा माना जाता है। लेकिन रामपुर में इस हल्वे को बनाने की ज़िम्मेदारी उठाई शहर के मशहूर हकीम अब्दुल हकीम खान ने। डेढ़ सौ साल पहले रामपुर के बाज़ार नसरुल्ला खां में उन्होंने हल्वे की दुकान खोली। नसरुल्ला खां बाज़ार जाने के लिए स्टेशन पर उतरने के बाद आप रिक्शा कर सकते हैं, जो महज दस रुपये में आपको बाज़ार में छोड़ देगा। तंग रास्ते वाले इस बाज़ार में हफ्ते के सातों दिन भीड़ का आलम रहता है। इसी भीड़ भरे बाज़ार में है हकीम साहब की दुकान। लेकिन अब हकीम साहब तो रहे नहीं, लिहाज़ा उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी इस पुश्तैनी धंधे को संभाल रही है। दुकान और दुकानदार की बात से हटकर अब बात की जाए हल्वे की। देसी घी, और ख़ालिस दूध से बना ये हल्वा पूरी रात आग पर बनाया जाता है। साथ ही हल्वे में सूखे मेवों और समनख के साथ ही देसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ख़ास बात ये है कि हल्वे के बनाने वाले इसका फार्मूला बताना नहीं चाहते। शायद यही वजह है कि रामपुर शहर में इसकी दो ही दुकाने हैं और दोनों ही इसी खानदान की हैं। खाने में चॉकलेट जैसा स्वाद देने वाला ये हल्वा इतना लज़ीज़ होता है कि जो कोई एक बार इसे खाले, तो खाते-खाते भी उसका मन न भरे। हालांकि इसे सर्दियों के लिए बेहद उम्दा माना जाता है, लेकिन हल्वे की मांग इतनी है, कि इसे बारह महीनों तक बेचा जाता है। कई फिल्मी सितारे भी जैसे मैक मोहन, पोपटलाल भी हकीम साहब के हल्वे के ख़ास मुरीद हैं। इसके अलावा कई देशी-विदेशी सैलानी भी रामपुर से गुज़रते वक्त इस हल्वे को साथ ले जाना नहीं भूलते। हल्वे की भीनी-भीनी खुशबू का ज़ायका अगर आपकी ज़ुबान को लग जाए, तो आप भी इसके दीवाने हुए बिना नहीं रह पाएंगे।
अबयज़ ख़ान
मां मेरी सूरत तेरी सूरत से अच्छी तो नहीं, लेकिन मुझे तेरे आंचल की तलाश है। तेरी गोद में सो जाने को जी चाहता है। लेकिन मां, मैं तो इतनी बदनसीब निकली, कि जन्म के बाद ही मुझे दर-दर की ठोंकरे खाने के लिए छोड़ दिया गया। आखिर मेरा क्या कसूर था। क्यों मैं अनाथों की तरह दूसरों के रहमो-करम पर जीती हूं... मां सुन लो मेरी भी फरियाद 

मैंने ज़मीन पर कदम रखा था, तो मां के नर्म आंचल का इंतज़ार किया था। मां की गोद में खेलने के सपने देखे थे। पापा की उंगली पकड़कर घर से निकलने का ख्वाब संजोया था। भाई के साथ घर के पिछवाड़े मिट्टी की गुड़िया बनाने का सपना देखा था। लेकिन इस दुनिया में तो आने के बाद सारे सपने ही चूर-चूर हो गये। मेरी किलकारी पर मुझे थपकी देना तो दूर, मां ने तो मेरे आने के बाद मुझे आंखे खोलने का मौका भी न दिया। घर के नर्म बिस्तर के बजाए मेरी आंख खुली, तो उस जगह जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ अंधियारा था। मेरे जन्म पर खुश होने वाली मेरी मां मेरे जन्म पर समाज से नज़रें चुरा रही थी। मैं तमाशा बन चुकी थी, और सारे तमाशाई थे।



आखिर क्यों मां... तुम ऐसा क्यों करती हो। लोग अपनी बिटिया को लेकर कितने सपने संजोते हैं, तमाम अरमान मन में पाले रहते हैं। लेकिन मेरे साथ ऐसा ज़ुल्म क्यों। आखिर मुझे अधिकार क्यों नहीं है, तुम्हारे साथ जीने का। आखिर मुझे अपने नर्म हाथों की थपकी देकर सुलाने से तुम्हें परहेज़ क्यों है? आखिर कौन है वो मेरा बदनसीब बाप... जो मेरे आने से इतना शर्मिंदा है कि तुम्हें भी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर गया है। आखिर क्यों नहीं है मुझे भी जीने का हक? मेरा तो कोई कसूर भी नहीं था, मैं तो आपके प्यार की निशानी थी। लेकिन मुझे तो लावारिसों की तरह छोड़ दिया गया। जहां मेरे लिए सांस लोना भी मुश्किल था। और जो लोग मेरे लिए हमदर्दी रखते थे, वो भी मेरे बारे में तमाम तरह की बातें कर रहे थे। आखिर क्यों ये समाज इतना बेदर्द है, जो मेरे जन्म पर नेग देने के बजाए आंसू बहाता है। आखिर मां, मैं भी तुम्हारा ही एक रूप हूं.. आज तुम जिस मुकाम पर खड़ी हो, कल वहीं मेरी भी मंजिल होगी। लेकिन मैं इतना तो मानती हूं... कि एक मां अपनी बेटी का गला नहीं घोट सकती। क्योंकि मां तो भगवान का दूसरा रूप होती है।
सच में मां का कद इतना बड़ा है कि दुनिया में हर कोई उसके सामने बौना नज़र आता है। मां के पैरों तले जन्नत है, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन मां का दर्जा तो जन्नत से भी ऊपर है। हज़ार ख़ताओं को माफ़ करने का जज़्बा अगर किसी में है, तो वो मां ही है। शायद इसीलिये कहते हैं कि सबसे प्यारी मां... और मुझे भी तलाश है एक ऐसी ही मां की.. मां क्या तुम सुनोगी मेरी पुकार..
 
एक अभागी बेटी...
अबयज़ ख़ान
चुनावी महाभारत अपने आखिरी पड़ाव में है, लेकिन इस बार जिस चीज़ की कमी सबसे ज्यादा महसूस की गई, वो था चुनाव प्रचार का ज़ोर-शोर। लोकसभा के लिए महासंग्राम का बिगुल तो बजा, लेकिन न तो बिगुल दिखा, न शोरशराबा करते चुनाव प्रचारक। आम-आदमी का चुनाव आम आदमी से कोसों दूर रहा। एक तरफ़ एक्ज़िट पोल गायब था, तो दूसरी तरफ़ चुनाव प्राचर के पुराने तरीके कहीं भी नज़र नहीं आये। बचपन में जब चुनाव की रणभेरी बजती थी, माहौल में एक अलग तरह का ही जोश होता था। काफ़ी पहले से चुनाव की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। घर-घर में चुनाव के लिए पर्चियां बनाने का काम काफ़ी पहले ही शुरु हो जाता था। किस के घर में कितने वोट हैं, ये कार्यकर्ताओं को उंगलियों पर ही याद होता था। सुबह प्रचार का जो सिलसिला शुरु होता था, वो देर रात तक चलता था।
रिक्शेवाले लाऊडस्पीकर पर अपने खास उम्मीदवार का प्रचार करते थे, और जैसे ही रिक्शा गली के नुक्कड़ से गुज़रता, उसके पीछे बच्चों की भीड़ लग जाती थी। बिल्ले लेने के लिए बच्चों में होड़ मच जाती थी, रिक्शे वाला भी बच्चों को बिल्ले और झंडे बांटकर बदले में उनसे नारे लगवाता था। तो बच्चे भी कम नहीं थे, जिस नेता का रिक्शा देखा उसी की ज़िंदाबाद शुरु कर दी।



और तो और बच्चों का समूह हर नेता के दफ्तर पर जाता वहां नारे लगाता और खूब सारे बिल्ले और झंडे बटोरकर अगले नेता के घर रवाना हो जाता। बच्चे बी इतने समझदार थे कि जिस नेता के घर जाते थे उसी की जय-जयकार करते थे। पहले न तो इतनी गाड़ियां थीं, न नेता ही गाड़ियों पर प्रचार करने में दिलचस्पी दिखाते थे। नेताजी जब अपने लाव-लश्कर के साथ गुज़रते थे, तो उनके पीछे पैदल ही लंबा काफिला होता और गली-मुहल्ले के विकास के नाम पर वोट मांगे जाते थे।
इसके अलावा पेन्टर भी दिल लगाकर दीवारों को पैंट करते थे, उन पर खूबसूरत कलाकारी कर अपना हुनर दिखाते थे। नेताजी के साथ में उनकी पार्टी का चुनाव निशान होता, तो साथ में उनकी पार्टी के बड़े नेता जी का फोटो भी दीवार की शोभा बढ़ाता था। गली-मुहल्ले में नुक्कड़ सभाएं कर नेता वोट मांगते थे। इस दौरान न तो कोई गिला-शिकवा होता था न किसी की किसी से अदावत होती थी। दिनभर वोट और प्रचार के झंझट से निपटकर कार्यकर्ता जुट जाते थे अपने नेता जी के घर और फिर लगती थी खाने की पंगत।




देर रात तक चाय का सिलसिला तो आम बात होती थी। लोग भी चुनाव में खूब दिलचस्पी दिखाते थे। चाय की दुकान तो समझो सियासत का अड्डा बन जाती थी, वहां लंबी-चौड़ी बहसों में तय हो जाता था कि फलां सीट पर कौन जीत रहा है, और देश में किसकी सरकार बन रही है। या फलां नेता ने कौन सा बयान दिया है, या उसमें ऐसी कौन सी कमियां हैं, जिसकी वजह से इस बार उसकी हार तय है। एक से डेढ़ रूपये की चाय में हिंदुस्तान की तस्वीर तय हो जाती थी। पहले के लोग पप्पू भी नहीं होते थे, वोट डालने के दिन सुबह से ही घर में किसी मेले जैसा आलम होता था। सज-धजकर सुबह से लोग वोट डालने की तैयारियों में जुट जाते थे। लेकिन अब ये सब चीजें कहीं नदारद सी हो गईं है। शायद लोगों की दिलचस्पी भी कुछ कम हो गई है। खाना-पीना और मौज-मस्ती तो अभी भी बाकी है, लेकिन पहले वाली रौनक कहीं गायब सी हो गई हैं। रही-सही कसर चुनाव आयोग की पाबंदियों ने पूरी कर दी है। शायद ये ज़रूरी भी था, क्योकिं नेता भी खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने में अपनी शान समझते थे। लेकिन कुछ भी हो, पुराने चुनावों का अपना एक मज़ा था, जो कहीं खो सा गया है।
अबयज़ ख़ान
2009 का आम चुनाव कई मायनों में ख़ास रहेगा। मुद्दों से दूर इस बार का लोकसभा चुनाव बेमतलब की फूहड़ बयानबाज़ी के लिये याद रखा जाएगा। वरुण गांधी के ज़हर बुझे तीरों से शुरु हुआ चुनावी सफ़र अब तक के सबसे घटिया दौर से गुज़र रहा है। जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए नेता मुद्दों के बजाए एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। वरुण ने हाथ काटने की बात की, तो बिहार में राबड़ी देवी नीतीश कुमार के बारे में ऐसे-ऐसे बोल बोल गईं जो न सिर्फ़ तहज़ीब के खिलाफ़ थे, बल्कि देश की इमेज पर भी बट्टा लगा रहे थे। राबड़ी ने शुरुआत की तो लालू कहां पीछे रहने वाले थे। वरुण ने ज़हर उगला तो लालू वरुण पर रोड-रोलर चलवाने की धमकी दे गये।

मतलब हर नेता तू सेर तो मैं सवा सेर साबित होने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मज़े की बात ये है कि इस बार के चुनाव को नेताओं ने गंभीरता की बजाए प्रैक्टिकल ग्राउंड बना दिया। समाजवादी पार्टी ने ये जानते हुए भी कि संजय दत्त मुंबई मामले में दोषी हैं, उन्हें लखनऊ से लड़ाने का ऐलान कर दिया, लेकिन जब बाद में परमिशन नहीं मिली, तो संजय की जगह नफ़ीसा अली को मैदान में उतार दिया। इसका मतलब ये है कि यूपी की इस बड़ी पार्टी को लगता है कि लखनऊ के सिर्फ़ वही ठेकेदार हैं, और लखनऊ की आवाम को इसका फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। संजय दत्त को नेता बनाने पर तुली पार्टी ने उन्हें महासचिव बना दिया, तो मुन्ना बहनजी के खिलाफ़ ऐसी घटिया ज़ुबान का इस्तेमाल कर गये कि उन्हें लेने के देने पड़ गये।

वैसे भी ले-देकर उन्हें एक ही डायलॉग आता है, 'मैं मुन्ना और आप मेरे सर्किट' वैसे उनके सर्वहारा भाई (जो अमूमन सभी फिल्मी सितारों के भाई बन जाते हैं) अमर सिंह ने तो रामपुर से जया प्रदा के चुनाव को अहम की लड़ाई बना लिया और अपनी ही पार्टी के आज़म खान को खरी खोटी सुना डाली। बयान बहादुर बनते-बनते अमर इतने भारी हो गये कि मंच भी उनका वज़न नहीं संभाल पाए। चलिए अब यूपी से आगे बढ़ते हैं। नेशनल लेवल पर नज़र डालें तो मौजूदा पीएम और पीएम इन वेटिंग ने एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल रखी हैं। अभी तक दोनों एक-दूसरे को कमज़ोर साबित करने पर तुले हैं, लेकिन शायद दोनों को ही सियासत का कॉम्पलेन पीने की ज़रूरत है। तो उधर बिहार में लालू और पासवान अपनी ही सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोले खड़े हैं। तलवारें तन गईं हैं और सभी की नज़र देश को एक मज़बूत सरकार देने के बजाए पीएम की कुर्सी पर लगी हैं।

तो बिहार में प्रणव मुखर्जी, लालू को उन्हीं के अंदाज़ में जवाब दे गये। ये अलग बात है कि बाद में वो कमज़ोर हिंदी का हवाला देकर बयान से किनारा कर गये। तो यूपी में दिग्विजय सिंह मायावती को सीबीआई की धमकी दे गये। और तो और बीजेपी में जेटली और राजनाथ सिंह में ही तलवारें खिंच गई, वो भी सिर्फ़ इसलिये कि जेटली को लगने लगा कि राजनाथ, सुधांशु मित्तल को आगे कर उनके पर कतर रहे हैं। हालात ये हो गई कि बयान बहादुर नेताओं के आगे चुनाव आयोग भी बेबस नज़र आ रहा है। चुनाव कराने से ज्यादा बड़ा काम तो उसके सामने नेताओं को नोटिस जारी करने का है। हालात ये हो गई है कि चुनाव आयोग को भी शायद याद नहीं होगा कि इस बार उसने कितने नोटिस बांटे हैं। लेकिन इस बार के चुनाव को बिना जूते के कैसे भूल सकते हैं। चिदंबरम पर जूता पड़ा तो टाइटलर और सज्जन कुमार चुनावी आंधी में उड़ गये।

जिंदल पर जूता पड़ा को कांग्रेस की और भी फ़ज़ीहत हो गई। जूते पर कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी भी इस वार से नहीं बची, भले ही पीएम इन वेटिंग चप्पल का निशाना बने हों, लेकिन ये तो साफ़ हो गया कि भगवा पार्टी में भी सब कुछ ठीक नहीं है। यानि अब तक जनता से जुड़े मुद्दे कहीं भी नहीं। मंदिर पर फेल हुई बीजेपी इस बार काले धन का रोना रो रही है, जिसका न तो आम आदमी से कोई मतलब और न ही पैसा आने से रहा। लेकिन सबसे दिलचस्प रहा समाजवादी पार्टी का मेनीफेस्टो। मुद्दों की बात तो दूर, जनाब तो अंग्रेजी और कंप्यूटर के सफ़ाये की बात ही कर गये। इस बार के चुनाव में क्या-क्या नहीं हुआ जो बताया जाए, जब नेताजी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होने नोट बांटना ही शुरु कर दिये। मतलब लिखने को इतना कुछ कि किताब छप जाए, और शायद अगर इस पर किताब आ जाए तो बेस्ट सेलर भी बन जाए। ये उस देश के महासंग्राम का हाल है जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कायम है। जहां सत्ता की कुंजी आम आदमी के हाथ में मानी जाती है, लेकिन चुनाव के बाद नेताजी की झोली भरती है और आम आदमी रह जाता है खाली हाथ। वैसे भी इस बार का ड्रामा देखकर तो यही लग रहा है कि ये नेता मंडली के कलाकार हैं और हम सब तमाशाई हैं, जिसका नाटक ज्यादा पसंद आयेगा उस पर वोट लुटा देंगे, और फिर उनके हाथ में सौंप देंगे अपनी किस्मत पांच साल के लिए। शायद इसीलिए ये चुनाव 'अमर' रहेगा। धन्य हो...मेरा भारत महान