अबयज़ ख़ान
http://www.ichowk.in/humour/next-surgical-strike-will-be-on-open-defecation/story/1/5058.html

'अबकी बार, खुले में शौच पर वार'. सरकार का ये नया नारा उन लोगों पर और भारी पड़ने वाला है, जो घर में टॉयलट बनवाने के बाद भी दूसरे के खेतों को गंदा करके आते हैं. खुले में शौच करने वालों पर नजर रखने के लिए सरकार की तरफ से कुछ कड़े निर्देश जारी किये गये हैं. जैसे खुले में शौच करने वालों पर ड्रोन से नजर रखी जाएगी. इसरो से भी बात चल रही है और यह काम सैटेलाइट से भी करवाया जा सकता है. रंगे हाथ पकड़े जाने पर उनकी फोटो खींचकर अखबार में छपवाई जाएगी. साथ ही उनका लोटा और डिब्बा ज़ब्त कर लिया जाएगा. अगर इसके बाद भी वो खुले में शौच करता हुआ पकड़ा गया, तो अगली बार उसे जेल की टॉयलेट में भेजने का पूरा इंतज़ाम होगा.

- नियम लागू होने के बाद हर परिवार को शौचालय बनवाने के लिए हफ्ते भर का समय दिया जाएगा. इस दौरान लोगों को कुछ छूट रहेगी. जैसे हर घर से रोजाना एक ही शख्स खुले में शौच में जा सकता है.
- खुले में शौच में बैठने का अधिकतम टाइम 10 मिनट ही होगा. इस दौरान सिर्फ शौच करना होगा, किसी तरह की बात सोचने की कोई इजाज़त नहीं होगी.
- मानवीय आधार पर दस्त और कब्ज़ वालों को थोड़ी राहत मिल सकती है. उनकी समय सीमा दिन में दो बार हो सकती है.
- महिलाएं परदे का इंतज़ाम करके जा सकती हैं. लेकिन उन्हें अपनी सुरक्षा की गारंटी खुद देनी होगी.
- एक साथ ग्रुप में जाने की इजाज़त किसी को नहीं होगी.
- अगर खेत के मालिक ने शौच करते वक्त रंगे हाथ पकड़ लिया तो उसका खेत साफ़ करने के साथ ही जुर्माना भी भरना पड़ेगा.
- सीनियर सिटीज़न दिन में दो बार जा सकते हैं.
- ये सभी छूट सिर्फ एक हफ्ते तक ही दी जाएगी ताकि इस दौरान आप अपने घर में शौचालय का निर्माण कर सकें.
- बच्चों को खुली छूट होगी, लेकिन गंदगी हुई तो उनकी मां इसके लिए ज़िम्मेदार होगी.
अबयज़ ख़ान
http://www.ichowk.in/social-media/truth-revealed-why-sonam-gupta-became-bewafa/story/1/5026.html

10 के पुराने नोट से लेकर 2000 के नए नोट तक सोनम हर बार बेवफ़ा साबित की जा रही है. हिंदुस्तान से लेकर न्यूज़ीलैंड तक और अमेरिका से लेकर यूरोप तक. हर नोट पे बस एक ही नाम, सोनम गुप्ता बेवफ़ा है. लेकिन ये किसी को नहीं पता कि सोनम आखिर बेवफ़ा क्यों हुई?
अबयज़ ख़ान
http://www.ichowk.in/humour/a-satire-on-lines-of-bank-after-currency-ban-in-india/story/1/4993.html

सास बहू सबका दुःख एक जैसा ही है. ऊपर से कमबख्त नमक ने और ज़ायका बिगाड़ दिया. कित्ता अच्छा लग रहा है, पहली बार पूरा देश आटे दाल पर एक साथ चर्चा कर रहा है. नई उम्र के लड़के लड़कियां स्मार्टफोन के साथ और स्मार्ट कैसे बनें इस पर चर्चा कर रहे हैं. शादियों का सीज़न है तो लड़कियों की चिंता आई लाइनर से लेकर सजने संवरने में है. सहेली की शादी में नया सूट भी लेना है. लेकिन इत्ते कम पैसे में सब कैसे होगा.

अबयज़ ख़ान

हर आंख नम है... हर दिल में ग़म है... ख़ून से सने बस्तों में नन्हें हाथों से लिखी इबारतें रो रही हैं...  कॉपी, किताबें, कलम-दवात, स्कूल की बेंच और कुर्सियां... दरो-दीवार सब रो रहे हैं। गणित के खूंसट सर, अंग्रेज़ी की मैडम, उर्दू के मास्साब, बड़े से चश्मे वाले इतिहास के टीचर, गेट का दरबान, स्कूल के खेल का मैदान... ज़मीन से लेकर आसमान तक हर आंख नम है।
क्लासरूम के रोशनदान में घोंसला बनाने वाले कबूतर, काबक में बैठी चिड़ियों के बच्चे सब रो रहे हैं... जो बच्चे मां से शाम को आने का वादा करके गये थे, वो हमेशा-हमेशा के लिए उससे रूठ कर उस जगह चले गये.. जहां से कोई लौटकर नहीं आता। मां से बिस्तर में दुबककर जन्नत की कहानियां सुनते-सुनते बच्चे सीधे जन्नत ही चले गये। 

अब कुछ बाकी है... तो सड़कों पर दर्द का समंदर है। इंसान तो छोड़िये शहर में खड़े पत्थरों के बुत आंसुओं से पिघल चुके हैं... शहर की तमाम गलियां इस तरह सूनी हैं.. जैसे उनकी ज़ुबान को ताला लग चुका है। पेशावर के तमाम पार्कों में अब सिर्फ़ सन्नाटा है। आज शाम ढलने वाली है.. लेकिन कोई बच्चा खेलने नहीं आया है....  लोगों की ज़ुबान बोलते-बोलते लरज़ रही है... आंखों से अश्क ज़ार ज़ार बह रहे हैं...

132 मासूमों की लाशों का ढेर लगा है.. लेकिन एक मां है... जो इस कब्रिस्तान में भी अपने जिगर के टुकड़े को तलाश रही है। मां जानती है.. कि इन बेबस लाशों में अब सांसों का कोई नामों निशां बाकी नहीं है...  मां जानती है... कि अब नन्हा सा खिलौना लेकर भी उसका बच्चा आंख नहीं खोलेगा। नई साईकिल देखकर भी उसका जिगर का टुकड़ा उससे नज़र नहीं मिलाएगा.. 

लेकिन ताबूतों के इस ढेर में उसकी उम्मीद अभी बाक़ी है। उसका लख्ते जिगर अब उससे कभी बात नहीं करेगा... उसका बच्चा अब उससे कभी कोई नख़रा नहीं करेगा... जिस बच्चे को मां बचपन में चांद-तारों की कहानियां सुनाती थी, अब वो उन्हीं चंदा मामा के पास चला गया है।  आज घर में उसकी पसंद की खीर बनाई थी... आज घर में बड़े अरमान से नरगिसी कोफ़्ते बनाए थे। आज तो बच्चे के लिए कीमे वाली कचौड़ियां भी बनाईं थीं... लेकिन मां को अभी उम्मीद है... उसकी हिम्मत अभी टूटी नहीं है। टूटती सांसों में उसकी उम्मीद अभी बाक़ी है।
लाशों के ढेर में मां अपने बच्चे का बस्ता तलाश रही है.. ये देखने के लिए कि कल जो उसने घर पर स्कूल का काम किया था, उसमें उसे मैडम से गुड मिला या नहीं... ये देखने के लिए कि मैडम ने डायरी में उसकी तारीफ़ में चंद अल्फ़ाज़ लिखे या नहीं... ये देखने के लिए कि आज भी उसके बच्चे ने टिफ़िन से खाना खाया था या नहीं... लेकिन मां ने जब कांपते हाथों से अपने मासूम का बस्ता खोला तो उसका कलेजा मुंह को आ गया..
मां ज़ोर ज़ोर से चीखें मार रही थी... उसकी दहाड़ हर किसी का कलेजा चीर रही थी... उसके बच्चे का बस्ता जगह जगह से छलनी हो चुका था.. कॉपी किताबें रोशनाई के बजाए खून से रंगी थीं... टिफ़िन में सुबह के दो पराठे और आम का अचार वैसा ही रखा था, जैसा उसने दिया था... हर रोज़ की तरह आज भी उसके लाडले बच्चे ने खाना नहीं खाया था... आज उसने लंच में खाने के बजाए सीने पर गोलियां खाई थीं... 
उसकी गोद में पला-बड़ा उसका बच्चा उससे दूर चला गया.. बिना कोई शिकवा किये... बिना कोई गिला किये... बिना किसी फ़रमाइश के...  लेकिन उस मासूम ने तो जल्लादों की हूरों के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी... उसे शिकायत तो अल्लाह से भी थी, जब हैवान उसके बच्चों का सीना गोलियों से छलनी कर रहे थे.. और वो ख़ामोशी की चादर ओढ़े इस ख़ौफ़नाक मंज़र का गवाह बना था...

ऐ-अल्लाह अब सब्र का पैमाना छलकने लगा है...

अबयज़ ख़ान
आज सिर्फ़ क्रिकेट का भगवान नहीं रोया... आज सिर्फ़ बल्ले का शहशांह नहीं रोया... आज भगवान के साथ हिंदुस्तान रोया है... आज भगवान के साथ गेंद और बल्ले को जानने वाला हर शख्स रोया है... आज विकेट और गिल्ली को समझने वाले हर शख्स के आंसू निकले हैं...  आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर हिंदुस्तानी की आंखें नम थीं... क्योंकि आज भारत रत्न रोया है...



पलकों में आंसू लिए लाखों-करोड़ों फैंस अपने शहंशाह को सलामी दे रहे थे... लेकिन ये लम्हों का क़सूर है... कि जिसने क्रिकेट के भगवान को मैदान से जुदा कर दिया... आज आंखों में आंसू थे.. लेकिन दिल में दर्द था... दर्द ये कि लम्हों ने ये ख़ता क्यों की... टीस ये कि लोगों के दिलों में राज करने वाले भगवान ने मैदान को अलविदा कह दिया था...

आज सचिन अकेले नहीं रोए.. उनके साथ रोया उनके बचपन का वानखेड़े... उनके 24 साल के करियर में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने वाला वानखेड़े... उनको क्रिकेट का ककहरा सिखाने वाला वानखेड़े...धूल भरी पिच पर अपने सचिन को बल्ले की बाजीगरी सिखाने वाला वानखेड़े... अपने इस जिगर के टुकड़े को आखिरी विदाई देते वक्त फूटफूटकर रोया...वानखेड़े में किसी के मुंह से अल्फ़ाज़ नहीं फूट रहे थे... लब जैसे थरथरा कर रह गए थे... होंट लरज़ने लगे थे... मांएं अपने आंचल से आंसू पोंछ रही थी... और बच्चे अपने सामने... एक इतिहास बनते हुए देख रहे थे...

वानखेड़े में जैसे ही मोहम्मद शमी ने वेस्टइंडीज़ के बल्लेबाज़ गैबरेल का आखिरी विकेट चटकाया... स्टेडियम तालियों की गूंज के बजाए... आंसुओं से ग़मग़ीन हो गया... वानखेड़े के हर स्टैंड से सिर्फ़ सिसकियां सुनाई पड़ रही थीं... क्रिकेट का कोहिनूर... जब हाथ हिलाकर स्टेडियम से विदाई ले रहा था... तो हर हिंदुस्तानी का दिल रो रहा था... हर कोई यही कह रहा था... कि ऐ सचिन इस आखिरी लम्हे में हमें ऐसी सज़ा क्यों दी.. और जो लोग इस लम्हे के गवाह नहीं बन पाए... उनका भी दल रो रहा था.. और टीस उनकी भी यही... कि ए भगवान... तू इन्सानों में भगवान बनाता क्यों है... और अगर भगवान बनाता है... तो उन्हें इंसानों से जुदा क्यों कर देता है...

बेशक क्रिकेट से अपनी जुदाई को मास्टर कभी नहीं भूल पाएंगे... लेकिन आज भी ये सबसे बड़ा दावा है... कि जब आने वाली हज़ार पुश्तें भी क्रिकेट का क ख ग सीखेंगी... तो यही कहेंगी... कि हे भगवान तब हम क्यों नहीं थे... जब भगवान खुद मैदान पर क्रिकेट को अमर करने में लगे थे.... जब भारत रत्न सचिन रमेश तेंदुलकर हिंदुस्तान की शान में चार चांद लगा रहे थे...


अबयज़ ख़ान


मोबाइल मनचलों को राहत की सांस देता है
उदास दिलों को मैसेज की आस देता है
सब्र इस बात का है कि जब सो जाते हैं सब घरवाले
मोबाइल माशूका के पास होता है।
अब पड़ोसी की छत पर जाना
और मुन्ने का ख़त पहुंचाना
कितनी पुरानी बात है..
अब तो एक घंटी में दिलरुबा दिल के पास है।
अच्छी बात ये है कि पकड़े जाने का भी डर नहीं
ढूंढता रहे आपको लड़की का भाई
या अब्बा..
मोबाइल में न सतीश होगा
न सलीम होगा
न किशन न जयकिशन होगा.।
आपका नाम या तो लल्लू होगा
या फिर उल्लू होगा..
लेकिन दोस्त उल्लू नाम सुनकर उदास मत होना
सनम को इसका दोष मत देना
उसकी फ़ोन बुक में कई पप्पू भी होंगे
कई उल्लू होंगे, उल्लू के पट्ठे भी होंगे।।
एक गर्लफ्रेंड पर 4 ब्वॉयफ्रेड का चलन तो पुराना है
फिर ये तो मोबाइल प्यार का ज़माना है
यहां रॉन्ग नंबर से पहचान होती है
फिर फ़ोन से जान और क़रीब होती है।
बातचीत से बढ़ती हैं नज़दीकियां
लेकिन इस प्यार में न बेक़रारी होती है
न मज़ेदारी होती है...
अब न इसरार होता है
न इक़रार होता है..
इज़हार की बात तो छोड़ दीजिए..
बैटरी के साथ प्यार वीक होता जाता है...
वेलेडिटी के साथ टल्कटाइम ख़त्म हो जाता है..
और सिम बदलने के साथ मोबाइल से प्यार डिलीट हो जाता है।।
अबयज़ ख़ान

अदालत में अजीब मुकदमा
गवाह भी बकरी
और सबूत भी बकरी


मामला समझ से थोड़ा परे चला जाता है लेकिन यही है इस मुकदमे की हकीकत...एक बकरी के मालिकाना हक के लिए चला ऐसा केस जिसमें फैसला भी बकरी की गवाही से ही हुआ
दरअसल इस अजब गजब मुकदमे की शुरुआत हुई एक बकरी पर हुए विवाद से...

खंडवा के अकबर ने गजराज नाम के एक शख्स से 3700 रुपए में एक बकरा खरीदा था...लेकिन जब अकबर इस बकरे को बेचने के लिए बाज़ार में गया तो विनोद बारेला नाम के एक शख्स ने बकरे पर अपना मालिकाना हक जता दिया
विनोद के इल्जाम के मुताबिक अकबर का बकरा दरअसल उसका था जो चार दिन पहले गुम हो गया था...और इसी वजह से विनोद ने अकबर और गजराज के खिलाफ चोरी का मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था
जिसके बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को पकड़ लिया था
बकरी चोरी का इल्जाम लगते ही अकबर सकते में आ गया...क्योंकि ये साबित करना बहुत मुश्किल था कि बकरा उसका है और उसने बकरा चोरी नहीं किया था...खुद को बचाने के लिए अकबर ने कोर्ट की शरण ली औऱ फिर शुरु हुआ ये अजीबोगरीब मुकदमा



तस्वीरें उसी वक्त की हैं जब दोनों पक्षों के साथ बकरियों और बकरे को कोर्ट में पेश किया गया था...इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कैसे ये तीनों कोर्ट के सामने खड़े हैं...इस अजीबोगरीब मुकदमे को देखने के लिए लोगों की भीड़ भी मौजूद थी....

अदालत के सामने दोनों पक्ष दो बकरियों को लेकर आए औऱ दोनों का दावा था कि उनके पास विवादित बकरे की असली मां थी
मामला पेचीदा था औऱ मुश्किल भी...विवादित बकरा काले  रंग का था और जिन बकरियों को मां बताने का दावा किया जा रहा था वो दोनों भी काली थीं...जज साहब के लिए भी फैसला देना आसान नहीं था...



इस मुश्किल से निकलने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला गया...बकरे को दोनों बकरियों के साथ छोड़ देने का फैसला किया गया और माना गया कि बकरा जिस बकरी के पास चला जाएगा वही उसकी मां है और उसी का मालिक बकरे का असली मालिक होगा
और फिर मुकदमा आगे बढ़ा.,..देखिए कैसे इन दोनों बकरियों के पास इस बकरे को छोड़ दिया गया है...हर कोई सांसें थामें इस मंजर को देख रहा था...क्योंकि लोग इस नायाब मुकदमे का नतीजा जानना चाह रहे थे...और फिर आखिरकार वो लम्हा आ ही गया जब बकरे ने अपनी मां को पहचान लिया...देखिए कैसे ये छोटा बकरा धीरे धीरे चलते हुए अपनी असली मां के पास चला गया...

जिस बकरी के पास ये बकरा गया था वो गजराज की थी जिसने अकबर को बकरा बेचा था...और ये देखने के बाद कोर्ट ने फैसला सुना दिया कि अकबर ही बकरे का असली मालिक है और गजराज ने अकबर को बकरा बेचा था ना कि चुराया था
एक बकरी के जरिए चोरी के मुकदमे का फैसला...इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ हो...लेकिन खंडवा की अदालत के इस फैसले ने दो बेगुनाहों को सजा मिलने से बचा लिया खंडवा के लोगों के लिए ये अनोखा केस था लेकिन अदालत और जज की सूझबूझ ने इस अजीब से दिख रहे केस को भी सुलझा दिया