अबयज़ ख़ान
जब आपका कोई आपसे रूठ जाए तो आप क्या करते हैं... उसे मनाने की कोशिश करते हैं न..? लेकिन फिर भी कोई आपसे रूठा ही रहे तो आप क्या करेंगे.. उसे एक बार फिर से मनाने की कोशिश करेंगे... लेकिन अगर वो आपसे मिलना ही न चाहे तब आप क्या करेंगे... क्या कोई किसी से इस कदर भी रूठ सकता है, कि वो फिर उसे मनाने का मौका भी न दे... क्या कोई गुनाह इतना बड़ा भी हो सकता है, कि उसकी माफी नहीं हो सकती... इक छोटी सी बात क्या तमाम रिश्तों को ख़त्म कर देती है, क्या तमाम जज़्बात ख़त्म हो जाते हैं... क्यों तुम मेरे साथ खुद को भी सज़ा दे रहे हो... अगर कसूर मेरा है, तो सज़ा भी मुझे मिलनी चाहिए.. तुम बेवजह गुनाह में भागीदार क्यों बन रहे हो... तुम भले ही अपने दिल पर पत्थर रखकर उसे समझाने की कोशिश करो... लेकिन मैं ये अच्छी तरह जानता हूं, कि खुश तुम भी नहीं हो...

बेशक ख़ताओं की सज़ा दी जाए.. लेकिन एक बार ख़तावार की बात भी तो सुन लेना चाहिए... ये जानते हुए भी कि कुछ गलतफहमियां किसी की ज़िंदगी को ज़र्रा-ज़र्रा भी कर सकती हैं... फिर कुछ नादानियां किसी को उम्र भर की सज़ा कैसे दे सकती हैं... मुमकिन है कोई किसी को भुला देता हो, लेकिन उसकी यादों को मिटाना तो नामुमकिन है... तस्वीरें कमरे से हटाई जा सकती हैं... लेकिन जो यादें दिलों में बस गईं उनको कैसे मिटाया जा सकता है... अपनी तस्कीन के लिए हम किसी को भुलाने की कोशिश कर सकते हैं... लेकिन भुला तो नहीं सकते न... बंदूक की गोली के ज़ख्म मुकर्रर वक्त पर भर जाते हैं... लेकिन प्यार के अंजाम में मिला ये घाव तो उम्र भर के लिए तड़पने को मजबूर कर देता है...

ये कैसे मुमकिन है, कि दो प्यार करने वाले ही फिर एक-दूसरे से हमेशा-हमेशा नफ़रत करने लगें... शिकवा तो ये कि हमने कभी खुद को बदला ही नहीं... मिले भी हर किसी से, लेकिन अफ़सोस के अजनबी ही बने रहे... प्यार कैसे किसी के लिए सज़ा बन जाता है... बाद नफ़रत के फिर एक दर्द का सिलसिला सा शुरु हो जाता है... प्यार तो हज़ार गुनाहों को माफ करता है, लेकिन फिर यही प्यार कैसे नफ़रत की वजह बन जाता है... कैसे शबनम शोलो में बदल जाती है... कैसे रुखसार पर ढलकने वाले आंसुओं का मतलब बदल जाता है... बेशक प्यार कभी कुछ जानकर नहीं होता... लेकिन एहसास तो हो ही जाता है... ज़रूरी तो नहीं कि प्यार जताने के लिए इज़हार की ज़रूरत ही पड़े...

प्यार तो आंखो की जुबां समझता है... जज़्बातों को पढ़ लेता है... कई बार तो लगता है कितनी आसान थी वो ज़िंदगी, जब हमारी सिर्फ खुशी से दोस्ती थी...अब लगता है कितनी अजीब है ज़िंदगी किसी को प्यार नहीं मिलता, तो किसी को मिलकर भी नहीं मिलता... लेकिन हमें तो कुछ पल की मोहलत भी न मिली...न तो वक्त ने हम पर रहम किया और न ज़माने ने... उनकी नज़रों ने हमें पल भर में ही रुसवा कर दिया... न हम सच्चे प्यार के काबिल रहे और न उन्होंने ही हमें एतबार के काबिल समझा... जिसके लिए रास्ते की तमाम बंदिशों को तोड़ा, एक दिन वही साथ छोड़कर चला जाता है.. बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए, बिना कुछ सुने... इक सज़ा दे जाता है... उम्र भर भुगतने के लिए...

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी, चैन से जीने की सूरत ना हुई
जिसे चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई
अबयज़ ख़ान
जुगाड़.. नाम सुनकर आपको कुछ अटपटा ज़रूर लगेगा.. लेकिन जनाब चौंकिए मत.. इस जुगाड़ पर तो आपकी और हमारी पूरी ज़िंदगी चल रही है.. ताज़ा-ताज़ा जुगाड़ आजकल झारखंड में चल रहा है.. क्या जुगाड़ लगाया, बीजेपी ने.. उन्हीं सोरेन साहब को पटा लिया, जिन्हें वो पानी पी-पीकर कोसती थी... लेकिन ये तो कुछ भी नहीं है.. जुगाड़ तो 1999 में हुआ था.. जब अटल जी एनडीए के 13 पहियों के रथ पर सवार होकर आए थे... बाद में उसमें कितने और जुड़े थे, अब तो ठीक से याद भी नहीं... लेकिन जुगाड़ का वो फार्मूला पूरे पांच साल चला था। लेकिन बात अब असली जुगाड़ की... असल में मेरा मकसद आपको जुगाड़ की यात्रा कराना था..

जनवरी के पहले हफ्ते की बात है.. मेरे चाचा और चाची हज से लौटकर आए, लिहाज़ा उनसे मिलने जाना भी ज़रूरी था... दिल्ली से खतौली तक का सफ़र तो बस से पूरा हो गया.. लेकिन खतौली से आगे उनके गांव फुलत तक जाने के लिए न तो बस थी, और न ही कोई ट्रेन... गांव तक जाने के लिए बस एक ही साधन था... जुगाड़.. क्या कमाल की गाड़ी है.. रतन टाटा देख लें तो शर्मा जाएं... उनकी लाख टके की नैनो तो जुगाड़ के आगे पानी भरती नज़र आए.. नैनो में कहां चार लोग ही बैठ सकते हैं... ज़रा वज़न ज्यादा हुआ, तो क्या भरोसा नैनो चलने से मना कर दे... लेकिन अपना जुगाड़ मस्त है... एक ही खेप में इंसान और जानवर एक साथ उसपर सवारी करते हैं... फिर भी जगह बाकी है, तो कुछ बोझा भी लाद लो... लेकिन अपना जुगाड़ उफ़ तक नहीं करता...

सड़क चाहें कैसी भी हो, ऊबड़-खाबड़ हो... पथरीली हो या रपटीली हो... जुगाड़ जब चलता है तो मस्त चलता है... उड़नखटोले जैसी दिखने वाली इस गाड़ी की डिज़ाइनिंग भी ऐसी लाजवाब कि अच्छे-अच्छे इंजीनियर भी चकरा जाएं... दुनिया में चार पहियों की इससे सस्ती गाड़ी तो शायद अबतक नहीं बनी होगी... क्या कमाल का जुगाड़ है... सबसे पहले डीज़ल इंजन के पुराने जनसैट का जुगाड़ किया... फिर कहीं से जीप का स्टैयिरंग लिया और उसमें ट्रैक्टर का गियर बॉक्स लगा दिया... एक्सीलेटर, क्लच और ब्रेक भी ट्रैक्टर के पुराने पुर्ज़ों से जुगाड़ लिये... लो जी आधी गाड़ी तो तैयार... लेकिन पहिए अभी बाकी हैं... सो पुरानी जीप और पुराने ट्रैक्टर से ये प्रॉब्लम भी सॉल्व हो गई...

इसके बाद कहीं से लकड़ी के कुछ पटले जुगाड़े और उन्हें मैकेनिक के यहां ले जाकर एक जुगाड़ वाली बॉडी बनवा ली.. फिर उसे फिट करा लिया... लो हो गया तैयार जुगाड़... न हींग लगी और न फिटकरी और रंग भी चोखा हो गया... अब चाहें इस पर खेत-खलिहान का बोझा लादो, या दरोगा जी की नाक के नीचे सवारियां भरो.. हाईवे पर दौड़ाओ या खेतों में, अपना जुगाड़ मस्त है... न रजिस्ट्रेशन का झंझट, न ड्राइविंग लाईसेंस की चिकचिक.. आखिर पूछता कौन है... बच्चे चलाएं या बूढ़े... जुगाड़ चलता जाता है... बिना किसी की परवाह किये... हिचकोले खाता.. हवा से बातें करता.. अपना जुगाड़ दौड़ता जाता है...

लेकिन जुगाड़ का भी एक दर्द है, देश की आधी आबादी उसके भरोसे टिकी है.. सैकड़ो गांव तो ऐसे हैं, जहां अगर जुगाड़ न हो, तो शायद वहां के लोग शहर का मुंह भी न देख पाएं... लेकिन फिर भी इस जुगाड़ की कोई कद्र ही नहीं... सब उसे बड़ी हिकारत की नज़र से देखते हैं... जनता के लिए बिजली सड़क पानी का दावा करने वाली सरकारों को तो शायद मालूम भी नहीं होगा, कि मुल्क में करीब आधी आबादी आज भी जुगाड़ पर टिकी है... और बाकी लोग भी देख रहे हैं, कि उनका देश भी जुगाड़ से ही चल रहा है... सरकारें ही जब जुगाड़ पर टिकी हों, तो ज़मीन पर रहने वालों को पूछता ही कौन है... सब्र कर जुगाड़ एक दिन तेरे भी पूछ होगी, जब अमेरिका चुपके से जुगाड़ का भी पेटेंट करा लेगा और फिर हम इंपोर्टेड जुगाड़ पर सफर करके बड़ा फख्र महसूस करेंगे...
अबयज़ ख़ान
बचपन में मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पड़ी थी ईदगाह... उसमें हामिद नाम का एक छोटा सा बच्चा था, जो अपनी दादी के लिए मेले से एक चिमटा लाया था, ताकि उसकी दादी के हाथ जलने न पाएं... उस कहानी को पढ़कर दो आंसू हामिद और उसकी दादी के लिए ज़रूर छलक आते थे... लेकिन न तो अब हामिद है, न उसकी दादी और न ही अब कहीं मेले नज़र आते हैं... हिंदुस्तान की पहचान मेले गांव-देहातों की शान हुआ करते थे, मेलों में सज धजकर जाना फख्र की बात माना जाता था... जहां कहीं मेला लगता था, वहां तो समझो ईद हो जाती थी.. बड़ी फुर्सत से जाते थे मेले में... दूर-दूर से नाते-रिश्तेदार भी मेला करने आते थे...

मेरे कस्बे में भी साल में कई मर्तबा मेला लगता था... लेकिन सबसे मशहूर मेला मुहर्रम का था.. दूर-दूर से दुकाने आती थीं, जिसमें बच्चों के लिए तमाम तरह के खिलौनों की दुकाने होती थीं, तो कहीं औरतों के लिए बिसातखाने की दुकाने... कहीं-कहीं हर माल वालों की दुकान भी होती थी, जहां पांच रुपये में सुई से लेकर मानों तो हवाई जहाज तक मिल जाता था... तो कहीं हल्वे-पराठे और जलेबियों की दुकाने भी लगती थी... गर्मागर्म जलेबी खाने के बाद अगर आपकी जीभ को कुछ चटपटा खाने की मंशा हो, तो समोसों से लेकर आलू टिक्की और गोल गप्पे तक हाज़िर होते थे... गोल गप्पे भी दिल्ली की तरह नहीं.. पांच रुपये में तीन... वहां तो भरपेट खाओ.. जितना मन करे, कचौड़ियों से लेकर पकौड़ियों तक.. लेकिन दाम बस एक से दो रुपये तक...

मेले में खिलौनो और खील-बताशों के बीच ही सबीलें भी लगाई जाती थीं, जहां लोगों को शर्बत पिलाया जाता था....अगर अब आप खाने-पीने और दुकानदारी से निपट गये हों, तो चले आईए मेले के दूसरे छोर पर... अहा.. क्या-क्या नज़ारे होते थे... बड़े-बड़े झूले...जिसमें बैठने के बाद रोंगटे खड़े हो जाएं... और कोई पहली बार बैठ गया, तो समझो उसको तो चक्कर आ जाए... झूले में बैठने के बाद लगता था, कि बस सबसे ऊपर तो अब हम ही हैं... मेले में फोटोग्राफर की दुकान पर सबसे ज्यादा मजमा जुटता था...नौजवान लड़के-लड़कियां बड़ी अदा के साथ उसकी दुकान पर फोटो खिंचवाते थे... कोई हाथ में टेलीफोन लेकर फोटो खिंचवाता था, तो कोई मोटरसाईकिल पर सवार होकर अपनी तस्वीर बनवाता था.. चश्मा लगाकर और बन-ठनकर फोटो खिंचवाने वालों की तो पूछिए मत...

दूसरी तरफ़ तमाशे वाले.. एक से एक तमाशे... कहीं मदारी बंदर का नाच दिखा रहा है, तो कहीं जादूगर बच्चे का सिर धड़ से काट देता था, और तमाशा देखने वाले दूसरे बच्चों का तो खून सूख जाता था... फिर जादूगर सबको धमकाकर कहता था, कि जो आदमी यहां से बिना पैसे दिये जाएगा.. वो घर तक सही सलामत नहीं पहुंच पाएगा... उसको जादू के करतब से मैं बीमार कर दूंगा... और मासूम बच्चे डर के मारे घर से जो पैसे लेकर आते थे, वो सब उसी को देकर चले जाते थे... इसके बाद बारी आती थी सर्कस की... अजब-गजब करतब करती लड़कियों को देखने के लिए पूरा का पूरा कस्बा जुट जाता था... सर्कस के बाहर शेर का बड़ा सा बोर्ड भी लगा होता था, लेकिन शेर कभी नज़र नहीं आया...

वहीं पास में ही एक छोटा सा सनीमा वाला रोज़ाना तीन शो... शोले..शोले..शोले... सुपर डुपर हिट फिल्म... ज़रुर देखिए.. ज़रूर देखिए की आवाज़ लगाता था... सनीमा क्या था... पूरा जुगाड़ था... पटलों पर बैठकर वीसीआर पर फिल्म देखते थे... सनीमा से फ्री होने के बाद देर रात में एक और शो चलता था... नाम था डांस पार्टी... पता नहीं कहां से उसमें लड़कियां डांस करने आती थीं.. लेकिन उसमें मजमा बहुत जुटता था... देर रात तक डांस पार्टी चलती थी... और बिगड़ैल शहज़ादे उसमें पैसे लुटाकर देर रात घर लौटते थे...

सनीमा और सर्कस से निपट गये हों, तो चलिए आपको लेकर चलते हैं अजब अनूठे करतब में... जहां एक आदमी ऐलान करता है, कि वो बारह दिन तक साईकिल पर ही सवार रहेगा और बारहवें दिन समाधि ले लेगा... अजीबो-गरीब तमाशा होता था वो... आदमी बारह दिन तक साईकिल चलाता रहता था... उसी पर बैठकर खाता था... उसी पर नहाता था... गरज ये कि बारह दिन तक सारे काम साईकिल पर ही बैठकर करता था, फिर बारहवें दिन एक बड़ा सा गड्डा खोदा जाता था, जिसमें वो साईकिल समेत चला जाता था... फिर उसकी कब्र बनाई जाती थी, मतलब ये कि ज़िंदा आदमी कब्र में दफ्न.. फिर उसे दो दिन बाद कब्र से निकाला जाता था... और वो उसमें से जिंदा निकलता था... लेकिन इतना सब करने के बाद भी उसे मामूली से पैसे मिलते थे... लेकिन पेट भरने के लिए शायद उतना ही काफी होता था... हां इतना ज़रूर होता था, कि उस वक्त तमाशे और मेलों में भीड़ बहुत जुटती थी.. शायद उस वक्त लोगों को फुर्सत बहुत रही होगी... अब न वो मेले हैं और न फुरसत के वो चार दिन... जाने कहां गये वो मेले...
अबयज़ ख़ान
चलिए नए साल पर एक खुशख़बरी उन मर्दों के लिए जो शादी के बाद भी पति-पत्नी और वो के चक्कर से निकले नहीं हैं... और खुशख़बरी उनकी पत्नियों के लिए भी जो अपने दिलफेंक मियां से आजिज़ आ चुकी थीं... घबराइये मत... जो काम आपके पति कर रहे हैं वो उनकी ज़िंदगी में तो रंग भर ही रहा है, आपकी शादी-शुदा ज़िंदगी में भी उससे बहार आ जाएगी... अरे ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं... बल्कि ये नया राग तो अंग्रेज़ों की देन है... और वो भी कोई अंग्रेज़ पुरुष नहीं, बल्कि एक फिरंगी महिला... फ्रांस की मशहूर साइक्लोजिस्ट मैरसी वैलेंट कहती हैं, कि अगर आपके पति परमेश्वर किसी दूसरी मोहतरमा से आंख लड़ा रहे हैं, तो उनके पीछे चाकू लेकर भागने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि अब तो आपको खुश होना चाहिए... और अगर उनकी ज़िंदगी में कोई वो है, तो घबराइये मत, क्योंकि इससे आप दोनों के रिश्तों में गर्मी आने के बजाए नरमी आएगी... और ज़िंदगी पहले से ज्यादा बेहतर हो जाएगी... आपको यकीन न हो, तो अंग्रेज़ी की ये चार लाइने भी पढ़ लीजिए... पूरा माजरा समझ में आ जाएगा...

If your husband is enjoying a secret rendezvous with another women, don't run after him with a knife, for the extra-marital affair is a sign that your marriage is a healthy one.
That's the claim of France''s most prominent female psychologist Maryse Vaillant in controversial new book on the effects of infidelity on married life, Men, Love, Fidelity, reports The Telegraph.

मैडम मैरसी के मुताबिक इसे बेवफ़ाई भी नहीं माना जा सकता... और अगर आपके पति इस तरह के रिश्तों में भरोसा रखते हैं, तो उन्हें अकेला छोड़ दीजिए, क्योंकि कुछ दिन बाद वो इसे खुद ही छोड़ देंगे... पता नहीं फ्रांस की इन साइक्लोजिस्ट मैडम का दावा कितना सही है, लेकिन इतना तो तय है कि इसे पढ़ने के बाद टाइगर वुड की पत्नी पर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाज़ा आप खुद ही लगा लीजिए... और टाइगर वुड का तो पूछिए ही मत, पांचो उंगलियां तो पहले ही घी में थीं, अब सर भी कढ़ाही में है... वो तो पति-पत्नी और वो से भी आगे बढ़ चुके थे... वो-वो करते-करते उनकी तो 18 वो हो गईं थीं, गजब मैनेजमेंट है भाई... वाह भई वाह... चलो टाइगर वुड्स के अलावा किसी और को भी राहत मिली... हमारे यहां भी एक नेताजी हैं... बड़े रंगीले.. बड़े रंगीन मिजाज़.. कौन नहीं जानता, उनके बारे में... कितना नाम छपा उनका अख़बारों में, कितनी बार बेचारे टीवी पर आए... इसको कहते हैं न हींग लगी न फिटकरी और रंग चोखा हो गया...उम्र भले ही पचपन की थी, लेकिन मन बेचारा जवानी का ही था...

आखिर दिल पर किसका बस चलता है.. दिल तो बेचारा है... प्यार का मारा है... डर लगता है तन्हा सोने में जी.. दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी... फ्रांस की मोहतरमा मैरसी की किताब तो मार्केट में आने के बाद ही कोहराम मचा रही है... अंग्रेज़ तो उनकी इस थ्योरी को शायद इसको हज़म भी कर जाएं.. क्योंकि विदेशों में तो ये सब वैसे भी चलता है.. लेकिन अपने हिंदुस्तान के घरों में ज़रूर पड़ोस के घर से बेलन चलने की आवाज़े सुनाई पड़ने लगेंगी... ज़रा एक बार को मान लीजिए कि ये थ्योरी अपरूव्ड हो गई तो क्या होगा...खुदा की कसम कयामत हो जाएगी... पति-पत्नी और वो के किस्से हर मुहल्ले से सुनाई पड़ने लगेंगे...ज़रा रिश्तों में खटास आई नहीं, कि मश्विरे देने वालों की कतार लग जाएगी... कोई कहेगा मेरा ख्याल है, तुम अपने पति की किसी से सैटिंग करवा दो, फिर देखना कैसे तुम्हारे पति तुम्हारी उंगलियों पर नहीं नाचते हैं... मेरे पति की तो कई सैटिंग्स हैं, मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता... वो तो मेरे एक इशारे पर चलते हैं... टोने-टोटको में एक नया टोटका ये भी शामिल हो जाएगा...वाह जी वाह, क्या थ्योरी है...रिश्ते फिर से बहाल करने के लिए।
अबयज़ ख़ान
भरोसा क्यों और किस पर किया जाए... किसलिए किया जाए... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने आपको अपनी कसम खाकर ये एतबार करा दिया, कि मैं तुम्हारा भरोसा कभी डिगने नहीं दूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने अपने बच्चों की कसम खाकर ये एतमाद दिला दिया, कि मैं तुम्हारे साथ दगा नहीं करूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने तुम्हारे कंधे को हल्के से अपने हाथों से दबा दिया... और तुम्हें इस बात की तसल्ली दे दी, कि मेरे दोस्त बुरे वक्त में मैं ही तुम्हारे साथ हूं.. ज़माना तो बहुत ख़राब है और तुम अपने दिल के राज़ मुझसे शेयर कर सकते हो.. तुम अपनी ज़िंदगी का फलसफा मेरे सामने रख सकते हो.. तुम अपनी कहानी मुझे सुना सकते हो.. तुम अपना हाले-दिल मुझसे कह सकते हो...

तुम अपनी ज़िंदगी का कभी न खोलने वाला राज़ भी मुझे बता सकते हो, और मेरा वादा है तुमसे कि तुम्हारा ये राज़ कभी फरिश्तों को भी पता नहीं चल पाएगा... मेरा वादा है ये तुमसे, कि मैं तुम्हारा एतबार टूटने नहीं दूंगा... मेरा वादा है तुमसे, कि तुम्हारा ये राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएगा... और हम अपनी ज़िंदगी की किताब के वरक खोलकर उसके सामने रख दें... क्या कोई राज़ किसी को सिर्फ़ इसलिए बता दिया जाए, क्योंकि उसने आपको अपने कुछ ज़ाती राज़ बता दिये हैं... लेकिन बावजूद इसके इस बात की क्या गारंटी है कि इसके बाद दुनिया में कोई भी आपके निजी माअमलात में दख़लअंदाज़ी नहीं कर पाएगा... आपके राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएंगे...

आप पर उंगली उठाने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा... क्या ऐसा सचमुच होता है, जब आप किसी को अपने राज़ बता देते हैं और उसके बाद आपकी निजी ज़िंदगी में चैन-सुकून आ जाता है... कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता... मेरा अपना तजुर्बा तो कहता है कि इसके बाद आपकी टेंशन और बढ़ जाती है... और आपको हमेशा इसी बात का डर सताता रहता है कि पता नहीं वो कब मेरे राज़फ़ाश कर दे... कई बार ऐसा होता है, कि जिसे आपने सबसे ज्यादा अज़ीज़ समझकर अपना राज़दार बनाया, कुछ दिन बाद उसी के साथ रिश्तों में दरार आ गई... फिर इस बात की क्या गारंटी है, कि वो आपके राज़फ़ाश नहीं करेगा...

शायद इसीलिए आपको कई बार ऐसे शख्स की खुशामद भी करनी पड़ती है, जिसे आप रत्तीभर भी पसंद नहीं करते... सिर्फ़ इसीलिए कि कहीं वो आपके राज़ बेपर्दा न कर दे... आखिर इस भरोसे का भरोसा है क्या..? आखिर इंसानी फितरत का भरोसा क्या है...? आखिर इस भरोसे का पैमाना क्या है..? शायद इन तमाम सवालों का जवाब किसी के पास नहीं होगा, और अगर हुआ, तो यही कि किसी न किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा ही, वरना इसके बिना तो ज़िंदगी का पहिया घूमने से रहा... या फिर आप लोग भी यही कहेंगे कि राज़ को राज़ ही रहने दो... क्योंकि पर्दा जो उठ गया, तो फिर गिर नहीं पाएगा... और ज़माने का भरोसा क्या इसकी तो फितरत ही ज़ालिम है...

वरना क्या भरोसा उसके वादे का मगर..
दिल को खुश रखने को एक वादा तो है...
अबयज़ ख़ान
कोहरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था.... हाथ को हाथ नज़र नहीं आ रहा था... लेकिन फिर भी घर तो पहुंचना ही था.. रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे... मोटरसाइकिल पर चलना दूभर हो चुका था... सड़क पर हर तरफ़ बस कोहरा ही कोहरा था... आगे वाली कार के पीछे मैं चलता चला जा रहा था...घर किस रास्ते पर है मालूम नहीं पड़ रहा था... धुंध में दो पग भी चलना मुश्किल था... बाइक दस किलोमीटर की रफ्तार से रेंग रही थी... सड़क पर सन्नाटा पसरा था... लोग अपने-अपने घरों में बिस्तरों में दुबके थे... घर का रास्ता कोसों दूर लग रहा था... दफ्तर से मेरा घर बामुश्किल पांच या छह किलोमीटर होगा... लेकिन कोहरे की चादर में ये रास्ता लगातार लंबा होता जा रहा था... कोहरे ने हेलमेट के शीशे पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था... हेल्मेट हटाते ही मुंह पर ओस की बूंदे गिरने लगती... हालांकि ठंड में कंपकपी छूट रही थी...लेकिन मौसम का एक रुमानी अंदाज़ ये भी अच्छा लग रहा था...
दास्तानों में होने के बावजूद हाथ बर्फ़ हो चुके थे... जो कार आगे चल रही थी, कुछ दूर चलने के बाद वो अचानक ओझल हो गई.... अब मेरे लिए एक कदम बढ़ाना भी मु्श्किल हो चुका था... मैं किस रास्ते पर जा रहा हूं... मुझे कुछ पता नहीं था... कुछ दूर चलने के बाद मुझे मेरी तरह ही बाइक पर एक और शख्स नज़र आया... सोचा इन्हीं जनाब से रास्ता पूछ लिया जाए... लेकिन शायद वो खुद भटके हुए थे... खैर जैसे-तैसे घर पहुंचा... करीब डेढ़ बज चुका था.. दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा हुआ... घर में घुसते ही न आव देखा न ताव... जल्दी से रज़ाई उठाई और बिस्तर के आगोश में जाने में ही भलाई समझी... लेकिन नींद इतनी जल्दी कहां आना थी... अब तो आदत पड़ चुकी थी देर रात सोने की... और तकरीबन रात के ढाई बजे ही जाकर आंख लगी होगी...

रात गहराने के साथ ही बिस्तर लगातार सर्द होता जा रहा था... याद आ रहा था बचपन और बचपन की कहानियां... मुंशी प्रेमचंद का हल्कू मेरी आंखो के सामने खड़ा था.. जिसने साहूकार का कर्ज़ चुकाने की खातिर अपने लिए कंबल तक नहीं खरीदा... और पूरी रात जंगल में ऐसे ही ठिठुरते हुए गुज़ार दी थी... हल्कू तो अब भी बहुत हैं.. लेकिन उनका दर्द समझने वाला कोई मुंशी प्रेमचंद शायद अब नहीं है... मैंने सुबह दस बजे का अलॉर्म लगाया था... लेकिन आंख सुबह सात बजे ही खुल गई... किसी ने दरवाज़े पर नॉक किया था... मन किया उठते ही जो भी होगा उसे दो-चार बातें तो ज़रूर सुनाऊंगा... सुबह-सुबह ही नींद खराब कर दी... लेकिन दरवाज़ा खोला तो कामवाली बाई खड़ी थी... ठंड में ठिठुरते हुए...

कोहरा अब भी रात जैसा ही पसरा हुआ था... मौसम अब भी उतना ही सर्द था... उसके जिस्म पर इतनी ठंड में भी एक पुरानी सी शॉल थी.. कपड़ों की हालत देखकर लग रहा था, कि इससे पहले वो दूसरे घर में काम करके आई है... और अब यहां... बाप रे बाप.. इतनी सर्दी में अपना तो पानी में हाथ डालने को भी दिल नहीं करता... और ये लोग घर से बाहर ठंड में सिकुड़े जा रहे हैं...दरवाज़े में अख़बार का बंडल भी पड़ा था... जो अख़बार वाला लड़का सुबह ही डाल गया था... ठंड में अपनी साईकिल पर... आंधी हो या तूफान, जाड़ा हो या बरसात... उसे तो काम पर जाना ही है... दुनिया सोती रहे... अखबार वाला लड़का कभी नहीं सोता... दूधवाला तय वक्त पर दूध देने आ जाता है... भले ही वो पानी पहले से ज्यादा मिलाता हो... लेकिन उसके भी आने का वक्त नहीं बदला... दरवाज़े पर बर्तन में दूध भी रखा हुआ था...

गली में अब भी दस-पंद्रह साल के दूसरे लड़के अख़बार के बंडल बना-बनाकर दूसरों के घर में फेंक रहे थे.. तन पर उनके एक स्वेटर से ज्यादा कुछ भी नहीं था... साईकिल के हैंडल पर उनकी उंगलियां ठंड में काली पड़ चुकी थीं... पैरों में हवाई चप्पल के बावजूद वो सर्दी के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं थे... हवा के थपेड़ों में उन्होंने ज़िंदगी जीना सीख लिया था... और इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे, कि ये मौसम तो अमीरों के लिए बने हैं... सर्दियों में गर्म कपड़े, रज़ाई में चाय के साथ मूंगफली और गजक... कमरे में गर्म हीटर... ये सब तो बड़े लोगों के चोंचले हैं.... लेकिन उन बदनसीबों को तो हर दिन काम पर जाना है... उनको न सर्दी लगती है, न गर्मी और न बारिश के थपेड़े उनका रास्ता रोक पाते हैं... उन्हें तो सिर्फ़ भूख लगती है... और घर पर बच्चे उनका इंतज़ार करते हैं....
अबयज़ ख़ान
इस प्यार को कोई नाम न दो.. इस एहसास को कोई नाम न दो.. इस जज़्बात को कोई नाम न दो... मगर ये कैसे मुमकिन है... जब एक ज़िंदगी दूसरी ज़िंदगी से मुकम्मल तरीके से जुड़ी हो... आंखो में लाखों सपने हों... दिल में हज़ारों अरमान हों... हज़ार ख्वाहिशें हों... फिर कैसे कोई नाम न दें... एक ही सफ़र के दो मुसाफिर थे... कुछ दूर चलकर बेशक रास्ते बदल गये हों... लेकिन मंज़िल तो एक ही थी... मकसद भी एक ही था... सुबह के सूरज की पहली किरन की तरह उसका एहसास था... शाम की लाली की तरह उसके उसके रंग थे... बदलते मौसम की तरह उसकी छुअन थी... हर एहसास अपने आप में अनूठा था.. हर जज़्बात के पीछे एक पूरी ज़िंदगी थी...

उसकी महक से सारा जहान महक उठता था.. उसके आने से ही हवाएं भी मदमस्त होकर चलती थीं... उसके आने की जब ख़बर महकी, उसकी खुशबू से मेरा घर महका... उसकी खुशबू से मेरा मन महका... ज़िंदगी फूल की पत्तियों की तरह और नाज़ुक हो गई... दिन पहले से और बड़े लगने लगे... इंतज़ार और भी बेहतरीन लगने लगा... वक्त की शायद इफ़रात हो चुकी थी... तमाम उम्र भी कम लगने लगी... सात जन्म भी कम लगने लगे... उसके आने की ख़बर से ही दिल बेकरार होने लगता... उसके जाने की ख़बर से बेचैनियां बढ़ जातीं... मुझे सरे-राह कोई मिला था... और मेरी ज़िंदगी में दाखिल हो चुका था... अगले जन्म में भी उसके साथ के लिए दुआएं होने लगीं...

ज़िंदगी फिर से बदल चुकी थी... सांसो की रफ्तार वक्त के साथ बदलने लगी... अब पहले से ज्यादा रवानगी आ चुकी थी... आंखो से उदासी गायब हो चुकी थी... ज़िदगी और भी हसीन हो चुकी थी... मौहब्बत ने अदावत को शिकस्त दे दी थी... हसरतें हिलोरें मारने लगीं... मन करता था, कि दुनिया की निगाहों से बचने के लिए समंदर को पार कर जाएं... और ये समंदर इतना बड़ा हो जाए, कि हमारी ज़िदगी के साथ-साथ चलता रहे... कभी ख़त्म न हो और अपने आगोश में समा ले... दुनिया के रंग अब और भी खूबसूरत लगने लगे थे.... तमाम कायनात से मौहब्बत होने लगी... उजड़े दयार में उसके कदम ऐसे पड़े, कि सबकुछ जन्नत नज़र आने लगा...

फूल इतने खूबसूरत लगने लगे, कि उसमें से ग़ज़ल निकलने लगी... उर्दू से बेपनाह मौहब्बत हो गई... उसकी छोटी-छोटी खुशियां जान से भी ज्यादा प्यारी लगने लगीं... मन करता कि काश अपनी एक अलग दुनिया हो, जहां कोई रोक-टोक न हो... जहां सबकुछ अपनी मर्ज़ी से हो... जहां किसी की दख़लअंदाज़ी न हो... जहां उसके साथ सिर्फ़ मैं हूं... और इसके सिवा कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं... सिर्फ़ हो तो बस इश्क की कैफियत... मौहब्बत का एक खुशनुमा एहसास.... हमारे दरम्यान न उदासी हो... न तन्हाई हो... अगर हो तो सिर्फ़ एक खुशनुमा एहसास... रंग भरा एहसास...एक हल्की सी छुअन...

लेकिन शायद ये सबकुछ इतना आसान नहीं था... मकतबे इश्क में हमने एक ढंग ही निराला देखा... उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ.... अब हर तरफ़ सन्नाटा है... ऐसा लगता है, जैसे वक्त से पहले पतझड़ आ चुका हो... पेड़ों से पत्ते सब झड़ चुके हैं.. मौसम करवट बदल चुका है... लेकिन अफ़सोस ये कि बसंत भी तो नहीं आया... अब न फूलों से ग़ज़ल निकलती है... न उर्दू से मौहब्बत है... न सांसों में पहले की तरह रवानगी है... अब समंदर से भी डर लगता है... अब उनींदी आंखो में सपने भी नहीं आते... अब न रुमानियत है.... न जाने क्यों एसा लगता है जैसे कोई सफ़र में साथ था मेरे... फिर भी संभल-संभल के चलना पड़ा मुझे... अब इंतज़ार है बस फिर से मौसम बदलने का.... और मुझे यकीन है... पतझड़ के बाद फिर से बहार आएगी... और मौसम फिर से पहले से भी ज्यादा हसीन हो जाएगा...