अबयज़ ख़ान
अपनी मां के पेट में नौ महीने रहने के दौरान उसने दुनिया में आने का ख़्वाब देखा था। दुनिया के रंग देखने को वो बेताब थी। मां के पेट में रहने के दौरान उसने ढेर सारी रंग-बिरंगी कहानियां सुनी थीं। मां जब अपने प्यार के बारे में बातें करती थी, तो वो खुशी से पागल हो जाती थी। दुनिया में आने को उसकी बेकरारी और बढ़ जाती थी। सपनों भरी दुनिया में उसने अपने लिए कई ख्वाब सजाए थे। नौ महीने का सफ़र उसे बहुत लंबा लगने लगा था। मां की कोख के बाद वो उसके आंचल में समां जाने को बेकरार थी। मां से लोरी सुनकर वो सपनों की दुनिया में खो जाना चाहती थी। और अपने पापा की उंगली पकड़कर पूरी दुनिया का चक्कर लगाना चाहती थी। बाहर की हवा का एहसास ही उसके रोम-रोम में बस चुका था। चांद-तारों की कहानी सुनने के बाद वो उन्हें अपनी आंख से देख लेने को बेताब हो चुकी थी। उसकी भी तमन्ना थी की ज़मीन पर क़दम रखने के बाद उसे भी गुड्डे-गुड़ियों से केलने का मौका मिले। लंबे इंतज़ार के बाद आखिर वो लम्हा भी आया जब उसने दुनिया में कदम रखा। पहली बार आंख खोली तो उसकी तमन्ना उस मां को देखने की थी, जिसने उसे इतने जतन से अपनी कोख में पाला था। लेकिन ये क्या मां तो कहीं थी ही नहीं। उसने ज़मीन पर क़दम भी रखा तो लावारिस की तरह। न तो उसे मुलायम बिस्तर मिला और न ही मां की गोद मिली। और न ही उसके जन्म का इंतेज़ार करने वाले पापा की बेकरारी को ही वो देख सकी। उसकी आंखे बदहवास सी अपनो को तलाशने लगीं। लेकिन उसके चारों तरफ़ तो तमाशाई खड़े थे। लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लेकिन किसी को भी उसकी मां का पता नहीं था। उसे तो किसी ने पास के कूड़े के ढेर से उठाकर किसी ख़ैराती अस्पताल में भर्ती करा दिया था।



अस्पताल के बिस्तर पर बदहवास सी पड़ी नन्हीं सी जान को मालूम भी नहीं था कि उसका क्या कसूर है। आखिर उसकी मां उसे इस तरह लावारिस क्यों छोड़ गई। आखिर उसकी पैदाईश पर खुशी के गीत क्यों नहीं गाये जा रहे थे। बधाई का नेग लेने वाले भी वहां नहीं थे। न तो उसकी मां वहां मौजूद थी, और न ही कोई उसके लिए खुशियां मना रहा था। उसके जन्म पर मिठाई बंटना तो दूर लोग उसके दुनिया में आने पर ही सवाल उठा रहे थे। कोई उसकी मां के बारे में तरह-तरह की बाते कर रहा था, तो कोई उसकी हालत पर तरस खा रहा था। लेकिन ये मासूम बार-बार यही पूछ रही थी कि आखिर मेरा क्या कसूर था? मां आखिर तुमने मुझे लावारिस की तरह जन्म ही क्यों दिया? अगर जन्म के बाद मुझे इसी तरह दूसरों के रहमों-करम पर छोड़ना था, तो तुमने मुझे पैदा होने से पहले ही मार क्यों नहीं दिया। और अगर तुम्हारे सामने दुनिया का सामना करने की हिम्मत ही नहीं थी, तो तुमने प्यार में हदों को पार ही क्यों किया? और जब ज़माने के सामने तुम्हारी असलियत खुलने का मौका आया, तो तुम मुझे चुपचाप लावारिस की तरह जन्म देकर निकल गईं। मां तुमने तो मुझे मारने का पूरा इंतज़ाम भी कर लिया था। और अगर कोई खुदा का बंदा मुझ पर दया न दिखाता तो शायद मैं तो आवारा कुत्तों का शिकार बन जाती। अब तुम्हारी इस दरियादिली को मैं क्या नाम दूं। मैं तो चाहकर भी तुम्हें मां नहीं कह सकती। क्योंकि तुम तो ये अधिकार भी खो चुकी हो। तुमने भले ही मुझे नौ महीने तक अपनी कोख में पाला, लेकिन तुम्हारा दिल तो ज़रा भी नहीं पसीजा। आज भले ही मैं किसी और के आंगन में खेल रही हूं लेकिन मां तुमसे मेरा बस एक यही सवाल है कि आखिर मेरा कसूर क्या था?
4 Responses
  1. OM Says:

    nice,दिल को छू गयी.....


  2. विनय Says:

    हृदय्स्पर्शी लेख

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    चाँद, बादल और शाम पर आपका स्वागत है|



  3. जीने के लिये इस दुनिया में ग़म की भी ज़रुरत होती है. हृदयस्पर्शी लेख.