अबयज़ ख़ान
ये बच्चे नहीं पटाखा हैं। ज़ीटीवी पर आजकल एक शो आ रहा है लिटिल चैंप्स। इसमें शामिल सभी 12 बच्चे एक से बढ़कर एक हैं। इतनी कम उम्र में इन बच्चों को सुरों की इतनी समझ है, कि अच्छा-अच्छा आदमी दांतो तले उंगली दबा ले। लेकिन यहां पर नई बात ये नहीं है। बल्कि दिलचस्प तो ये है कि इस प्रोग्राम में एक छोटी से एंकर है, जो अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर सकती है। दरअसल अफशां नाम की ये बच्ची आई तो थी सिंगर बनने, लेकिन उसकी हाज़िर जवाबी देखकर अभिजीत और अलका ने उसे एंकर बनाने का फैसला कर लिया। अफ़शा मुसानी नाम की ये बच्ची जब स्टेज पर एंकरिंग करती है, तो बड़ों-बड़ों के कान काट लेती है।

चार या पांच साल की इस बच्ची को देखकर यकीन ही नहीं होता कि ये अपनी उम्र से इतनी ज्यादा समझदार है। यूं तो स्टेज पर खड़े होना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती, लेकिन अफ़शां मुसानी की अदाकारी में वो कॉंफिडेंस है कि पूछिए मत। उसकी हाज़िर जवाबी का आलम ये कि अभिजीत और अलका याज्ञिक तो क्या बड़े-बड़े धुरंधर उसके सामने खुद को चित्त समझते हैं। दिलचस्प नज़ारा तो तब देखने को मिला था, जब मुंबई की ये बच्ची सिंगर बनने के लिए ऑडिशन देने आई थी। लेकिन ऑडिशन के दौरान उसने वो मस्ती की, कि आयोजकों का इरादा ही बदल गया। जब ऑडिशन के दौरान अलका याज्ञिक ने उससे सवाल पूछे, तो उसने ऐसे चटपटे जवाब दिये कि हर कोई उसके जवाबों पर लोटपोट हो गया।

बच्ची के जवाबों पर हंसते हुए अलका ने उसकी मम्मी से पूछा कि इसके जन्म के वक्त आपने क्या खाया था, तो उससे पहले ही अफ़शां बोल पड़ी, मेरी मम्मी ने बड़ा-पाव खाया था। मैं इस प्रोग्राम को लगातार देखता हूं, सिर्फ़ इसी को नहीं बल्कि बच्चों से जुड़े शायद सभी प्रोग्राम। इसकी एक वजह भी है। जो काम हम अपने बचपन में नहीं कर पाए, उन्हें ये बच्चे इतने कॉन्फिडेंस से पूरा कर रहे हैं कि सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। दरअसल हमारे ज़माने में न तो इतनी सुविधाएं थीं और न ही हमारे घरवालों ने प्रतिभा को तराशने की ज़रूरत महसूस की। अगर कभी छिपकर टीवी देख लिया, या कॉमिक्स पड़ ली, तो समझिए धुनाई होना पक्की बात थी। और अगर कहीं क्रिकेट खेलने चले गये, तो समझिये उस दिन शामत तय थी।

मां-बाप को बस एक ही चीज़ से मतलब था, कि बच्चे पढ़कर नवाब बनें। लेकिन आज ज़माना बदल गया है, आज के बच्चे कहते हैं कि पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे ख़राब और खेलेगो कूदोगे, तो बनोगे नवाब।। और ऐसा हो भी रहा है, आज़ के ज़माने के बच्चे तो रफ्तार से भी तेज़ दौड़ रहे हैं। साथ में उनके मां-बाप भी कदम से कदमताल मिलाकर अपने बच्चों के लिए खून-पसीना एक कर रहे हैं। कलर्स पर बालिका वधु और सलोनी धूम मचाए हुए हैं, तो कई चैनल्स बच्चों को लेकर प्रोग्राम बना रहे हैं। अब ये बच्चों के टैलेंट का कमाल है, या बाज़ार की बढ़ती मांग। अब एनिमेटिड प्रोग्राम और कार्टून नेटवर्क बच्चों की फेवरिट लिस्ट में नहीं हैं। अब वो खुद स्टेज पर खड़े होकर अपने सुरों का संग्राम छेड़ रहे हैं, तो ठहाकों से लोगों के मन में गुदगुदी पैदा कर रहे हैं।

आमिर खान की फिल्म तारे ज़मीं पर को शायद ही कोई भूला होगा, जिसमें नन्हें दर्शील सफ़ारी ने अपनी एक्टिंग से दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया था। तो स्लमडॉग मिलेनियर के अज़हर और रुबीना को कौन नहीं जानता, जो अपनी एक्टिग की वजह से आज देशभर में नाम कमा रहे हैं। इन बच्चों को इतनी कम उम्र में नेम-फ़ेम-गेम मिल गया जब इनमें से कई को अपना नाड़ा बांधना भी नहीं आता होगा। पहले मां-बाप अपने बच्चों से अपना नाम रोशन करने के लिए कहते थे, लेकिन आज उनकी पहचान अपने बच्चों से ही है। आज सलोनी, अविका, अज़हर, रुबीना, दर्शील ओर अफ़शां के मां-बाप को उन्हीं की वजह से पहचान मिली है। ये बच्चे अब ख़बर बनते हैं, इनकी हर हलचल पर मीडिया की नज़र रहती है। इनकी हर हलचल, टीवी चैनल्स की हेडलाइन बनती है। ये बच्चे वाकई लाजवाब हैं, इनकी कामयाबी देखकर रश्क होता है। इनको देखकर लगता है कि हिंदुस्तान सचमुच तरक्की के रास्ते पर बढ़ चला है। ये बच्चे उधम नहीं मचा रहे हैं, बल्कि ये तो धूम मचा रहे हैं। इन बच्चों को देखकर कई बार मन होता है कि इन्हें किसी म्यूज़ियम में रख लूं, तो कई बार खुद से भी जलन होती है। कि हम बचपन में इतने बुद्धु कैसे रह गये।
2 Responses
  1. रंजन Says:

    ये पटाखा तो हमने भी देखा है.. कमाल का है..


  2. लेकिन शायद ये भी सच है की ये बच्चे अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं...