अबयज़ ख़ान


मेरी किस्मत और मेरा चांद
मुझसे खेल रहे थे लुकाछिपी का खेल

मेरा चांद मेरे क़रीब आकर भी दूर हो जाता
और मेरी किस्मत मुझे ठेंगा दिखा जाती।

चौदहवीं की रौशनी में चमकने के बावजूद
नजूमी के पन्नों में दमकने के बावजूद

दूरियों का दायरा...
चांद और किस्मत के दरम्यान और बढ़ गया

और मैं फ़ैसला लेने में लाचार था
कि मेरी किस्मत बुलंद है
या मेरा चांद मेरी ज़िंदगी है

आख़िर ज़िंदगी के एक मोड़ पर
मेरा चांद बेज़िया होने लगा
और किस्मत ने लुकाछिपी के
इस खेल में मुझे मात दे दी।।
(बेज़िया मतलब डूबना)
9 Responses
  1. अच्छा !! ये हुनर भी है... वाह


  2. वाह खूबसूरत... वाकई खूबसूरत..


  3. वाह, बहुत उम्दा!


  4. shweta Says:

    ye kismat, kitne khel khelti hai , kab kya khel khele, nahi malum. kaash ki is kismat ko hum apne ishaare par nacha sake. socho agar aisa hota toh zindagi kis tarah ki hoti....


  5. abhi to किस्मत बुलंद है...na??


  6. वाह, बहुत उम्दा!



  7. Kya bhai! Chand aur kismat dono ne hi dhokha diya.....
    Chand doosra a jaega...
    Insh' Allah, kismat bhi chamkegi!
    Main dua karunga!


  8. Kya bhai! Chand aur kismat dono ne hi dhokha diya.....
    Chand doosra a jaega...
    Insh' Allah, kismat bhi chamkegi!
    Main dua karunga!