अबयज़ ख़ान
मां... मैंने कभी ख़ुदा की सूरत तो नहीं देखी..
मगर तेरे चेहरे में मुझे भगवान नज़र आता है..



मां जब मैंने इस दुनिया में आंखे खोली थीं... तो सबसे पहले तेरा ही चेहरा नज़र आया था.. तुम्हारे नाज़ुक हाथों में मेरी परवरिश हुई.. उंगली पकड़कर आपने ही तो मुझे चलना सिखाया था.. जब मैंने बोलना शुरु किया था, तो सबसे पहले मेरे मुंह से मां ही तो निकला था.. और तुम कैसे ख़ुशी से चहकी थीं... देखो-देखो.. उसने मुझे मां कहा है... घुटनों के बल चलते वक्त जब मुझे ज़रा सी ठेस लग जाती थी, तो कैसे तुम्हारा कलेजा छलनी हो जाता था.. जब मैंने होश संभाला, तब सबसे पहले तुमने ही मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था... उसके बाद स्कूल जाने से पहले तुमने ही तो मुझे घर में क ख ग घ सिखाया था... तुम मेरी मां के बाद मेरी पहली टीचर भी तो बनीं थीं... फिर जब मैं पापा की उंगली पकड़कर स्कूल जाने लगा, तो तुम सुबह सवेरे ही मेरे लिए उठ जाती थीं... पहले मुझे नहलाना-धुलाना, फिर जल्दी से नाश्ता बनाना.. मां तुम्हारे दिन की शुरुआत तो इसी के साथ ही होती थी...

जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा...फिर मेरी फ़रमाइशें बढ़ने लगीं... मेरे नख़रे बढ़ने लगे... मेरी शैतानियां बढ़ने लगीं.. लेकिन तुमने हमेशा किसी साए की तरह मेरा साथ निभाया... मैं बीमार हुआ, तुम रातों को भी मेरी ख़ातिर नहीं सोईं... मुझे दर्द हुआ.. तुम हमेशा मेरी ख़ातिर रोईं... लेकिन मेरी एहसानफ़रामोशी तो देखो...तुम्हारे खाने से लेकर तुम्हारी बातों तक हर किसी में मुझे ऐब निकालने की आदत थी.. लेकिन तुमने तो कभी उफ़ तक नहीं की... मैंने कितनी बार ज़िद की होगी तुमसे.. लेकिन तुम कभी ख़फ़ा भी तो नहीं होती थी... कितनी बार तुमसे झूठ भी बोला होगा.. लेकिन कभी मुझे सज़ा तक नहीं दी... मुझे अगर ज़ख्म हो जाए... तो मेरी मां की तो जान ही निकल जाती थी... मेरे स्कूल से देर हो जाने पर कैसे तुम बैचेन हो जाया करती थीं... जब पापा कभी मुझे डांटते थे, तो कैसे तुम मुझे अपने पीछे छिपा लिया करती थीं...

ज़िदगी की धूप में ख़ुद को खड़ा करने वाली मां, हर घड़ी सिर्फ़ मेरे लिए ही दुआ करती है...
मैं जब बड़ा हुआ तो स्कूल से कॉलेज जाने का वक्त आया.. लेकिन घर से बाहर जाने के बारे में सुनकर ही मां कैसे परेशान सी हो गई थीं.. उनके जिगर का टुकड़ा उनसे कहां रहेगा.. कैसे रहेगा.. उसे खाना कौन खिलाएगा, कौन उसके नख़रों को बर्दाश्त करेगा... लेकिन मुझे तो जाना था.. अब घर की दहलीज़ तो छूटना ही थी.. मां ने भी अपने बच्चे के बेहतर मुस्तकबिल के लिए दिल पर पत्थर रख लिया था... अब मां दूर हो गई थी... अब उससे बात करने के लिए एक फ़ोन का ही सहारा था... दूसरे शहर में अब मां की अहमियत का अंदाज़ा हुआ था... अब याद आती थी.. मां के हाथ की बनी खीर.. बचपन में उनके हाथ से सिले कपड़े.. घर के पीछे वाले पेड़ पर मां के हाथ का बनाया हुआ झूला.. गर्मी में आम का पन्ना.. सर्दियों में मां के हाथ का बुना हुआ स्वेटर.. अभी तो घर छूटा था... लेकिन मंज़िल तो किसी दूसरे शहर में थी...

पढ़ाई मुकम्मल होने के बाद अब तलाश थी नौकरी की... लेकिन अपने घर में नौकरी का कोई ज़रिया नहीं था... अब छोटे शहर से बड़े शहर की तरफ़ रूख़ करना मजबूरी थी... मां की आंखे नम नहीं थीं... बल्कि अब उनकी आंखों से ज़ार-ज़ार आंसू बह रहे थे.. बेटा अब बहुत दूर जा रहा था... जिगर का टुकड़ा अब शायद परदेसी होने वाला था... उसका दाना-पानी दूसरे शहर में ही लिखा था... अब घर नहीं छूटा था.. अब पापा के साथ मां भी छूट गई थी... घर से विदाई के वक्त पापा ने दिल को तसल्ली दे ली थी... लेकिन मां तो आख़िर मां थी... उसका लख़्ते-जिगर उसका नूरे-नज़र अब जा रहा था दूर-बहुत दूर... लेकिन एक बार फिर मां ने अपने अरमानों को जज़्ब कर लिया था... बेटा अब बड़े शहर में था.. लेकिन परदेस में वक्त ने सबकुछ बदल डाला था...

अब मां से सिर्फ़ फोन पर ही थोड़ी सी गुफ्तुगू होती है... अब मुनव्वर राना और निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लों में मां याद आती है... अब अकेले में तन्हाई में मां याद आती है... अब मां के हाथ की करेले की सब्ज़ी बहुत मीठी लगती है... अब मां घर लौटकर मां की गोद में न तो रोने का वक्त है और न ही मां की गोद में सोने का... अब मां बहुत दूर है... उस छोटे से गांव में जहां वो बेसन की रोटी पर देसी घी लगाती थी... जहां मिट्टी के चूल्हे पर आंखे जलाती है...जहां मेरी ख़ातिर अब भी वो पापा से लड़ जाती है... अब मां याद आती है... सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ, याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ। बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे, आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ। मां मुझे फिर से ले चलो उसी बचपन में जहां मेरी शैतानियां हों... और तुम्हारा ढेर सारा लाड़-प्यार... मेरा वादा है कि फिर मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगा.. कभी नहीं.. कभी नहीं... कभी नहीं...
15 Responses
  1. सुबह समीर सर की ये रचना कहीं पढ़ी, आँखें नम हो गयी.....

    उस रोज
    मैं घर आया
    बरसात में भीग
    भाई ने डाँटा
    ’क्यूँ छतरी लेकर नहीं जाते?’
    बहन ने फटकारा
    ’क्यूँ कुछ देर कहीं रुक नहीं जाते’
    पिता जी गुस्साये
    ’बीमार पड़कर ही समझोगे’
    माँ मेरे बाल सुखाते हुए
    धीरे से बोली
    ’धत्त!! ये मुई बरसात’
    ____________________
    और अब आपकी ये पोस्ट.... सच है हर माँ ऐसी ही होती है.


  2. waah sab sach kaha...aur syed ji ye mail aayi thi english me kuch mahine pehle hindi me likhneke liye shukriya....


  3. Anjali Says:

    bhavuk, bahut khoob. tasveer aur lekh mein koi farq nahin. behad bhavuk.


  4. मेरा जीवन मेरी साँसे,
    ये तेरा एक उपकार है माँ!
    तेरे अरमानों की पलकों में,
    मेरा हर सपना साकार है माँ!
    तेरी छाया मेरा सरमाया,
    तेरे बिन ये जग अस्वीकार है माँ!
    मैं छू लूं बुलंदी को चाहे,
    तू ही तो मेरा आधार है माँ!
    तेरा बिम्ब है मेरी सीरत में,
    तूने ही दिए विचार हैं माँ!
    तू ही है भगवान मेरा,
    तुझसे ही ये संसार है माँ!
    सूरज को दिखाता दीपक हूँ,
    फिर भी तेरा आभार है माँ!



  5. alok ranjan Says:

    बहुत खूब... चंद लाइनें मेरी तरफ से भी... मेरा लिखा नहीं है... पर आपको ज़रूर पसंद आएंगी...

    कितनी बार माँ मैंने देखा है तुमको संकोच में,
    कब किससे, कहूँ, क्या, कब, कैसे, की सोच में,
    अपने ही घर की बैठक में गुमसुम तुम,
    परोस रही चाय-पकौड़ी अंग्रेजी मेज पर,
    और खाली प्यालों में खोजती हस्ती अपनी,
    जो बेजुबान हो गयी है अपने ही देश में |

    और कितनी ही बार माँ, बचपन में मैं शर्मसार,
    सीखाना चाहता था तुमको विदेशी वार्ता-व्यवहार,
    तुम्हारी गोद में हँसा रोया, पाया खोया, सब मैंने,
    और तुमसे ही अर्थ, धर्म, कर्म, मोह, पथ पाया मैंने,
    और तुमको ही ठुकरा आया कहकर पिछड़ी, व्यर्थ,
    जो बेजुबान हो गयी है अपने ही देश में |

    माँ, अब भ्रमणों, वहमों, उम्र, अध्यययन करके है जाना मैंने,
    कैसे सालों सौतेली के सामने था सामान्य, असक्षम तुमको माना मैंने,
    तुम्हारी लोरियों की ममता, तुम्हारे सरल संवादों का साहित्य,
    तुम्हारी आत्मयिता की महक जिसे किया बरसों अनदेखा मैंने,
    आ गया हूँ वापिस सुनने, सुनाने तेरी उसी आवाज़ को,
    जो बेजुबान हो गयी है, अपने ही देश में |


  6. amitabh Says:

    बहुत खुब...क्या बात है। चंद मेरी तरफ से

    तपते मरु में ,राहत देती
    माँ बरगद -सी छांव है .
    दया- से उफनते जीवन में
    मां ,पार लगाती नाव हैं
    ----------------------
    बेटा /बेटी के होने पर
    नारी माँ का दर्जा पा जाती है.
    फिर सारे जीवन भर उनपर
    ममता -रस बरसाती है ,

    शोर शराबों वाले घर में
    चुप होकर सब कह जाती है
    कर त्याग तपस्या परिवार में
    मां मौन साधिका बन जाती है

    लगे भूख जब बच्चों को मां
    सब्जी -रोटी बन जाती है
    धूप लगी जो बच्चों को
    मां छांव सुहानी हो जाती है .

    ग़र मर भी जाए तो
    हर मूरत में नज़र जाती है
    झूठ -फरेब की दुनिया में
    मां बडी जरूरत बन जाती है.

    मां जीवन में ही समग्र
    चेतन परमेश्वर बन जाती है
    मां के अलावा कहीं ना मिलता
    तभी तो ईश्वर कह्लाती है.


  7. wah abyaz bhai


    very beautiful creation


  8. aap ne to aanso chalka diye aankhon se,
    kya kahe alfaaz nahi hai
    dil se nikli hui aur dil ke kareeb hai aap ki ye rachna.
    bahut khoob, aap sachche man se likhte rahiyega.



  9. बहुत खूब !


  10. भावभीना आलेख!
    मातृ देवो भवः
    वन्दे मातरम!


  11. आपका ब्लॉग एक बेहतरीन ब्लॉग मैं से एक है. एक नेक सिफत नेक सोंच..


  12. haalchaal Says:

    बहुत ही मार्मिक है... मन को छू गया...


  13. lindsay Says:

    I have just come across to your blog, Abyaz Khan. And I must say this is a such place where one wants to come again and again. Go ahead with such inspirational posts. I will visit your blog often.