Dec
11
अख़बार में शादी के इश्तेहार अक्सर एक जैसे ही होते हैं। एकदम बोरिंग से, कुछ भी नयापन नहीं। हर इश्तेहार में वहीं लिखा होता सुंदर, सुशील गृहकार्य दक्ष लड़की चाहिए। लड़का अच्छी नौकरी में हो। वेतन पांच अंकों से ज्यादा हो। वगैरह-वगैरह। लेकिन अब वक्त के साथ बहुत कुछ बदल रहा है। अब लड़कियों को ऐसा वर चाहिए जो ''सुंदर, सुशील, और गृहकार्य में दक्ष होना चाहिए''। मतलब दूल्हा तो मिले लेकिन वो मनमाफ़िक होना चाहिए। सैलरी तो पांच अंको से कम किसी भी कीमत पर मंज़ूर नहीं। इस पर भी तुक्का ये है कि अगर आपके घर में बीएसएनएल का फोन है, तभी आपको कोई प्रीति जिंटा जैसी हूरपरी मिलेगी। वरना आप तो बस नींद में ही सपने देखते रहो। क्या ज़माना आ गया है, लड़के आज भी बेचारे गऊ जैसे हैं। और लड़कियां तो बस पूछो मत। पसंद-नापसंद, प्यार-इश्क और प्रेम-मौहब्बत जैसे अधूरे शब्द तो अब हवा हो गये। कमाल की बात तो ये है कि इश्क, मौहब्बत, प्रेम, और प्यार अपने आप में ही आधे-अधूरे हैं। जबकि प्यार का दुश्मन लफ्ज़ बेवफ़ाई इसी घमंड में चूर है, कि न सिर्फ़ वो अपने आप में पूरा है, बल्कि अपने दम पर किसी की रूमानी कहानी में दीवार भी बन सकता है। अब न निगाहें मिलती हैं, न अब कोई किसी के प्यार में पागल होकर लैला-मंजनू बनता है। रफ्तार के इस दौर में अब तो बस सेलेक्शन होता है। अब हर कोई तो चंद्रमोहन नहीं हो सकता ना, जो अपना प्यार पाने के लिए चांद मौहम्मद भी बनने को तैयार रहे। सभी लड़कियां भी अनुराधा नहीं होतीं, जो अपनी मौहब्बत के लिए फ़िज़ा बनने को भी तैयार रहती हैं। इनकी कहानी में इश्क भी था, प्यार भी और मौहब्बत भी। एकदम पूरा फिल्मी ड्रामा था। शादी के ऐलान के बाद चंद्रमोहन उर्फ़ चांद मौहम्मद बेचारे को तो उनके घरवालों ने बेदखल ही कर दिया। भले ही ये अमीर घरानों की बड़ी औलादें हों। लेकिन प्यार के आगे इन लोगों ने मज़हब की दीवारें भी गिरा दीं। और वो भी हरियाणा जैसे राज्य में। लेकिन अब ज़माना बदला है। अब प्यार-मौहब्बत के चक्कर में कोई भी वक्त ज़ाया नहीं करना चाहता। हां कुछ दिन टाइमपास के लिए के लिए ही सही। कुछ मीठी-मीठी सी बातें की। घंटों फोन पर बातियाए और एक-दूसरे को ढेर सारे मैसेज से प्यार भरी बातें और शिकवे-शिकायतें। देर रात तक मोबाइल पर बतियाने का सिलसिला जो शुरु होता है, तो या तो फोन की बैटरी ख़त्म होने के बाद रुकता है, या बिना मतलब की किसी बात पर नोंक-झोंक के बाद। इस बहाने बेचारी मोबाइल कंपनियों का भी अच्छा-खासा कारोबार चल जाता है। चाहें गिफ्ट में मोबाइल देने की बात हो, या कूपन रिचार्ज का खर्चा। छोटे-बड़े सभी दुकानदार भी दो पैसे बना लेते हैं। रूठने-मनाने के दौर में वक्त कब गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता। इसके बाद अगर दिल ने मजबूर कर दिया तो बात सात फेरों तक पहुंच सकती है। वरना बात आई-गई में ही गुज़र जाती है। लाख कोशिशों के बाद भी जब पटरी नहीं बैठती, तो मजबूरन घरवालों के आगे चुपचाप सरेंडर कर देते हैं। और फिर प्यार के मारे बेचारे कब एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता। हां कुछ अरसे बाद किसी मोड़ पर मुलाकात होती है, तो नज़रें चुराने के अलावा कोई चारा भी नहीं होता। लेकिन दिल बस यही कहता है, ये ज़माना बड़ा ज़ालिम है।
खूब शादी के इश्तेहार पढे जा रहे हैं....क्या कोई खुशखबरी सुनाई जानी है....
निखिल
हिंदयुग्म का भी लिंक लगायें...
यहां सवाल नैतिकता का भी है।
bahut acha likha hai aapne... waise shadi ke mamlo me kuch jyada hi dilchaspi lagti hai aapki
Tanuja
बहुत बढिया
हिंदी चिट्ठाजगत मे आपका हार्दिक स्वागत है
खूब लिखें,अच्छा लिखें
आपका चिटठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है
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