अबयज़ ख़ान
मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
मेहराऊ तो नहीं मिली, जेब ख़ाली हो गई
पित्ज़ा, बर्गर और फ़िल्मों में पैसे फ़िज़ूल हुए
नाकाम हुए तो क्या हुआ, अक्ल ठिकाने आ गई।


मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
प्यार-मौहब्बत के समंदर में गोते भी लगा लिए
कई बार डूबे भी, तो पार भी पा लिए
नाकाम हुए तो क्या हुआ, तैराकी तो आ गई।


मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
शक्ल पे साढ़े तीन बजे, हालत ख़स्ता हो गई
इश्क के चर्चों से ज्यादा अपने खर्चे हो गये
नाकाम हुए तो क्या हुआ पब्लिसिटी तो हो गई।


मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
चेहरे की रंगत उड़ी, महफ़िल की रौनक गई
शायर भी बने, मजनू भी और पागल हो गये
नाकाम हुए तो क्या हुआ शायरी तो आ गई।


मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
दोस्त सब विदा हुए, इश्क में बीमार हुए
कंगाली के दौर में घरवाली भी आ गई
नाकाम हुए तो क्या हुआ, ज़िम्मेदारी आ गई।


अबयज़ ख़ान
7 Responses
  1. cmpershad Says:

    ये इश्क नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे
    इक गज़ल का दरिया है, गुनगुनाते जाना है :)


  2. विनय Says:

    चलो एक और शायर हुआ!


  3. जय हो........
    मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई...
    भई ये ग़ज़ल तो छा गई!!!!!!!



  4. मौहब्बत में ग़ज़ल भी लिखना आ गई
    दोस्त सब विदा हुए, इश्क में बीमार हुए
    कंगाली के दौर में घरवाली भी आ गई
    नाकाम हुए तो क्या हुआ, ज़िम्मेदारी आ गई।

    ek dam sahi baat


  5. बहुत ख़ूब । सच पूछिए तो आपने इसे बिल्कुल मार्डन गालिब जैसा लिखा है...


  6. बहुत ख़ूब । सच पूछिए तो आपने इसे बिल्कुल मार्डन गालिब जैसा लिखा है...
    आपके अल्फ़ाज़ ने हमें हमारी लिखी हुई चंद लाइनों को याद दिला दिया...


    हुस्ने-उल्फ़त की दरख़्तों पे बैठकर गालिब
    सोचते क्या हो, मोहब्बत की गुठुर-गूं करके
    माना अंजामें-मोहब्बत पुरसुकून नहीं...
    तेरी चाहत में पहले सा अब जुनून नहीं...
    फिर भी न सोच किए जा-किए जा बस यही काम तू
    किस से मिल, किस से किस...
    अगरचे कोई नादां पूछें क्यों मे...तो कह इतना...
    ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,
    इक आग का दरिया है और डुबा के आना है..।