Dec
26

आनन-फानन में मैंने बाइक उठाई और दौड़कर नोएडा में मेट्रो अस्पताल पहुंच गया.. गाड़ी बेताहाशा भाग रही थी... लेकिन अमिताभ की बात पर यकीन नहीं हो रहा था... अस्पताल पहुंचकर अपनी आंखो से उन्हें देख लिया... लेकिन यकीन नहीं हुआ... अरे खुदा ये कैसे हो सकता है... अस्पताल के बेड पर पड़े अशोक जी लग रहा था.. जैसे अबयज़ को देखकर मुस्कुरा पड़ेंगे.. और सीधे बोलेंगे चल यार चाय पीने चलते हैं... लेकिन अशोक सर तो शायद कभी न उठने के लिए ही सोये थे.. मैं इंतज़ार कर रहा था... कि अशोक सर एकदम मुस्कुराते हुए उठेंगे और पूछेंगे तुमने नई नौकरी की पार्टी अभी तक नहीं दी... लेकिन अशोक सर ने तो शायद कसम खाई थी.. कुछ न पूछने के लिए... मैंने तो सोच लिया था.. कि अब उन्हें सिगरेट पीने के लिए भी नहीं रोकूंगा.. लेकिन उन्होंने तो आज सिगरेट पीने के लिए भी नहीं कहा... अचानक उनका बेटा कहता है... पापा उठ जाओ न प्लीज़... चाहे गिफ्ट मत दिलाना... सुनकर मेरी आंखे भर आईं... लेकिन अशोक सर तो अपने बेटे के लिए भी नहीं उठे...

चंद दिनों में भी वो मेरे साथ इतना घुल गये थे.. कि उनके बगैर मुझे भी अकेलापन महसूस होने लगता था... हम लोग आपस में तमाम बातें शेयर करने लगे... रुतबे और उम्र में वो मुझसे बड़े ज़रूर थे.. लेकिन उनका रवैया मेरे साथ एक दोस्त की तरह ही था... शुरुआत में वो हैदराबाद से अकेले ही दिल्ली आए थे... उनकी पर्सनालिटी क्या कमाल की थी... मैंने एक दिन ऐसे ही उनकी बीवी के बारे में पूछ लिया.. फिर तो उन्हेने अपनी पूरी किताब खोलकर रख दी... उनकी लव मैरिज हुई थी.. एक पंजाबी लड़की से शादी करने के लिए उन्होंने क्या-क्या पापड़ बेले... ये भी उन्होने मुझे बताया... लेकिन एक सालह भी दे डाली... बेटे कभी लव मैरिज मत करना... तुम अपने प्यार के लिए अपनी खुशी के लिए अपनी मर्ज़ी से शादी तो कर लेते हो.. लेकिन इससे तुम्हारे मां-बाप की क्या हालत होती है.. तुम अंदाज़ा नहीं कर सकते...

लेकिन आज अस्पताल के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ इस बात का एहसास करा रही थी... कि एक इंसान हमारे बीच नहीं है... आज हमने एक शख्सियत नहीं कोई है.. बल्कि एक इंसान खोया है... वो इंसान जिसने अभी इस दुनिया में चालीस बसंत भी पार नहीं किये थे.. लेकिन इतने कम वक्त में उस शख्स के चाहने वाले इतने थे.. कि अस्पताल के बाहर खड़े होने की जगह भी नहीं थी... लोगों की आंखो से आंसू बह रहे थे... लेकिन मुझे तो अब भी यकीन नहीं था... शाम को शमशान घाट पर आखिरी विदाई का वक्त था... उनका मासूम बेटा अपने पिता की चिता को आग दे रहा था... वो मासूम शायद अभी भी यही समझ रहा था... कि पापा क्रिसमस पर बाज़ार नहीं ले गये तो क्या.. नए साल पर तो ज़रूर ले जाएंगे... लेकिन सच्चाई तो यही थी.. कि उसके पापा नए साल पर क्या अब कभी नहीं आएंगे.. अब वो उससे कोई भी ऐसा वादा नहीं करेंगे... जिसे वो निभा न सकें... लेकिन अबयज़ से कौन कहेगा... कि चल यार चाय पीने चलते हैं...
बहुत मार्मिक...
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Regards...
Mahfooz..
janab sun kr jhatka laga bt Allah ki marzi k aage hum kr bhi kya sakte hai..... Allah sir ko Jannat me Muqam de... Aameen..
दिसंबर माह अक्सर मेरे लिए कोई न कोई दुखद समाचार लाता रहा है..। सच को स्वीकार करने की हिम्मत भी नहीं मुझमें..। चाहता था कि उनके अंतिम दर्शन करूं लेकिन फिर मन में भाव जगे कि नहीं..। उनसे अंतिम मुलाकात की वही स्मृति रहनी चाहिए जिसमें उन्हें मैंने मुस्कुराते हुए देखा था। न कि उन्हें पंचतत्व में विलीन होते हुए..। जी घटता है मेरा...
उन्हें हमने खो दिया है... बहरहाल परमेश्वर न्याय करेंगे...
अशोक सर नहीं हैं...सिर्फ वो यादें हमारे साथ हैं...जो उस बेहतरीन इंसान ने हमें दी हैं...बेहद मीठी...हमेशा संभालकर रखने वाली सीखें..भगवान उनकी आत्मा को शांति दे...
मार्मिक!!
श्रृद्धांजलि!!
दुखद !
संवेदनाऍं ।
कभी न मिली थी न उनके बारे में सुना था .. सबसे पहले आदर्श राठौर जी का, उसके बाद कमल शर्मा जी का और फिर आपका लेख .. पर तीनो आलेखों को पढने के बाद महसूस हो रहा है कि अच्छे लोगों से ईश्वर भी प्यार करने लगते हें .. ईश्वर उनके मासूम बेटे और पत्नी को इस कष्ट को झेलने की शक्ति दे .. उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि !!
पढ़कर बहुत दुःख हुआ अबयज़. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे. यदि वे सिगरेट छोड़ पाते तो शायद मासूम बच्चे को उनका साथ अधिक समय तक नसीब हो पाता. ईश्वर परिजनों को शक्ति दे!
It's not only tragic but is is unbelievable....I pray to Gos to provide strength to Sir's family in these trying times.
dil ko chhoo lene valee marmik riport....
Bahut hi marmsparshi rachna hai...
Aur aise bhavpurna rachna mein kala paksh ki kamiyon ko nikaalne ka bhi man nahi karta..
aise hi dil se likhte rahiye...
Ek patrakar apne dil se likhe wahi uski safalta hai :)
-Ojasi