अबयज़ ख़ान
उत्तर प्रदेश से तो सभी वाकिफ़ हैं.. उसी का एक हिस्सा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश... धन-दौलत से मालामाल... गन्ना किसानों से भरपूर इस इलाके में पैसे की कोई कमी नहीं... रईसी इस इलाके की रग-रग में बसी है... उसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक ज़िला है बिजनौर... इस ज़िले का शुमार सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे ज़िलों में किया जाता है। सबसे ज्यादा सरकारी नौकरीपेशा इसी ज़िले से हैं... बिजनौर ज़िले में ही मौजूद है तहसील चांदपुर... बेहतरीन कस्बा.. शानदार कस्बा... नफ़ासत पसंदों का छोटा सा शहर.. तहज़ीब की चादर ओढ़े.. इस कस्बे में यूं तो हर शख्स खुशहाल है... लेकिन इसी कस्बे में एक मासूम भी है... अज़ीजुर्रहमान का बेटा शकूर... 14-15 साल का एक बच्चा... मासूम इसलिए.. क्योंकि उसपर जमाने ने सितम ढाए... लेकिन उसने उफ़ तक न की... घरवालों ने उसे बेड़ियों में जकड़ दिया... लेकिन उसकी ज़ुबान से कोई अल्फाज़ तक न निकला.. हां अपनी खामोश निगाहों से वो लोगों से इल्तिज़ा ज़रूर करता है.. लोगों को हसरत भरी निगाहों से भी देखता है..

लेकिन दुनिया बड़ी बेदर्द है.. और उस पर तरस खाने वाला कोई नहीं है... बचपन से बेड़ियों में जकड़े इस मासूम के घर की दीवारें भी उसके घरवालों की मुफ़लिसी को बयां करती हैं... सर्दी में भी उसके जिस्म पर एक निकर और एक फटी टी-शर्ट है.. खुले आंगन में ठंड से ठिठुरते उस बच्चे की परवाह शायद किसी को नहीं है... कच्चे घर की कच्ची दीवारों के बीच बेड़ियों में जकड़े शकूर के लिए तो ज़िंदगी किसी नरक से कम नहीं होगी... होश संभालने के बाद उस बदनसीब ने तो सुबह का सूरज बेड़ियों में ही देखा है... उसका दाना-पानी से लेकर सोने, गाने तक सबकुछ बेड़ियों में कट जाता है... लेकिन न तो बेरहम मां-बाप को तरस आता है... न उसके नाते-रिश्तेदारों को... लोग आते हैं.. उसका तमाशा देखते हैं.. और ऊल-जलूल से मशविरे देकर चले जाते हैं... बच्चे आते हैं उसे पत्थर मारकर चले जाते हैं... वो मौहल्ले भर के लिए तमाशा है.. और सब तमाशाई बन जाते हैं... तो कुछ लोग उससे डरे-सहमे उसके पास से भी गुज़रने पर खौफ़ खाते हैं...

इक्कीसवीं सदी में जीने वाले उस मासूम पर भी तरस नहीं खाते.. जिसे न तो अपना होशो-हवास है और न दुनिया का... लेकिन तरस तो उसके मां-बाप पर भी आता है. जो दकियानूसी बातों में पढ़कर अपने बेटे की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं... उन नासमझों को किसी ने बता दिया, कि उनका बेटा बीमार है.. उस पर हवा का असर है... उसे भूत-प्रेतों से बचाना होगा... उस पर जिन्नातों का असर है...और उसे पंद्रह साल तक बेड़ियों से बांधकर रखो, तो वो ठीक हो जाएगा... बस उस दिन से उस बच्चे की ज़िंदगी जहन्नुम की मानिंद हो गई... अपने जिगर के टुकड़े को सीने से लगाने वाले मां-बाप ने ही उसके गले में फंदा डाल दिया... इतना होता, तो भी सब्र था... उस नन्हीं जान के गले में फंदा डाला गया.. फिर उसे एक लकड़ी के खंभे से बांध दिया गया.. उसके बाद उस खंभे को ज़मीन में खूंटे की तरह गाड़ दिया... बेज़ुबान बच्चा बेज़ुबान जानवर की तरह खूंटे से बंध गया... जितनी बार वो अपने सिर को हिलाता.. रस्सी उसके गले में निशान बना देती.. फिर उसका सिर ज़ोर से उस लकड़ी के खंभे में लगता... लेकिन वो बच्चा अपना दर्द किससे कहे... और कैसे कहे...

सब देख रहे हैं.. लेकिन उसके दर्द को समझने के बजाए उस पर हंस रहे हैं.. तालियां पीट रहे हैं... भूख लगने पर उसे खाना भी किसी जानवर से बदतर तरीके से परोसा जाता है... सचमुच ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मी पर देखता होगा... मेरे बंदे कितने गधे हैं, ये तो सोचता होगा... औलाद के जन्म से पहले जो मां-बाप नीम-हकीमों से लेकर पीर फकीरों तक फरियाद लगा रहे थे.. अब बच्चे की परवरिश के लिए वही मां-बाप फिर उन्हीं नीम-हकीमों और पीर फकीरों के बताए रास्ते पर चल रहे हैं... 13 साल से वो मासूम जानवरों की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा है... लेकिन मुल्ला और पंडित अपनी रोज़ी-रोटी चमकाने के लिए उसकी जान से खेल रहे हैं.... बेज़ुबान शकूर मजबूर है...अक्ल से भी और बंदिशों से भी... लोग उसे पागल कहते हैं... लेकिन हकीकत में पागल तो वो लोग हैं.. जो उसकी नादानी पर हंसते हैं.. जो उस पर पत्थर मारकर चले जाते हैं... जो उसके साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं... उसके मां-बाप को कौन समझाए, कि उसका इलाज बेड़ियां नहीं है.. बल्कि उसे एक अच्छे डॉक्टर की ज़रूरत है, उसे एक प्यारे मां-बाप की ज़रूरत है और उसे ढेर सारे प्यार की ज़रूरत है, ...
18 Responses
  1. बच्चो पर इस तरह के अत्याचार देख दुख होता है।जनता को जागरूक होना ही चाहिए।तभी कुछ हो सकेगा।


  2. इस देखकर समझा जा सकता है कि हम कितने बड़े जानवर हो चुके है, बच्चे की जो हालत है उसे देखकर उसकी मदद करने के बजाये बाकी लोग हंसते है ये सुनकर दुख होता है। और बेवकूफ मां बाप को तो जेल में डाल देना चाहिये


  3. singhsdm Says:

    ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मी पर देखता होगा... मेरे बंदे कितने गधे हैं, ये तो सोचता होगा...
    a serious post on childrens.....very nice writing on a relevent issue.


  4. singhsdm Says:

    ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मी पर देखता होगा... मेरे बंदे कितने गधे हैं, ये तो सोचता होगा...
    a serious post on childrens.....very nice writing on a relevent issue.


  5. शशांक से सहमत


  6. समाज की जीती जागती कडवी तस्वीर है..........बहुत सही लिखा है


  7. behad dardnaak vkaya hai..
    kya koi police mein khabar nahin kar sakta..yah manviy kaam nahin hai.
    -Human activist kahan hain ???
    -is ki jankari kyun police mein nahin di jati ya samaaj mein koi sanstha nahin hai jo is masoom ko yaahn se chhudva kar ..sahi dekh rekh mein de--
    -yah halat hai 21 vin sadi mein Hindustan ki!
    bahut dukh ho raha hai is report ko padh kar!

    --


  8. correction--please read--human rights activist**


  9. shama Says:

    Padhke raungte khade ho gaye..uff! Ye to sachme sitam hai..maa-baap apnee aulaad ke saath aisa kar sakte hain? Ye bhi sach hai,ki, sarkaar paisa hithiyane ke liye aadiwaasee apnee betiyon ko kuposhit rakhte hai!


  10. ASHISH Says:

    पास ही में मेरठ है, वहां रहता हूँ! शर्मसार हूँ! और क्या कहूं?


  11. बेहद दुख की बात है।


  12. इंसान से बड़ा वहशी कोई नहीं, इस बात का एक पुख्ता सबूत है यह पोस्ट. लेकिन जहाँ इतना बड़ा ज़ुल्म हो रहा है क्या किसी का भी जमीर नहीं जागा कि इस घटना से पुलिस-प्रशासन को अवगत कराए. सब अपने में मस्त हैं. एक ज़िन्दगी तो बर्बाद हो गयी. दुनिया चाँद पर पहुँच गयी और हम हवा/बला/जिन्न लिए बैठे हैं. खान साहब, आप तो पत्रकार हैं, आपने हम ब्लोगर्स को तो अवगत करा दिया. क्या अपने कुछ हमख्याल इकट्ठा करके इस मामले को दर्ज करायेंगे?


  13. abyaz bhai, padhkar dukh hua.lekin kya kiya ja sakta hai . ye hamare desh ki sacchi tasveer hai jo aadmiyat ke murda ho jaane ki gawahi de rahi hai.


  14. इंसान अपनी इंसानियत खो रहा है
    उसे पता नहीं वो क्या कर रहा है
    हो गए हैं सब भावशून्य
    मानवता गहरी नींद में सो रहा है।



  15. tulsibhai Says:

    " dard huva padhker ..behatarin jagrukta bhari post..aaj to hilaker rakh diya dost ."

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com



  16. rajat Says:

    क्या हमारी आवाज़ सिर्फ इस कॉमेंट्स तक ही रह जाएगी.....की इस का कोई उपाय नहीं है....की सरकारे भी ये सब देख कर आख़े बंद कर लेती है....क्या इंसान इस हद तक गिर सकता है औरो का तो छोड़ो की एक माँ अपने बच्चे को इस कदर देख...कर चैन की नींद सो सकती है.......बहुत ही शर्मनाक बात है समाज पर देश पर और उस माँ पर......