Apr
16
अबयज़ ख़ान
ज़िदंगी के सारे लम्हे रफ़्ता-रफ़्ता कट गये
इंतेज़ार, आस, खुशी और ग़म में बंट गये।।

मैनें तो इंतेज़ार में उसके ज़िंदगी गुज़ार दी
उसके लिए तो रास्ते भी दुश्वार बन गये।।

कुछ मजबूरी रही होगी, फैसला बदलना पड़ा उसे
दोस्त की दोस्ती और कुछ रिश्ते बदल गये।।

बजती रहीं शहनाइयां ग़ैर की महफ़िल में
और वो मेरी महफ़िल को वीरान कर गये।।

यह हक़ीकत है मंज़िले आसां नहीं हैं 'अबयज़'
फिर भी कितने शीरी-फरहाद इन रास्तों से गुज़र गये।।
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