अबयज़ ख़ान

दरवाज़े पर टकटकी लगाए आंखे एक अदद चिट्ठी का इंतज़ार करती हैं... मन करता है कि साइकिल की घंटी सुनाई पड़े और दौड़कर दरवाज़े पर चले आयें, शायद कोई चिट्ठी आई हो, शायद कोई संदेशा आया हो, शायद कोई अपना हो, जिसने हाले-दिल लिखकर भेजा हो... लेकिन न तो साईकिल की घंटी सुनाई पड़ती है, और न ही डाकिया बाबू नज़र आते हैं... अब कोई आता है, तो मोबाइल पर फोन की घंटी, एसएमएस और ई-मेल... टेक्नोलॉजी की दुनिया ने उन सुनहरे दिनों को कहीं पीछे छोड़ दिया है, जब हफ्तों इंतज़ार के बाद एक ख़त आता था... दूर देश से आई इस चिट्टी में इतना कुछ होता था, कि पढ़ते-पढ़ते कभी आंख नम हो जाती थी, तो कभी सारे जहान की खुशियां एक चिट्ठी में सिमट आती थीं...

चिट्ठी अपने साथ खुशियां लाती थी, किसी को मुन्ने का हाल सुनाती थी, तो किसी को नौकरी का संदेशा देती थी, बूढ़े मां-बाप को बेटे के मनीऑर्डर का इंतेज़ार होता था, जिसमें पापा के आशीष के साथ चंद रुपये भी होते थे... चिट्ठी में दादा-दादी का हाल मिलता था, बॉर्डर पर बैठे लाडले की चिट्टी मिलने के बाद मां की आंखो से ज़ार-ज़ार आंसू बहते थे... किसी की शादी का दावतनामा होता था, तो कोई अपने प्यार को हाले-दिल लिखता था... नये साल पर ढेर सारे ग्रीटिंग कार्ड पहले से ही भेज दिये जाते थे... गर्मियों की छुट्टियों से पहले ही फटाफट नानी को संदेशा भेजते थे, इस बार गर्मियों की छुट्टियों में आ रहे हैं... उस छोटी सी चिट्ठी में नानी के लिए ढेर सारी फरमाइशें होती थीं...

गली में गुज़रते डाकिया बाबू के हाथ में अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड का बंडल देखकर मन हिलोरें मारने लगता था... पंद्रह पैसे का एक पोस्टकार्ड पंद्रह दिन का हाल सुना जाता था... कई बार तो बैरंग ही लेटर आते थे, जब डाकिया बाबू को उसके लिए दो से पांच रुपये तक भी देना पड़ते थे, लेकिन चिट्ठी के उतावलेपन में पैसे खर्च करने का भी कोई गम नहीं। कई बार तो लोग शरारत में भी बैरंग चिट्ठी भेज दिया करते थे... लेकिन एक अदद कागज़ के पुरज़े के लिए ये शरारत भी बड़ी मस्त लगती थी... चिट्ठी का इंतज़ार इतना होता था, कि कई बार तो लिफ़ाफे को देखकर ही उसका मज़मून समझ में आ जाता था... उस वक्त दूरियां बहुत थीं, लेकिन पंद्रह-बीस दिन में आने वाली उस चिट्ठी को पढ़कर ऐसा लगता था, जैसे सबकुछ इस छोटे से कागज के पुरजे में सिमट आया हो...

घर में या आस-पास कहीं कोई लेटर आता था, तो सबसे पहले हम उस पर से डाक टिकट छुटाने में जुट जाते थे, अजब शौक था डाक टिकट इकट्ठे करने का... कई बार तो शरारतन हम उन्हीं टिकट को लिफ़ाफे पर लगाकर फिर से पोस्ट कर देते थे.... मौहल्ले में हमारे कई लोग ऐसे भी थे, जिन्हें ख़त लिखना या पढ़ना नहीं आता था, ऐसे लोगों के लिए समाजसेवा करने में हम हमेशा आगे रहते थे, किसी की चिट्ठी लिखने और पढ़ने में जो लुत्फ़ आता था, उसका अपना अलग ही मज़ा होता था... रात को घंटो बैठकर चिट्ठियां लिखने की कोशिश करते थे, कई बार पसंद नहीं आती थी, तो फाड़कर फिर से लिखते थे... रोज़ सुबह उठते ही एक अदद ख़त का इंतज़ार होता था...

उसी दौर में पंकज उदास की एक ग़ज़ल चिट्ठी आई है...आई है... वतन से चिट्ठी आई है.. ने खूब धूम मचा रखी थी, जितनी बार उसे सुनते थे, आंख नम हो जाती थीं, लगता था हमारी भी कोई चिट्ठी आयेगी, जिसमें ऐसा ही दर्द भरा हाल होगा.. मुनिया की शरारत होगी, पापा का ढेर सारा प्यार होगा... दादा-दादी और नाना-नानी की दुआएं होंगी... लेकिन जब चिट्ठी नहीं आती थी, तो बैचेनी बढ़ जाती थी, साईकिल की घंटी की आवाज़ सुनाई दी, तो सब काम छोड़कर गली में दौड़ लगाते थे, शायद कोई चिट्ठी आई है... डाकिया बाबू की पैंट पकड़कर बार-बार पूछते थे, अंकल हमारी चिट्टी कब आयेगी? लेकिन तब बड़ी मायूसी हाथ लगती थी, जब न कोई चिट्ठी और न कोई संदेश आता था...

लेकिन अब हर तरफ़ सूनापन है... सरकारी कामकाज न हो, तो शायद डाकखाने तो अब तक बंद हो गये होते... मोबाइल क्रांति और नेट ने रिश्तों के तार बेशक जोड़े हों, लेकिन अब संवेदनाएं कहीं मर सी गई हैं... रिश्तों के खालीपन को बातों से भरने की कोशिश ज़रूर करते हैं... लेकिन हाले-दिल बयां करने का जो काम एक चिट्ठी कर सकती है, वो नेट और फोन के बस की बात नहीं... जाने कहां गये वो पिन कोड, अंतर्देशीय पत्र और पोस्टकार्ड... जाने कब लौटेगा डाकिया बाबू का वो सुनहरा दौर.. जब घर पर कोई चिट्ठी आयेगी...
10 Responses
  1. मोबाइल फोन के युग ने आत्मीयता नष्ट कर दी है...
    चिट्ठी की बात ही अलग होती थी...


  2. Dhiraj Shah Says:

    आज भी हमे चिठ्ठीओ का इन्तजार है ।


  3. Sudhi Says:

    बिल्कुल. जो बात चिठ्ठी में है वो मोबाइल की घंटी में कहां पूरा ऑर्टिकल पढ़कर बचपन की यादें ताज़ा हो गईं..रक्षाबंधन में भाई को चिठ्ठी से राखी के साथ टीका भेजना आज भी याद है। कितना भी हो वो प्यार मेल के जरिए, कितनी भी कोशिश कर लो, नहीं मिल सकता।


  4. BILKUL SAHI KAHA APNE CHITHI KI BAAT TOH KUCH AUR HI HOTI HAI WOH BAAT MOBILE MAI KAHAN :)


  5. suman Says:

    chitthhi na koi sandes jane vo kaun sa des jaha tum chale gaye........
    chitthhi ki baat ched kar apne purane zamane ko avaaz de di....
    jab kisi apne ki chitthhi aati thi to ek baar nahi kai baar use pad kar ye janane ka man karta tha ki ab aage kya ?aur fir shuru hota tha agli chitthhi ka intazar.kai bar to bhai bahan chitthhi chupa dete they tab unhe jalebi ya kuch aur dila kar chitthhi mangi jati thi...
    chitthhi ke chote chote alfaz jin ehsaso ko jagate they vo ab ghanto fon pe baat kar k bhi nahi aate.sab kuch formal,aur PR badhane k liye ho gaya hai...lekin
    purane kagaz ke purje aaz bhi vo bhini bhini atmiyata liye hai.


  6. रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ! विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!


  7. Mired Mirage Says:

    बहुत बढिया लिखा है। चिट्ठी का अपना मजा था परन्तु ई मेल क भी अपना मजा है।
    घुघूती बासूती


  8. अबयज़ मुझे लगता है संवेदनाएं खत्म नहीं हुईं हैं सिर्फ उनके चारों तरफ कुछ खोखली दीवारें खड़ी हो गयीं हैं...थोड़ा सा खालीपन,सूनापन आते ही हम सब अपनी जड़ों में ही सुकून तलाशने की कोशिश करने लगते हैं...ये चिट्ठी भी उसी पुरसुकून का एक आसरा सी लगती है....।।


  9. क्या लिख दिया आपने..पढ़कर ऐसा लगा मानों एक अदद पत्र की चाहत फिर जवां हो गई...फिर डाकिया बाबू के इंतजार में पलके बिछ जाना चाहती हैं...लेकिन ये उम्मीद अब बेजां सी लगती है...ऐसे में आपकी ये रचना उस डाकिये के माफिक है..जो यादों की चिठ्ठी लेकर आई है.. शुक्रिया आपका... आगे भी ऐसी चिठ्ठियां भेजते रहिए...


  10. digpal Says:

    अबयज भाई, बचपन में ले गए आप। इसके लिए धन्‍यवाद, आज चिट्ठी के दर्शन होने ही दुर्लभ हो गए हैं। मैं अपनी शादी के कार्ड को ही अंतरदेशीय कार्ड पर छपवाना चाह रहा हूं। शायद लोगों को वो भूला हुआ जमाना एक बार फिर से याद आ जाए।