अबयज़ ख़ान
कोहरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था.... हाथ को हाथ नज़र नहीं आ रहा था... लेकिन फिर भी घर तो पहुंचना ही था.. रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे... मोटरसाइकिल पर चलना दूभर हो चुका था... सड़क पर हर तरफ़ बस कोहरा ही कोहरा था... आगे वाली कार के पीछे मैं चलता चला जा रहा था...घर किस रास्ते पर है मालूम नहीं पड़ रहा था... धुंध में दो पग भी चलना मुश्किल था... बाइक दस किलोमीटर की रफ्तार से रेंग रही थी... सड़क पर सन्नाटा पसरा था... लोग अपने-अपने घरों में बिस्तरों में दुबके थे... घर का रास्ता कोसों दूर लग रहा था... दफ्तर से मेरा घर बामुश्किल पांच या छह किलोमीटर होगा... लेकिन कोहरे की चादर में ये रास्ता लगातार लंबा होता जा रहा था... कोहरे ने हेलमेट के शीशे पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था... हेल्मेट हटाते ही मुंह पर ओस की बूंदे गिरने लगती... हालांकि ठंड में कंपकपी छूट रही थी...लेकिन मौसम का एक रुमानी अंदाज़ ये भी अच्छा लग रहा था...
दास्तानों में होने के बावजूद हाथ बर्फ़ हो चुके थे... जो कार आगे चल रही थी, कुछ दूर चलने के बाद वो अचानक ओझल हो गई.... अब मेरे लिए एक कदम बढ़ाना भी मु्श्किल हो चुका था... मैं किस रास्ते पर जा रहा हूं... मुझे कुछ पता नहीं था... कुछ दूर चलने के बाद मुझे मेरी तरह ही बाइक पर एक और शख्स नज़र आया... सोचा इन्हीं जनाब से रास्ता पूछ लिया जाए... लेकिन शायद वो खुद भटके हुए थे... खैर जैसे-तैसे घर पहुंचा... करीब डेढ़ बज चुका था.. दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा हुआ... घर में घुसते ही न आव देखा न ताव... जल्दी से रज़ाई उठाई और बिस्तर के आगोश में जाने में ही भलाई समझी... लेकिन नींद इतनी जल्दी कहां आना थी... अब तो आदत पड़ चुकी थी देर रात सोने की... और तकरीबन रात के ढाई बजे ही जाकर आंख लगी होगी...

रात गहराने के साथ ही बिस्तर लगातार सर्द होता जा रहा था... याद आ रहा था बचपन और बचपन की कहानियां... मुंशी प्रेमचंद का हल्कू मेरी आंखो के सामने खड़ा था.. जिसने साहूकार का कर्ज़ चुकाने की खातिर अपने लिए कंबल तक नहीं खरीदा... और पूरी रात जंगल में ऐसे ही ठिठुरते हुए गुज़ार दी थी... हल्कू तो अब भी बहुत हैं.. लेकिन उनका दर्द समझने वाला कोई मुंशी प्रेमचंद शायद अब नहीं है... मैंने सुबह दस बजे का अलॉर्म लगाया था... लेकिन आंख सुबह सात बजे ही खुल गई... किसी ने दरवाज़े पर नॉक किया था... मन किया उठते ही जो भी होगा उसे दो-चार बातें तो ज़रूर सुनाऊंगा... सुबह-सुबह ही नींद खराब कर दी... लेकिन दरवाज़ा खोला तो कामवाली बाई खड़ी थी... ठंड में ठिठुरते हुए...

कोहरा अब भी रात जैसा ही पसरा हुआ था... मौसम अब भी उतना ही सर्द था... उसके जिस्म पर इतनी ठंड में भी एक पुरानी सी शॉल थी.. कपड़ों की हालत देखकर लग रहा था, कि इससे पहले वो दूसरे घर में काम करके आई है... और अब यहां... बाप रे बाप.. इतनी सर्दी में अपना तो पानी में हाथ डालने को भी दिल नहीं करता... और ये लोग घर से बाहर ठंड में सिकुड़े जा रहे हैं...दरवाज़े में अख़बार का बंडल भी पड़ा था... जो अख़बार वाला लड़का सुबह ही डाल गया था... ठंड में अपनी साईकिल पर... आंधी हो या तूफान, जाड़ा हो या बरसात... उसे तो काम पर जाना ही है... दुनिया सोती रहे... अखबार वाला लड़का कभी नहीं सोता... दूधवाला तय वक्त पर दूध देने आ जाता है... भले ही वो पानी पहले से ज्यादा मिलाता हो... लेकिन उसके भी आने का वक्त नहीं बदला... दरवाज़े पर बर्तन में दूध भी रखा हुआ था...

गली में अब भी दस-पंद्रह साल के दूसरे लड़के अख़बार के बंडल बना-बनाकर दूसरों के घर में फेंक रहे थे.. तन पर उनके एक स्वेटर से ज्यादा कुछ भी नहीं था... साईकिल के हैंडल पर उनकी उंगलियां ठंड में काली पड़ चुकी थीं... पैरों में हवाई चप्पल के बावजूद वो सर्दी के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं थे... हवा के थपेड़ों में उन्होंने ज़िंदगी जीना सीख लिया था... और इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे, कि ये मौसम तो अमीरों के लिए बने हैं... सर्दियों में गर्म कपड़े, रज़ाई में चाय के साथ मूंगफली और गजक... कमरे में गर्म हीटर... ये सब तो बड़े लोगों के चोंचले हैं.... लेकिन उन बदनसीबों को तो हर दिन काम पर जाना है... उनको न सर्दी लगती है, न गर्मी और न बारिश के थपेड़े उनका रास्ता रोक पाते हैं... उन्हें तो सिर्फ़ भूख लगती है... और घर पर बच्चे उनका इंतज़ार करते हैं....
8 Responses
  1. सर्दी,कोहरे और बर्फ की ख़बरें सुन सुन कर..और इस पोस्ट को पढने के बाद तो और भी शिद्दत से लगा,जैसे कितना कुछ मिस कर रही हूँ.,(मुंबई में तो हमेशा की तरह पंखा चलना बंद नहीं हुआ)...इन सर्दियों में गुजारे पुराने दिन आँखों के आगे साकार हो उठे...और तभी अंतिम पंक्तियों ने जैसे धरातल पर ला दिया...मैं यहाँ सर्दी एन्जॉय करने की सोच रही हूँ...और ये लोग बाट जोह रहें होंगे ,कब जाएगा ये बेरहम मौसम


  2. सही कहा आपने, अब तो यही कहा जा सकता है कि सर्दी ने मार डाला।

    रवींद्र जी, आपने मेरे मन की बात कह दी। वाकई मैं इस विषय पर काफी दिनों से सोच रहा था, पर कुछ व्यस्तता और कुछ व्यक्तिगत समस्याओं की वजह से इसपर कोई सार्थक पहल नहीं कर पा रहा था।
    आपके इस अपनत्व के लिए में आभार जैसा शब्द नहीं इस्तेमाल करूंगा, क्योंकि यह औपचारिकता मात्र रह जाएगी। जबकि आपकी यह भावना इससे कहीं ज्यादा बड़ी है।--------
    बारिश की वो सोंधी खुश्बू क्या कहती है?
    क्या सुरक्षा के लिए इज्जत को तार तार करना जरूरी है?


  3. kshitij Says:

    मेहनतकशों के लिए मौसम कभी खुशगवार नहीं होता
    मौसम कभी बेरुखा नहीं होता..
    मौसम तो बस मौसम होता है..
    जैसे हम ऑफिस जाते हैं ..वक्त पर...
    वो भी आता है...
    वक्त के साथ...
    और चला जाता है....
    ड्यूटी खत्म होते है......


  4. काश मैं हिप्र में होता...


  5. सच है मजबूरी हिम्मत भी देती है. तुमने जो देखा, महसूस किया वह आमतौर पर हमें दिखता ही कहाँ है?


  6. आपकी इस संवेदनशीलता को सलाम, उम्मीद है ताउम्र बनाये रखोगे !


  7. jeevan ki sachchai ko bahut hi sundar dhang se chitran kiya. Mere blog par aa kar tippani karne ke liye shukriya. Wish You All the Best and A Happy New Year:)


  8. Abyaz ji...yaha toh thand lagi padhi ha..fir bhi roz thand se ladhne nikal padhti hu pack haokar..kya kare kaam kaj thodi chod denge...kabi hill station gyi nhi toh ye thand dekhke yahi soch leti hu ki Local Hill Station ka mza utha rahi hu...pareshani toh ha ji par maze bhi aa rahe ha...