अबयज़ ख़ान
भरोसा क्यों और किस पर किया जाए... किसलिए किया जाए... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने आपको अपनी कसम खाकर ये एतबार करा दिया, कि मैं तुम्हारा भरोसा कभी डिगने नहीं दूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने अपने बच्चों की कसम खाकर ये एतमाद दिला दिया, कि मैं तुम्हारे साथ दगा नहीं करूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने तुम्हारे कंधे को हल्के से अपने हाथों से दबा दिया... और तुम्हें इस बात की तसल्ली दे दी, कि मेरे दोस्त बुरे वक्त में मैं ही तुम्हारे साथ हूं.. ज़माना तो बहुत ख़राब है और तुम अपने दिल के राज़ मुझसे शेयर कर सकते हो.. तुम अपनी ज़िंदगी का फलसफा मेरे सामने रख सकते हो.. तुम अपनी कहानी मुझे सुना सकते हो.. तुम अपना हाले-दिल मुझसे कह सकते हो...

तुम अपनी ज़िंदगी का कभी न खोलने वाला राज़ भी मुझे बता सकते हो, और मेरा वादा है तुमसे कि तुम्हारा ये राज़ कभी फरिश्तों को भी पता नहीं चल पाएगा... मेरा वादा है ये तुमसे, कि मैं तुम्हारा एतबार टूटने नहीं दूंगा... मेरा वादा है तुमसे, कि तुम्हारा ये राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएगा... और हम अपनी ज़िंदगी की किताब के वरक खोलकर उसके सामने रख दें... क्या कोई राज़ किसी को सिर्फ़ इसलिए बता दिया जाए, क्योंकि उसने आपको अपने कुछ ज़ाती राज़ बता दिये हैं... लेकिन बावजूद इसके इस बात की क्या गारंटी है कि इसके बाद दुनिया में कोई भी आपके निजी माअमलात में दख़लअंदाज़ी नहीं कर पाएगा... आपके राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएंगे...

आप पर उंगली उठाने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा... क्या ऐसा सचमुच होता है, जब आप किसी को अपने राज़ बता देते हैं और उसके बाद आपकी निजी ज़िंदगी में चैन-सुकून आ जाता है... कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता... मेरा अपना तजुर्बा तो कहता है कि इसके बाद आपकी टेंशन और बढ़ जाती है... और आपको हमेशा इसी बात का डर सताता रहता है कि पता नहीं वो कब मेरे राज़फ़ाश कर दे... कई बार ऐसा होता है, कि जिसे आपने सबसे ज्यादा अज़ीज़ समझकर अपना राज़दार बनाया, कुछ दिन बाद उसी के साथ रिश्तों में दरार आ गई... फिर इस बात की क्या गारंटी है, कि वो आपके राज़फ़ाश नहीं करेगा...

शायद इसीलिए आपको कई बार ऐसे शख्स की खुशामद भी करनी पड़ती है, जिसे आप रत्तीभर भी पसंद नहीं करते... सिर्फ़ इसीलिए कि कहीं वो आपके राज़ बेपर्दा न कर दे... आखिर इस भरोसे का भरोसा है क्या..? आखिर इंसानी फितरत का भरोसा क्या है...? आखिर इस भरोसे का पैमाना क्या है..? शायद इन तमाम सवालों का जवाब किसी के पास नहीं होगा, और अगर हुआ, तो यही कि किसी न किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा ही, वरना इसके बिना तो ज़िंदगी का पहिया घूमने से रहा... या फिर आप लोग भी यही कहेंगे कि राज़ को राज़ ही रहने दो... क्योंकि पर्दा जो उठ गया, तो फिर गिर नहीं पाएगा... और ज़माने का भरोसा क्या इसकी तो फितरत ही ज़ालिम है...

वरना क्या भरोसा उसके वादे का मगर..
दिल को खुश रखने को एक वादा तो है...
8 Responses
  1. ladli Says:

    बहुत सही कहा है आपने ।



  2. यही फलसफा है जिंदगी का


  3. Aarti Says:

    ये क्या किया तेरे वादे का एतबार किया,
    तमाम उम्र कयामत का इंतजार किया
    तुम्हे तो वादा ए दीदार करना था हमसें
    ये क्या किया जमाने को उम्मीदवार किया...
    सच ही है किसे कहें वो सच्चा हैं, हम तो अब ख़ुद भी बेमानी से हो गए हैं...


  4. amitabh Says:

    kisne aapko dhoka diya...aur kisse aapko dar lagta hai...


  5. shweyrkumar Says:

    abyaz, raaz batate ho toh bharosa karna bhi seekhna chaiye... warne kisi mein itni takat nahi ki aapse aapka raaz jaan paye...its all depend on you..yani bharose par bharosa.....shweta


  6. shweyrkumar Says:

    शायद इसीलिए आपको कई बार ऐसे शख्स की खुशामद भी करनी पड़ती है, जिसे आप रत्तीभर भी पसंद नहीं करते... सिर्फ़ इसीलिए कि कहीं वो आपके राज़ बेपर्दा न कर दे.... nahi samajh aaya ki jise aap pasand nahin karte use aap khud apna raaz kaise bata sakte hain...shweta


  7. Gulvish Says:

    you are absolutely right ...abyaz...lets hope ki kisi ko kabhi koi dhokha na mile..aameeen