अबयज़ ख़ान
घर से निकलते ही अचानक कुछ ऐसी चीज़ों पर नज़र पड़ जाती है, जिन्हें देखकर आपको लगता है कि ये तो पहले भी कहीं देखा है... साल दर साल बीत जातें हैं, मगर उन चीज़ों में कोई बदलाव नहीं आता... शाम को दफ्तर से आने के बाद घूमते हुए मार्केट में निकल गया.. अचानक एक बड़े से बैनर पर नज़र पड़ी... बैनर पर लिखी इबारत कुछ पुरानी सी लग रही थी... लिखा था पूनम साड़ी सेल... बचपन से इस लाइन को देखते-सुनते जवान हो गये... लेकिन इस लाइन में कोई बदलाव नहीं आया था... इबारत के साथ बाकी बातें भी वही पुरानी, पांच सौ रुपये वाला लखनवी सूट सिर्फ़ डेढ़ सौ रुपये में... एक हज़ार रुपये वाली बनारसी साड़ी सिर्फ़ दो सौ रुपये में, दो हज़ार रुपये वाला शानदार सिल्क का सूट सिर्फ़ चार सौ रुपये में... साथ में दो लाइन और जुड़ी थीं... कंपनी में आग लगने की वजह से मालिक को बहुत नुकसान हुआ है... कंपनी की डील टूट जाने की वजह से विदेश में जाने वाली लॉट रूक गई है, जिसकी वजह से सारा माल सस्ते में बस आपके लिए आपके शहर में... बचपन में ये लाइनें सुनकर कंपनी और सेल वालों के लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो जाती थी, और हम भी घर वालों से ज़िद करके एक-आध जोड़ी कपड़े खरीद लाते थे... सोचकर ताज्जुब होता है कि आखिर इन लाइन्स में कितना दम है, जो अब तक हूबहू ऐसे के ऐसे ही चल रही हैं...

सफ़र में जाते वक्त चाहें ट्रेन का रास्ता हो या बस का रूट हो... आपको हर दीवार, घर के पिछवाड़े, सड़क की पुलिया पर, चौपाल की दीवार पर या आपके मौहल्ले में गुप्त रोग विशेषज्ञों के ढेरो विज्ञापन मिल जाएंगे... इन इश्तेहारों की इबारत वही पुरानी, जो आपने बचपन में देखी सुनी होगी, हकीम साहब भी शायद वही पुराने या उनकी कोई औलाद जो उनके नाम का फायदा उठा रही होगी... गांवों में तो कई लोग जानबूझकर अपनी दीवारे इश्तेहार वालों को पुतने के लिए दे देते हैं, सोचते हैं दीवार की पुताई से बच जाएंगे.. लेकिन जब उनके बच्चे उनके सामने उस इबारत को पढ़कर गुज़रते है, तो उन पर घड़ो पानी पड़ जाता है... दीवार पर वही लिखा होता है, नामर्दी का शर्तिया इलाज, बेऔलाद एक बार ज़रूर मिलें... गारंटी कार्ड साथ में दिया जाएगा... पत्नी-पत्नी संतुष्ट नहीं हैं तो भी मिलें... शादी से पहले या शादी के बाद वगैरह-वगैरह... अब घर की दीवार पर ही सेक्स की इतनी जानकारी मिल रही हो, तो भला बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने की क्या ज़रुरत है... इश्तेहारों की डिज़ाइनिंग भी वही, सफ़ेद चूने से पुती दीवार पर काले रंग से लिखे मोटे-मोटे अक्षर... आपको न सिर्फ़ पुराने दिनों की याद करा देतें है, बल्कि इस बात का एहसास भी कराते हैं कि दुनिया कितनी बदल गई है, लेकिन कुछ तो है जो अब भी नहीं बदला...
3 Responses
  1. mehek Says:

    wah kya khub kahi kuch chize kabhi nahi badalti,jaise aapke vaha poonam sari ki add hai hamare yaha,only vimal ki add aaj bhi kuch bus par nazar aati hai,kuch chiz aur bhi nahi badli hai budhhi ke baal khana aur ghar ke samne aayi wali thele ki kulfi:):)


  2. बहुत शुक्रिया महक जी... सचमुच कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। आपसे गुज़ारिश है, आगे भी आप इसी तरह मेरी हौसला अफ़ज़ाही करती रहेंगी।


  3. RAZIA MIRZA Says:

    अरे खान साहब चीज़ें तो ठीक इंसान अपनी फितरत,अपने आपको कहां बदल पाता है?