अबयज़ ख़ान
रंगीन टीवी पर फिल्म चल रही है राजा हिंदुस्तानी... हर कोई मग्न होकर फिल्म देखने में लगा है... एक शॉट् में हीरो आमिर खान करिश्मा कपूर का चुंबन लेता है... और सीटियां बजने लगती हैं... नाइनटीज़ के आखिर में किसी हिंदी फिल्म का ये सबसे लंबा चुंबन सीन था... आशिकों के दिलों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं... लड़कियां लरज़ती हुई अपना चेहरा छिपा लेती हैं.... घड़ी रात का एक बजा रही है... आंखे नींद के आगोश में जा रही हैं... तभी कोई आवाज़ लगाता है... अरे कोई लड़की उठकर चाय बना ला... चाय का नाम सुनकर लड़कियां इधर-उधर दुबकने लगती हैं... क्योंकि एक तो रज़ाई में से निकलकर चूल्हा जलाने का अलकस, उसपर फिल्म के छूट जाने का डर... लेकिन बड़े बुज़ुर्गों के आगे उनकी एक न चलती... मरती क्या न करतीं चाय तो बनाना ही पड़ेगी और वो भी एक-दो नहीं, कम से कम तीस-चालीस लोगों के लिए... वो भी बड़ा सा भगोना भरकर...जिसमें चाय, दूध और पानी का संगम होगा... जिसे चाय कम जोशांदा कहा जाए तो शायद ठीक होगा...

नवंबर 1997 की बात है... जब टीवी का चलन बहुत कम घरों में था... और रंगीन टीवी तो खासकर कम देखने को मिलता था। ज्यादातर घरों में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी ही था। टीवी पर फिल्में तो वैसे भी हफ्ते में दो दिन शनिवार और रविवार को ही आती थी... लेकिन क्या करें बिजली आती नहीं थी, तो फिल्म भला कहां देखने को मिलती। लेकिन फिल्म देखने के शौकीनों ने एक ज़रिया निकाल लिया था.. वीसीआर पर फिल्में देखने का। लेकिन इस वीसीआर पर फिल्म देखने का असली मज़ा तो शादियों के दौरान आता था... घर में शादी के बाद जब काम-धाम निपट जाता था और घर में कुछ रिश्तेदार मेहमान ही बच जाते थे, तो शादी की अगली रात को वीसीआर चलाया जाता था। वीसीआर चलता कम था उसका हल्ला ज्यादा होता था। पूरे मौहल्ले भर को पता चल जाता था कि आज फलां घर में वीसीआर चलेगा... बाकायदा किराए पर वीसीआर मंगाया जाता था.. शादी के घर में जनरेटर तो होता ही था, सो लाइट की कोई फिक्र नहीं होती थी।

एक रात में वीसीआर पर तीन फिल्में चलती थीं। इस दौरान इश्किया मिज़ाज लड़कों की चांदी हो जाती थी, ज़रा किसी लड़की ने वीसीआर का जिक्र छेड़ा, जनाब जुट गये वीसीआर का इंतज़ाम करने में। और तो लड़कियों से उनकी फ़रमाइश भी पूछी जाती थी। शोले हर किसी की फरमाइश में सबसे ऊपर होती थी। वीसीआर चलने से पहले ही घर के सारे काम निपटा लिये जाते। इधर घर के बढ़े-बूढे़ सोने गये, उधर शुरु हो गया वीसीआर पर सनीमा... नवंबर की कड़कड़ाती रात थी और वीसीआर पर शुरु हुआ फिल्मों का दौर। पहली फिल्म चली राजा हिंदुस्तानी... तब ये फिल्म रिलीज़ ही हुई थी। घर के सभी लोग आंगन में दरी-गद्दा बिछाकर बैठे थे... ऊपर से लोगों ने टैंट हाउस से आये लिहाफ़ भी लपेट लिये थे। गाना बजा आये हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बनके.. एक ड्राइवर से एक अमीर बाप की बेटी का प्यार... एक मिडिल क्लास के लिए इससे बढ़िया स्टोरी भला और क्या हो सकती थी।

बस फिर क्या था, लड़के खुद को सपने में आमिर खान और लड़कियां खुद को करिश्मा कपूर समझने लगीं। और उनके मां-बाप एक दूसरे के लिए खलनायक...। फिल्म देखते-देखते सपनों में अपनी दुनिया बसाने लगे। फिल्म की पूरी स्टोरी ख्यालों-ख्वाबों में उतर जाती। तीन फिल्मों के बीच में हर फिल्म के बाद इंटरवल होता था। इस दौरान चाय का दौर चलता था। लड़कियां चाय बनाने बावर्चीखाने में पहुंची, पीछे से मटरगश्ती करते हुए मजनू मियां भी कतार में लग जाते थे। अगर गलती से ऑपरेटर ने फिल्म लगा दी, फिर देखिए चाय बनाने वाली का गुस्सा... हमारे बिना आये तुमने फिल्म कैसे चला दी, पता नहीं है, हम चाय बना रहे हैं। बेचारे को फिल्म फिर से लगाना पड़ती थी। इस दौरान ऑपरेटर साहब का भी बड़ा रुतबा होता था, टीवी पर फिल्म लगाकर जनाब खुद तो एक कोने में दुबक जाते थे, लेकिन कोई उनको सोने दे तब न...

शोर मचता था.. अरे तस्वीर तो आ नहीं रही है... अरे इसकी आवाज़ कहां चली गई...? सबसे ज्यादा मज़ा तब आता था, जब कैसेट बीच में फंस जाती थी... बेचारे ऑपरेटर को नींद से उठकर आके फिर से वीसीआर को सैट करना पड़ता था। पहली फिल्म के बाद आधे लोग तो सो जाते थे और तीसरी फिल्म तक तो इक्के-दुक्के लोग ही टीवी सैट पर नज़रे चिपकाए होते थे। लेकिन इस दौरान आशिक मिजा़ज अपनी टांकेबाज़ी को बखूबी अंजाम देने में कामयाब रहते थे। अरे भाई फिर फिल्म देखने का फायदा ही क्या हुआ... फिल्म कौन कमबख्त देखने आया था... असली मकसद तो बारात में आई लड़की से टांका भिड़ाना था। लड़की ने अगर मुस्कुरा कर उनसे बात कर ली, तो समझो भाईजान का रतजगा कामयाब हो गया। सुबह मौहल्ले में सबसे ज्यादा सीना उन्हीं का चौड़ा होता था। लेकिन इस दौरान कुछ कमबख्त ऐसे भी होते थे, जो फिल्म तो कम देखते थे, लेकिन दूसरों की जासूसी करने में लगे रहते थे और सुबह की पौ फटने से पहले भांडा फोड़ दिया करते थे। खैर अब न तो वीसीआर रहा, न पहले जैसे सुनहरे दिन.. अब तो फिल्म से लेकर प्यार-मौहब्बत तक सबकुछ हाईटेक हो गया है।
16 Responses
  1. khawar Says:

    भई वाह... मज़ा आ गया..


  2. srivatsan Says:

    अपने बिलकुल वही बात लिखी जिसके की हम सभी कभी न कभी दो चार हो चुके है. लेकिन भाग दौड़ की जिंदगी इसी है की हम सभी इन सुहाने पलो को पूरी तरह भूल चुके थे. अगर एसा कहा जाये तो गलत नहीं होगा की इन पलो से दो चार तो सभी हुवे लेकिन इन लम्हों को याद करने का वक़्त आज किसी के पास भी नहीं है. लेकिन एक अरसे बाद अपने फिर से अपने इस दिल की बात से हमें हमारे उन्ही पुराने दिनों की याद दिला दी. जब में इसे पढ़ रहा था तो जी जैसे कहानी आगे बढती जा रही थी लगा की सब कुछ मेरे साथ जो कुछ उन दिनों हुवा उन्ही बातो को अपने अपनी कलम से उकेरा है.... उन सुनहरे पलो को दुबारा से याद दिलाने के लिए अपना शुक्रिया भाई..


  3. sifer Says:

    वाह भाई पुरानी यादों को ताजा कर दिया आपने वीसीआर पर फिल्म देखना अपने आप में एक मजा था लेकिन अब वो मजा आने वाले पीढ़ी नहीं ले पायेगी शायद आप के इस लेख को पढ़ कर वो भी इस से मुखातब हो जाये। GR8


  4. सर जी क्या बात कही है आपने....

    बुआ जी के पास वीसीआर हुआ करता था। जब भी वो कोई नई फिल्म लाते तो वो करीबी रिश्तेदारों को बुलाया करते थे। उस दिन वहां पर रात्रिभोज का भी आयोजन होता था।


  5. भाई आपतो वी सी आर के जमाने में ले गए। अच्‍छा चित्र खेचा हैं एक रात का। बधाई।


  6. भई वाह !! पुराना ज़माना याद दिला दिया ! ९० के दशक में में बागानों में रहता था वहाँ साप्ताहिक सिनेमा दीखते थे, गाडी में से किसी फिल्ड में पर्दा लगा कर ! जिसके दोनों तरफ पब्लिक बैठती थी आहा !!! क्या आनंद आता था !!!


  7. wah! maza gaya........ bahut hi achci aur shandar post.......


  8. आपने पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया। हम भी एक समय था जब चंदा लगा कर वीसीआर चलवाया करते थे। पर अब तो सिर्फ यादें ही हैं।

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    परा मनोविज्ञान- यानि की अलौकिक बातों का विज्ञान।
    ओबामा जी, 75 अरब डालर नहीं, सिर्फ 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।


  9. आपने पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया।


  10. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com


  11. भाई मज़ा आ गया, आपने तो शादी के दिनों की फिल्में याद दिला दी मैने तो पूरी रात पूरी रात जागकर फिल्में देखी है बचपन में काफी शौकीन था फिल्में देखने का हर हिरोइन और हीरो की खबर होती थी। हमारे यहां तो वीसीआई और बड़ा कलर टीवी थी जो कि दूसरों के यहां भी जाता था, हमारे यहां तो जो वीसाआर था उस पर तो जब तक एक ईंट न रखों साला चलता भी नहीं था


  12. sangeeta Says:

    Bahut khoob sir dil kush ho gaya...aaj ke mahole ko dekhkar to bas yahi keh sakte hai .....Muddato teri yaad bhi aayi na hame, Aur hum tujhe bhool gaye hai aisa bhi nahi.


  13. tulsibhai Says:

    " bahut hi badhiya aapne purani yaadoan ko taza kiya "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com


  14. viru Says:

    wah wah bhai hamne bhi lgatar 3 din vcr pr raja hindustani dekhi hai.............


  15. Babli Says:

    बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है! मैं आपका पोस्ट पढ़कर उस वक्त को याद कर रही थी जब हमारे इलाके में पहला टीवी हमारे घर पर आया और वी सी आर भी ! तब कुछ अलग ही बात थी बस अब तो सिर्फ़ यादें बनकर रह गई! इस शानदार पोस्ट के लिए बधाई!


  16. बबली जी.. बहुत शुक्रिया आपका... इतनी हौसलाअफ़ज़ाही के लिए...