अबयज़ ख़ान


-जैसे सावन की घटा ज़रा सा बरसे और फिर धूप निकल आये।
-जैसे कोई मेहमान चंद रोज़ घर में क़हकहे बिखेर कर वापस चला जाए।
-जैसे छुट्टी का दिन आकर गुज़र जाए।
-जैसे त्योहार के रोज़ की शाम।
-जैसे दुल्हन की रुख़सती के बाद घर।
-जैसे किसी परदेसी की अलविदाई मुस्कुराहट।
-जैसे स्टेशन का प्लेटफ़ार्म छोड़ती ट्रेन।
-जैसे घर के सामने से गुज़रता हुआ डाकिया।
-जैसे वतन से बिछुड़ने की याद।
-जैसे भूले-बिखरे चंद ख़त।
-जैसे किताबों की रैक में अचानक कोई पुरानी तस्वीर मिल जाए।
-जैसे एलबम में मम्मी-पापा के साथ बचपन की फोटो।
-जैसे तावीज़ में दी हुई मां की दुआएं।
-जैसे परदेस में मिली पापा की प्यार भरी चिट्ठी।
-जैसे किसी मरने वाले के तह-दर-तह कपड़े।
5 Responses
  1. Dhiraj Shah Says:

    बहुत खुबशुरत अभिव्यक्ति व रचना


  2. बहुत बढ़िया , जब आंखो में नमी आती है... और उदासी तिरती है


  3. वाह निराला अंदाज और कमाल की शैली..


  4. sada Says:

    बेहतरीन प्रस्‍तुति ।


  5. सारे सुंदर शब्द इस रचना में समा गए हैं, समझ नहीं आ रहा कि ऐसे में तारीफ करने के लिए शब्द कहां से लाऊं?