अबयज़ ख़ान
नुक़्ता नहीं लगाना है...किसी भी लफ़्ज़ के नीचे नुक़्ता नहीं लगाना है...इसके लिए सभी को मेल भेज दिया गया है।
आप सभी लोगों को बता भी दीजिए। स्क्रीन पर नुक़्ता नहीं दिखना चाहिए।
क्यों... मैंने एतराज़ किया। नुक़्ता क्यों नहीं लगाना है। अरे अगर ज़मीन को जमीन और जहाज़ को जहाज लिखेंगे तो कैसा लगेगा?

लेकिन बॉस के सामने सारे तर्क बेकार थे। नुक़्ता सिर्फ़ इसीलिये नहीं लगाना था, क्योंकि कुछ लोगों को नुक़्ते का तमीज़ नहीं था। नुक़्ते में उनके गड़बड़ी थी, और नुक़्तानज़र सभी लोगों पर थी। मतलब जिन्हें नुक़्ते की तमीज़ है, वो भी नुक़्ता न लगाएं। मेरे साथ-साथ नुक़्ता भी अपने हाल पर बेहाल था। पहले तो मुझे भी नुक़्ता न लगाने का तर्क खराब लगा, लेकिन जब नुक़्ते की बदहाली देखी, तो फिर सब्र कर लिया। खुद भी और नुक़्ते को भी समझा दिया। फिक्र न कर गालिब, ज़माने में हमारे तलबगार और भी हैं। नुक़्ते के साथ जो नुक़्ताचीनी की जा रही थी, ज़रा उस पर आप भी नुक़्तानज़र कीजिए। ख़ुदा.. खुदा हो गया, ज़मीन...जमीन हो गई, ज़रा...जरा हो गया।
कुछ लोग इतने समझदार होते हैं, कि ज़रूरत से ज़्यादा नुक़्ता लगा देते हैं। अब जाल को नुक़्ता लगाकर ज़ाल, खाल को नुक़्ता लगाकर ख़ाल और जुदा को नुक़्ता लगाकर ज़ुदा कर देते हैं। और तो और नुक़्ते की गड़बड़ी के चक्कर में जंग को ज़ग लग जाती है। दिलचस्प तो ये है जलील बेचारा नुक़्ते के चक्कर में ज़लील हो जाता है। नुक़्ते के चक्कर में ज़ीना, जीना हो जाता है। हालांकि नुक़्तों वाले अल्फ़ाज़ की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है। उर्दू में भी नु्क़्ते की गड़बड़ियां कम मशहूर नहीं हैं। वहां तो ख़ुदा का नुक़्ता ऊपर लगाकर उसे जुदा बना दिया जाता है।

ये तो वो चंद नज़ीर हैं.. जो नुक़्ते के चक्कर में आंसू बहा रही हैं। कसूर न मेरा है और न नुक़्ते का, लेकिन सज़ा भुगतना पड़ रही है अल्फ़ाज़ों को। जो बिना नुक़्ते के ऐसे नज़र आते हैं, जैसे कोई उजाड़ वन, जैसे पतझड़ के बाद सूखा हुआ पेड़, जैसे कोई बंजर खेत। लेकिन न्यूज़ चैनल में काम करते वक्त मुझे नुक़्ता न लगाने पर बड़ी कोफ़्त होती है। पाबंदियों के बावजूद मेरी उंगलियां नुक़्ते पर पहुंच ही जाती हैं। दिल मानता ही नहीं, जिसने बचपन से उर्दू पड़ी हो, जिसके घर में उर्दू का माहौल रहा हो, जिसके घर में खाने-पीने और पहनने तक में उर्दू का इस्तेमाल होता हो, वो खुद को बेबस महसूस न करे, तो क्या करे। लेकिन मजबूर ये हालात इधर भी हैं और उधर भी हैं। अफ़सोस ये है कि उर्दू पहले भी बेबस थी, लेकिन नुक़्ते के चक्कर में दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ज़ुबान ख़ुद को अपाहिज महसूस करने लगी है। शायद कोई तो ऐसा आयेगा जो उर्दू का दर्द समझेगा।
7 Responses
  1. खान साहेब आपका दर्द जायज़ है, लेकिन कई बार चाह कर भी हम जहाँ लगाना हो वहां नुक़्ता नहीं लगा पाते... पूछिए क्यूँ ? वो इसलिए क्यूँ की ट्रांसलेटर कम्बख्त इसकी इजाज़त ही नहीं देता...अल्फाज़ की इज्ज़त लुटती रहती है और हम बेबस देखते रह जाते हैं...कंप्यूटर, जितना कुछ हमें आता है, अपनी मजबूरी बता देता है...और हम ठंडी सांस भर कर ये सोचते रह जाते हैं की चलो कुछ नहीं से तो बिना नुक़्ता लफ्ज़ ही सही पठकों तक पहुँच तो रहा है...
    नीरज


  2. बॉस ने कहा है तो करना पड़ेगा भाई पर दुख तो है कि क्या करें बॉस इस आलवेज़ राइट, और बेवकूफ ही दुनिया चला रहे हैं जो नुक़्ते न लगा पाने की कमी की वजह से जानकारों को भी अपने जैसे बना रहे हैं।


  3. Sajjad Says:

    MULAYZA FARMAYA AAPNE


  4. ashish jain Says:

    कहते है बुरी चीज़ का अंत जल्द होता है ,नुक्ता के सन्दर्भ में कहूँगा की यह भाषा की अवमानना है ,शब्दों का चरित्र बदल जाएगा ,यह हताशा की बात है की यह जो हो रहा है वो कोई छोटी मोटी संस्था नहीं ,बल्कि एक न्यूज़ चैनल है ,..आशीष जैन


  5. sangeeta Says:

    बिल्कुल सही कहा आपने मगर आज जिस जगह हम है वहां नुक्ते की क्या किसी की भी कोई इज्ज़त नहीं है...लेकिन कम से कम नुक्ते को ये तो संतोष है की कुछ लोग उसका दर्द समझते है....


  6. Khoobsurat nuktacheeni

    Jagmohan Rai


  7. आपकी इस रचना को पढ़कर मुझे एक कहानी याद आई गई...जिसमें एक राजा अपनी प्रजा का चेहरा अपने जैसा करवा देता है ताकि जब उसके साम्राज्य पर हमला हो तो दुश्मन असल राजा को पहचान न सकें...वो राजा बेहद बदसूरत था और उसकी इस सोच ने खुबसूरत लोगों को भी अपनी शक्ल दे दी.. नुक्ता न लगाकर गलती की गुंजाइश को कम का तर्क...वैसा ही जैसा अपने कुनबे की कमजोरी छिपाने की खातिर...उर्दू के खुबसूरत चेहरे पर अपना बदसूरत चेहरा लगा देना... लेकिन कोई नहीं उर्दू की गरिमा इससे कहीं उपर है जो उसके मुरीद और जानकार वो जरुर उसका ख्याल रखते हैं....