अबयज़ ख़ान
उत्तर प्रदेश से तो सभी वाकिफ़ हैं.. उसी का एक हिस्सा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश... धन-दौलत से मालामाल... गन्ना किसानों से भरपूर इस इलाके में पैसे की कोई कमी नहीं... रईसी इस इलाके की रग-रग में बसी है... उसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक ज़िला है बिजनौर... इस ज़िले का शुमार सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे ज़िलों में किया जाता है। सबसे ज्यादा सरकारी नौकरीपेशा इसी ज़िले से हैं... बिजनौर ज़िले में ही मौजूद है तहसील चांदपुर... बेहतरीन कस्बा.. शानदार कस्बा... नफ़ासत पसंदों का छोटा सा शहर.. तहज़ीब की चादर ओढ़े.. इस कस्बे में यूं तो हर शख्स खुशहाल है... लेकिन इसी कस्बे में एक मासूम भी है... अज़ीजुर्रहमान का बेटा शकूर... 14-15 साल का एक बच्चा... मासूम इसलिए.. क्योंकि उसपर जमाने ने सितम ढाए... लेकिन उसने उफ़ तक न की... घरवालों ने उसे बेड़ियों में जकड़ दिया... लेकिन उसकी ज़ुबान से कोई अल्फाज़ तक न निकला.. हां अपनी खामोश निगाहों से वो लोगों से इल्तिज़ा ज़रूर करता है.. लोगों को हसरत भरी निगाहों से भी देखता है..

लेकिन दुनिया बड़ी बेदर्द है.. और उस पर तरस खाने वाला कोई नहीं है... बचपन से बेड़ियों में जकड़े इस मासूम के घर की दीवारें भी उसके घरवालों की मुफ़लिसी को बयां करती हैं... सर्दी में भी उसके जिस्म पर एक निकर और एक फटी टी-शर्ट है.. खुले आंगन में ठंड से ठिठुरते उस बच्चे की परवाह शायद किसी को नहीं है... कच्चे घर की कच्ची दीवारों के बीच बेड़ियों में जकड़े शकूर के लिए तो ज़िंदगी किसी नरक से कम नहीं होगी... होश संभालने के बाद उस बदनसीब ने तो सुबह का सूरज बेड़ियों में ही देखा है... उसका दाना-पानी से लेकर सोने, गाने तक सबकुछ बेड़ियों में कट जाता है... लेकिन न तो बेरहम मां-बाप को तरस आता है... न उसके नाते-रिश्तेदारों को... लोग आते हैं.. उसका तमाशा देखते हैं.. और ऊल-जलूल से मशविरे देकर चले जाते हैं... बच्चे आते हैं उसे पत्थर मारकर चले जाते हैं... वो मौहल्ले भर के लिए तमाशा है.. और सब तमाशाई बन जाते हैं... तो कुछ लोग उससे डरे-सहमे उसके पास से भी गुज़रने पर खौफ़ खाते हैं...

इक्कीसवीं सदी में जीने वाले उस मासूम पर भी तरस नहीं खाते.. जिसे न तो अपना होशो-हवास है और न दुनिया का... लेकिन तरस तो उसके मां-बाप पर भी आता है. जो दकियानूसी बातों में पढ़कर अपने बेटे की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं... उन नासमझों को किसी ने बता दिया, कि उनका बेटा बीमार है.. उस पर हवा का असर है... उसे भूत-प्रेतों से बचाना होगा... उस पर जिन्नातों का असर है...और उसे पंद्रह साल तक बेड़ियों से बांधकर रखो, तो वो ठीक हो जाएगा... बस उस दिन से उस बच्चे की ज़िंदगी जहन्नुम की मानिंद हो गई... अपने जिगर के टुकड़े को सीने से लगाने वाले मां-बाप ने ही उसके गले में फंदा डाल दिया... इतना होता, तो भी सब्र था... उस नन्हीं जान के गले में फंदा डाला गया.. फिर उसे एक लकड़ी के खंभे से बांध दिया गया.. उसके बाद उस खंभे को ज़मीन में खूंटे की तरह गाड़ दिया... बेज़ुबान बच्चा बेज़ुबान जानवर की तरह खूंटे से बंध गया... जितनी बार वो अपने सिर को हिलाता.. रस्सी उसके गले में निशान बना देती.. फिर उसका सिर ज़ोर से उस लकड़ी के खंभे में लगता... लेकिन वो बच्चा अपना दर्द किससे कहे... और कैसे कहे...

सब देख रहे हैं.. लेकिन उसके दर्द को समझने के बजाए उस पर हंस रहे हैं.. तालियां पीट रहे हैं... भूख लगने पर उसे खाना भी किसी जानवर से बदतर तरीके से परोसा जाता है... सचमुच ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मी पर देखता होगा... मेरे बंदे कितने गधे हैं, ये तो सोचता होगा... औलाद के जन्म से पहले जो मां-बाप नीम-हकीमों से लेकर पीर फकीरों तक फरियाद लगा रहे थे.. अब बच्चे की परवरिश के लिए वही मां-बाप फिर उन्हीं नीम-हकीमों और पीर फकीरों के बताए रास्ते पर चल रहे हैं... 13 साल से वो मासूम जानवरों की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा है... लेकिन मुल्ला और पंडित अपनी रोज़ी-रोटी चमकाने के लिए उसकी जान से खेल रहे हैं.... बेज़ुबान शकूर मजबूर है...अक्ल से भी और बंदिशों से भी... लोग उसे पागल कहते हैं... लेकिन हकीकत में पागल तो वो लोग हैं.. जो उसकी नादानी पर हंसते हैं.. जो उस पर पत्थर मारकर चले जाते हैं... जो उसके साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं... उसके मां-बाप को कौन समझाए, कि उसका इलाज बेड़ियां नहीं है.. बल्कि उसे एक अच्छे डॉक्टर की ज़रूरत है, उसे एक प्यारे मां-बाप की ज़रूरत है और उसे ढेर सारे प्यार की ज़रूरत है, ...
अबयज़ ख़ान
कड़कड़ाती सर्दी हो और एक गर्म चाय की प्याली हो तो कहने ही क्या... लेकिन चाय की चुस्कियां रोमांच भरी हों, तो गर्म चाय का मज़ा भी दोगुना हो जाता है... अक्सर आपने भी रज़ाई में दुबककर मूंगफली खाते हुए चाय की चुस्कियां ज़रूर ली होंगी... गुलाबी सर्दी में चाय की ये चुस्कियां सर्दियों की रातों को रूमानी बना देती हैं... ख़ासकर तब जब आप पुरानी यादों में खोये हुए हों.. और कानो में पुराने गाने गूंज रहे हों तो कहने ही क्या... सूरज की पहली किरन के साथ चाय की प्याली से उठती हुई भांप हो और साथ में गर्मागर्म बटर टोस्ट हो, तो उसका लुत्फ़ ही अलग है... लेकिन जिस चाय का जिक्र यहां होने वाला है, वो चाय औरों से ज़रा हटकर है...

वादियों के बीच इस चाय का ज़ायका आपके मुंह को ऐसा लगेगा, कि बस पूछिए मत... दिल से बस यही निकलेगा... वाह चाय..! घर के बाहर आपने होटल या किसी खोमचे पर चाय की चुस्कियां ज़रूर ली होंगी.. लेकिन आप मेरे साथ चलिए समंदर से 3018 मीटर की ऊंचाई पर... हिमालय से सटे बद्रीनाथ... भारत के आखिरी गांव माणा में... जहां चार से पांच डिग्री के टेम्परेचर में चाय पीने का अपना अलग ही मज़ा है... बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर आगे एक चाय की दुकान... जहां से बिना इजाज़त आगे जाना गैरकानूनी है... जहां पहुंचने के लिए आपको कठिन चढ़ाई का सामना करना पड़ेगा.. बर्फ़ की हसीन वादियों से घिरे इस इलाके में कई मंदिर भी हैं...

भारत-चीन सीमा पर बर्फीली सड़क के बीचों-बीच बसे इस गांव में है चाय की एक ख़ास दुकान... जहां अगर आपने एक बार चाय पी ली, तो वो ताउम्र याद रखेगी... न सिर्फ ज़ायके के लिए बल्कि अपनी एक और ख़ासियत के लिए... भारत के आखिरी छोर पर मौजूद इस दुकान का नाम ही पड़ गया, "भारत में चाय की आखिरी दुकान" कड़ाके की ठंड और सफ़र की थकान इस दुकान की एक गर्मागर्म चाय की प्याली से पलभर में छूमंतर हो जाएगी...

दरअसल माणा गांव में ही रहने वाले दिलबर सिंह और उसके भाई की माली हालत जब ख़स्ता होने लगी, तो उन्होंने 1981 में इस इलाके में एक चाय की दुकान खोलने का फैसला किया... और दुकान खोलने के लिए उन्होंने चुनाव किया माणा गांव के सबसे ऊपर व्यास गुफा के पास... जिसके आगे है चीन जाने के लिए बर्फीली सड़क... शुरुआत में कामकाज हल्का ही रहा, लेकिन फिर इस दुकान ने ऐसी रफ्तार पकड़ी, कि जिसने भी माणा पहुंचकर इस चाय की चुस्कियां लीं, उसने इसकी तारीफ़ों के कसीदे पड़ना शुरु कर दिये...और फिर दिलबर सिंह का धंधा चोखा हो गया...

खास बात ये है कि यहां दार्जिलिंग और असम की कड़क चाय मिलती है, तो साथ ही खास हर्बल, तुलसी और घी वाली चाय भी मौजूद है... एडवेंचर के शौकीन लोग जब इस इलाके से गुज़रते हैं, तो भारत में चाय की इस आखिरी दुकान पर आना नहीं भूलते...लेकिन इस दुकान के साथ एक और खास बात जुड़ी है, वो ये कि जब बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, तभी इस दुकान की रौनक होती है, और जब बद्रीनाथ के कपाट बंद होते हैं, तभी इस दुकान के दरवाज़े भी छह महीने के लिए बंद हो जाते हैं... मतलब साफ़ है कि अगर आप इतनी रोमांचक चाय पीना चाहते हैं, तो आपको बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान के दौरान ही यहां का रुख करना होगा... ज़िंदगी में जब कभी मौका मिले... और अगर अगली बार आप बद्रीनाथ के दर्शनों का प्रोग्राम बना रहे हैं, तो एक बार इस दुकान के दर्शन भी ज़रूर कीजिए... वरना आपको ताउम्र इसका मलाल रहेगा, कि आपने "भारत में चाय की आखिरी दुकान" पर चाय की चुस्कियां नहीं लीं...
अबयज़ ख़ान
रंगीन टीवी पर फिल्म चल रही है राजा हिंदुस्तानी... हर कोई मग्न होकर फिल्म देखने में लगा है... एक शॉट् में हीरो आमिर खान करिश्मा कपूर का चुंबन लेता है... और सीटियां बजने लगती हैं... नाइनटीज़ के आखिर में किसी हिंदी फिल्म का ये सबसे लंबा चुंबन सीन था... आशिकों के दिलों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं... लड़कियां लरज़ती हुई अपना चेहरा छिपा लेती हैं.... घड़ी रात का एक बजा रही है... आंखे नींद के आगोश में जा रही हैं... तभी कोई आवाज़ लगाता है... अरे कोई लड़की उठकर चाय बना ला... चाय का नाम सुनकर लड़कियां इधर-उधर दुबकने लगती हैं... क्योंकि एक तो रज़ाई में से निकलकर चूल्हा जलाने का अलकस, उसपर फिल्म के छूट जाने का डर... लेकिन बड़े बुज़ुर्गों के आगे उनकी एक न चलती... मरती क्या न करतीं चाय तो बनाना ही पड़ेगी और वो भी एक-दो नहीं, कम से कम तीस-चालीस लोगों के लिए... वो भी बड़ा सा भगोना भरकर...जिसमें चाय, दूध और पानी का संगम होगा... जिसे चाय कम जोशांदा कहा जाए तो शायद ठीक होगा...

नवंबर 1997 की बात है... जब टीवी का चलन बहुत कम घरों में था... और रंगीन टीवी तो खासकर कम देखने को मिलता था। ज्यादातर घरों में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी ही था। टीवी पर फिल्में तो वैसे भी हफ्ते में दो दिन शनिवार और रविवार को ही आती थी... लेकिन क्या करें बिजली आती नहीं थी, तो फिल्म भला कहां देखने को मिलती। लेकिन फिल्म देखने के शौकीनों ने एक ज़रिया निकाल लिया था.. वीसीआर पर फिल्में देखने का। लेकिन इस वीसीआर पर फिल्म देखने का असली मज़ा तो शादियों के दौरान आता था... घर में शादी के बाद जब काम-धाम निपट जाता था और घर में कुछ रिश्तेदार मेहमान ही बच जाते थे, तो शादी की अगली रात को वीसीआर चलाया जाता था। वीसीआर चलता कम था उसका हल्ला ज्यादा होता था। पूरे मौहल्ले भर को पता चल जाता था कि आज फलां घर में वीसीआर चलेगा... बाकायदा किराए पर वीसीआर मंगाया जाता था.. शादी के घर में जनरेटर तो होता ही था, सो लाइट की कोई फिक्र नहीं होती थी।

एक रात में वीसीआर पर तीन फिल्में चलती थीं। इस दौरान इश्किया मिज़ाज लड़कों की चांदी हो जाती थी, ज़रा किसी लड़की ने वीसीआर का जिक्र छेड़ा, जनाब जुट गये वीसीआर का इंतज़ाम करने में। और तो लड़कियों से उनकी फ़रमाइश भी पूछी जाती थी। शोले हर किसी की फरमाइश में सबसे ऊपर होती थी। वीसीआर चलने से पहले ही घर के सारे काम निपटा लिये जाते। इधर घर के बढ़े-बूढे़ सोने गये, उधर शुरु हो गया वीसीआर पर सनीमा... नवंबर की कड़कड़ाती रात थी और वीसीआर पर शुरु हुआ फिल्मों का दौर। पहली फिल्म चली राजा हिंदुस्तानी... तब ये फिल्म रिलीज़ ही हुई थी। घर के सभी लोग आंगन में दरी-गद्दा बिछाकर बैठे थे... ऊपर से लोगों ने टैंट हाउस से आये लिहाफ़ भी लपेट लिये थे। गाना बजा आये हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बनके.. एक ड्राइवर से एक अमीर बाप की बेटी का प्यार... एक मिडिल क्लास के लिए इससे बढ़िया स्टोरी भला और क्या हो सकती थी।

बस फिर क्या था, लड़के खुद को सपने में आमिर खान और लड़कियां खुद को करिश्मा कपूर समझने लगीं। और उनके मां-बाप एक दूसरे के लिए खलनायक...। फिल्म देखते-देखते सपनों में अपनी दुनिया बसाने लगे। फिल्म की पूरी स्टोरी ख्यालों-ख्वाबों में उतर जाती। तीन फिल्मों के बीच में हर फिल्म के बाद इंटरवल होता था। इस दौरान चाय का दौर चलता था। लड़कियां चाय बनाने बावर्चीखाने में पहुंची, पीछे से मटरगश्ती करते हुए मजनू मियां भी कतार में लग जाते थे। अगर गलती से ऑपरेटर ने फिल्म लगा दी, फिर देखिए चाय बनाने वाली का गुस्सा... हमारे बिना आये तुमने फिल्म कैसे चला दी, पता नहीं है, हम चाय बना रहे हैं। बेचारे को फिल्म फिर से लगाना पड़ती थी। इस दौरान ऑपरेटर साहब का भी बड़ा रुतबा होता था, टीवी पर फिल्म लगाकर जनाब खुद तो एक कोने में दुबक जाते थे, लेकिन कोई उनको सोने दे तब न...

शोर मचता था.. अरे तस्वीर तो आ नहीं रही है... अरे इसकी आवाज़ कहां चली गई...? सबसे ज्यादा मज़ा तब आता था, जब कैसेट बीच में फंस जाती थी... बेचारे ऑपरेटर को नींद से उठकर आके फिर से वीसीआर को सैट करना पड़ता था। पहली फिल्म के बाद आधे लोग तो सो जाते थे और तीसरी फिल्म तक तो इक्के-दुक्के लोग ही टीवी सैट पर नज़रे चिपकाए होते थे। लेकिन इस दौरान आशिक मिजा़ज अपनी टांकेबाज़ी को बखूबी अंजाम देने में कामयाब रहते थे। अरे भाई फिर फिल्म देखने का फायदा ही क्या हुआ... फिल्म कौन कमबख्त देखने आया था... असली मकसद तो बारात में आई लड़की से टांका भिड़ाना था। लड़की ने अगर मुस्कुरा कर उनसे बात कर ली, तो समझो भाईजान का रतजगा कामयाब हो गया। सुबह मौहल्ले में सबसे ज्यादा सीना उन्हीं का चौड़ा होता था। लेकिन इस दौरान कुछ कमबख्त ऐसे भी होते थे, जो फिल्म तो कम देखते थे, लेकिन दूसरों की जासूसी करने में लगे रहते थे और सुबह की पौ फटने से पहले भांडा फोड़ दिया करते थे। खैर अब न तो वीसीआर रहा, न पहले जैसे सुनहरे दिन.. अब तो फिल्म से लेकर प्यार-मौहब्बत तक सबकुछ हाईटेक हो गया है।
अबयज़ ख़ान

छड़े हो जी... इस सवाल को सुनकर जैसे कुछ समझ ही नहीं आया... छड़े का मतलब... हमने तो अबतक छड़ी के बारे में ही सुना था... लेकिन ये छड़े क्या है? अरे मेरा मतलब है शादी हुई है या नहीं..? मेरा मतलब कुंवारे हो क्या..? जी मैंने कहा... माफ़ करना जी फिर हम आपको कमरा नहीं दे सकते... हमें फैमिली वालों को ही अपना घर देना है... छड़ों को नहीं देते... ठीक है जैसी आपकी मर्ज़ी... मैंने मकान मालिक को शुक्रिया कहा... और वापस लौट आया... मकान भले ही न मिला हो.. लेकिन एक अल्फ़ाज़ के बारे में जानने का मौका और मिल गया... छड़े... यानि कुंवारे...दिल्ली, हरियाणा, नोएडा, गाज़ियाबाद और मगरिबी सूबे उत्तर प्रदेश में इस तरह की बोलचाल आम है.. अगर आप किराए पर मकान लेने जाएंगे तो ये सवाल आपसे सबसे पहले पूछा जाएगा.... मकान की तलाश के दौरान अक्सर ऐसे ही सवालों से दो-चार होना पड़ता है... कई बार तो सवालों की बौछार इस तरह होती है, जिससे कुछ देर के लिए आपको ऐसा लगेगा कि शायद आपने कोई जुर्म किया है और आपसे पूछताछ हो रही है...

तमाम तरह के सवालात और आपको शक की निगाहों से देखना... कहां के रहने वाले हो..? काम क्या करते हो? नाम क्या है? कितने लोग रहोगे? इससे पहले कहां रहते थे.? पुराना मकान क्यों छोड़ रहे हो..? इस शहर में तुम्हे कोई जानता है या नहीं.? तुम्हारे घर में कौन-कौन रहता है...? वगैरह-वगैरह। अगर आप इन टेढ़े-मेढ़े सवालों का जवाब देकर इस इम्तिहान को पास कर गये, तो समझो आपको मकान मिल गया। लेकिन आपकी टेंशन अभी यहीं ख़त्म नहीं हुई। अभी तो ढेर सारी शर्तें हैं जिनसे आपको दो-चार होना पड़ेगा। देखिये अगर घर में रहना है तो नॉनवेज नहीं चलेगा.. यार-दोस्त नहीं आयेंगे... बिजली का बिल अलग से आयेगा, बावजूद इसके लाइट कम जलाओगे.. प्रेस नहीं करोगे.. वॉशिंग मशीन नहीं चलेगी... रात को जल्दी आना होगा... ज्यादा शोर-शराबा नहीं होना चाहिए... ऐसा लगता है जैसे आपको मकान किराए पर नहीं मिल रहा है, बल्कि मान मालिक आपको मुफ्त में मकान दे रहा है।

बाप-रे-बाप इतनी शर्तें और इतने सवाल.. अगर इतनी तैयारी यूपीएससी के एक्ज़ाम में कर लेते.. तो सेकेंड क्लास अफ़सर तो ज़रूर बन जाते। और अगर आपने गलती से बता दिया कि भईया मैं पत्रकार हूं... आपको किसी तरह की तकलीफ़ नहीं होगी, तो समझो आपको मिलता हुआ कमरा भी हाथ से गया। लेकिन अभी आपकी परेशानियां यहीं ख़त्म नहीं हुई हैं। मकान दिलाने के लिए आपने जिन भाईसाहब की मदद ली थी, अभी तो उनका रोल बाकी था। दरअसल चार साल पहले मेरे साथ ऐसा हुआ कि मैंने एक दुकानदार भाई से पूछ लिया कि भईया यहां कोई मकान किराए पर मिल सकता है। इतना सुनना था कि जनाब की बांछे खिल गईं... अरे क्यों नहीं भाई साहब... ज़रूर मिल जाएगा... मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं... जिनका मकान किराए के लिए खाली है... जनाब ने सबसे पहले मुझे पानी पिलाया... और फिर अपनी मीठी-मीठी बातों से आईने में उतार लिया। मुझे लगा कि इस अंजान शहर में इतने शरीफ़ लोग भी रहते हैं... अल्लाह इनका भला करे।

बस भाई साहब ने अपनी दुकान बंद की और मुझे मकान दिखाने ले गये.. कई मकान दिखाए, जिसमें से एक मुझे पसंद आ गया। इसके बाद, बात हुई किराए की, मकान मालिक ने बड़ा सा मुंह खोला। भला हो दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स का... मकान का किराया भी आसमान पर पहुंच गया। चार हज़ार रुपये का किराया सुनकर झटका सा लगा। हमारे रामपुर शहर में तो चार हज़ार रुपये में नवाब साहब का किला भी किराए पर मिल जाएगा.. फिर ये पचास गज़ में बना दो कमरों का कबूतरखाना और किराया चार हज़ार रुपये। बात इतने तक होती, तब भी ठीक था... इसके बाद जो भाईसाहब हमें मकान दिलाने ले गये थे उन्होने भी मुंह खोल दिया... नकली हंसी निकालकर बोले... हें..हें..हें.. एक महीने का किराया मुझे भी देना होगा... ये मेरा कमीशन है। एक महीने का आप से लेंगे और एक महीने का मकान मालिक से।

इतना सुनकर मेरी तो आंखे फटी रह गईं... अबतक जिन्हे हम अजनबी शहर में अपना अज़ीज़ समझ रहे थे एक झटके में ही वो हमारे लिए दलाल बन गये। समझ नहीं आ रहा था, कि थोड़ी देर पहले हमने इन्हें जो झोली भरकर दुआएं दी थीं, उनका क्या करें.. वापस भी नहीं ले सकते। अब इन्हें गालियां दें... या अपने लुटने पर शर्मिंदा हों... मुफ्त में जेब पर एक महीने का डाका पड़ रहा था। लेकिन वो सेर थे तो हम भी सवा सेर थे... बोल दिया हमें मकान नहीं चाहिए और भाई साहब से पिंड छुड़ाकर निकल गये। फिर चार-पांच दिन बाद हम उसी मकान में पहुंचे... मकान मालिक से बात की कि जनाब मकान चाहिए और अगर उनको बीच में डाला, तो दोनों को ही एक-एक महीने का चूना लगेगा... आप चाहें तो मकान दे सकते हैं... मकान मालिक को भी फायदे का सौदा लगा... और मकान की चाभी हमारे हाथ में सौंप दी.. मकान तो किराए पर मिल गया.. लेकिन इस दौरान जिन दिक्कतों से गुज़रना पड़ा उसकी टीस आज भी बाकी है।
अबयज़ ख़ान

आखिरी विदाई का वक्त था, तो माहौल थोड़ा ग़मगीन होना लाज़िमी था... जिसे अपने खून पसीने से सींचकर आशियां बनाया था, वो डेढ़ साल में ही ज़मीदोज हो गया... जिन सपनो में पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की थी, उन्हे एक झटके में ही किसी ने कतर डाला था... तमाम किले बनाए थे... तूफ़ानों से लड़कर अपनी ज़िंदगी का क़तरा-क़तरा कुर्बान किया था.. उसकी एक-एक चीज़ को सहेजकर ऐसे सजाया था, जैसे कोई मां अपनी बेटी के लिए दहेज़ का सामान जुटाती है... एक चैनल से दूसरे चैनल तक ज़िंदगी में कुछ करने का जज़्बा था... दफ्तर में कलीग एक-दूसरे को देखकर जी रहे थे... हर किसी के मन में कुछ नया करने का जज्बा, खासकर उन लोगों के दिल में जिन्होने अभी जर्नलिज्म के पेशे में कदम ही रखा था... जो मीडिया की चमक-दमक देखकर मैनेजमेंट, आईटी, मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे कई ट्रेडिश्नल करियर को बायबाय करके आये थे, लेकिन उनको जो तजुर्बा हुआ उसके बाद तो वो शायद अपने बच्चों को भी कभी इस प्रोफेशन में न आने दें...

उनके सपनो का बुलबुला तो पल भर में बिखर गया था... मुझे अच्छी तरह याद है जब उन लोगों को ऑफ़र लेटर मिले थे, तो उनके चेहरे पर खुशी साफ़ पड़ी जा सकती थी, उनमें काम सीखने की कैसी ललक थी, एक-एक बात को वो बार-बार पूछने आते थे... वो चाहते थे, कि जल्दी-जल्दी सबकुछ सीख जाएं... लेकिन चार महीने में ही उनके सारे ख्वाब चकनाचूर हो गये.. मीडिया की कड़वी हकीकत से वो लोग इतनी जल्दी रूबरू हो जाएंगे, ऐसा तो उन्होने सपने में भी नहीं सोचा होगा... क्या-क्या प्लान बनाए होंगे अपनी ज़िंदगी को लेकर... लेकिन इसमें उन बेचारों का क्या कसूर है... कसूर तो कुकुरमुतों की तरह उगे उन इंस्टीट्यट का है, जिन्होने मीडिया की झूठी चमक-दमक दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठ लिए...

वॉयस ऑफ़ इंडिया... यही नाम था उस न्यूज़ चैनल का...था इसलिए क्योंकि अब वो तारीख बन चुका है.. अब उसे लोग सिर्फ़ याद करेंगे... उसके सिवा शायद किसी के पास कोई ऑप्शन भी नहीं होगा.. हम ख़बर हैं बाकी सब भ्रम है.... यही उसकी पंचिंग लाईन थी.. बड़े शहरों में, चौराहों से लेकर मेट्रो स्टेशन तक.. हर कहीं उसके अजीब से विज्ञापन वाले बोर्ड नज़र आते थे... लेकिन एक साल में ही हम ख़बर बन गये.. जब चैनल शुरु हुआ था... तो दूसरे चैनलों की धड़कनें तेज़ हो गईं थी.. हर कोई चाहता था, कि उसे एक बार इस चैनल में काम करने का मौका मिल जाए.. लोगों ने बड़ी तिकड़मे भिड़ाईं कि किसी तरह उनका सपना सच हो जाए.. बस एक बार उन्हें भी वॉयस ऑफ़ इंडिया में काम करने का मौका मिल जाए.. जिनका सपना पूरा हुआ वो खुद को खुशनसीब समझते थे... लेकिन जो बदनसीब यहां तक नहीं पहुंच पाए वो आज खुद को खुशनसीब समझते हैं...

अफ़सोस ये कि आज वो लोग भी हमें फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते जो कल तक फोन पर नौकरी लगवाने की गुहार लगाते थे... मैं खुद ऐसे बहुत सारे लोगों को जानता हूं, जो मुझे फोनकर कहते थे, कि बस यार एक बार बात करवा दो.. किसी बॉस से मिलवा दो.. आज वही लोग खुद को हमसे बड़ा और समझदार साबित करने की कोशिश करते हैं... ऐसा नहीं है कि हमारी किस्मत कोयले से लिखी है, और दूसरी जगह काम करने वाले सोने से अपनी किस्मत लिखवाकर आये हैं... या वीओआई में काम करने वाले सभी लोगों की किस्मत एक साथ खराब हो गई.... वीओआई में काम करने के लिए लोगों ने कई बड़े चैनल्स छोड़ दिये। वीओआई में काम करने वालों में भी कोई कमी नहीं हैं। उनके ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहे हैं। ऐसे में वीओआई में काम करने वालों को हिकारत की नज़र से देखना भला कहां की समझदारी है।

कौन नहीं जानता कि इस दौर में कई बड़े चैनल होने का दावा करने वालों को पसीने आ गये... और उन्होने चुपचाप अपने एम्पलॉयज़ को बाहर का रास्ता दिखा दिया... और तो और उन्होने अपने एम्पलॉयज़ को प्रमोशन और इँक्रीमेंट तक नहीं दिया... लेकिन जिनके घर शीशे के हैं वो भी हमारे ऊपर पत्थर उछाल रहे हैं...ये जानते हुए भी कि इससे उनके घर में भी दरारें आयेंगीं... कौन जानता था, कि हिंदुस्तान की तीसरे नंबर की सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम का इतना बुरा हाल होगा... चाहे एफ़एमसीजी हो, एयरलाईन हो या शेयर मार्केट में काम करने वाली दूसरी बड़ी कंपनियां हों.. हर कोई मंदी की मार से जूझ रहा था... अगर चैनल डूबा तो इसकी एक बड़ी वजह तो यही थी, कि ये ऐसे वक्त में लॉंच हुआ जब बाज़ार में मंदी का आलम था.. मार्केट से रेवेन्यु आया नहीं और चैनल लॉस में जाता रहा.. वरना चालीस ओबी वैन के साथ शुरु हुए इस चैनल की इतनी जल्दी ऐसी हालत हो जाएगी, इसका तो किसी को भी गुमान नहीं था...

अपने करियर को हर कोई चार चांद लगाना चाहता है... जो लोग भी वॉयस ऑफ़ इंडिया में आए, वो बड़े लोगों को देखकर ही आए... लेकिन आज लोग हमें बिन मांगे सलाह दे रहे हैं, जो मदद तो नहीं कर सकते, लेकिन चुटकियां ज़रूर ले रहे हैं... आज वीओआई में जो कुछ हुआ, या उसके लोगों के साथ जो कुछ हुआ वो तो ज़िंदगी का एक हिस्सा है, और ऐसा नहीं है कि जो लोग आज हंस रहे हैं, कल उनकी ज़िंदगी में ऐसे दिन न आएं... लेकिन मुझे अफ़सोस उन लोगों के लिए है जिन्होने वीओआई के साथ सपने बुन लिए... अफ़सोस उन लोगों के लिए है, जिन्होने यहां पर अपना घर-परिवार तक बसा लिया... अफ़सोस उन लोगों के लिए है, जिन्होने वीओआई के भरोसे लोन लेकर मकान खरीद लिये.. उनके सामने तो एक तरफ़ कुआं और दूसरी तरफ़ खाई है.. वैसे भी महानगरों में रहने वालों की आधी ज़िंदगी तो किस्तों में कट जाती है... लेकिन ऐसा नहीं है कि सब दिन एक समान होते हैं, कभी के दिन बड़े होते हैं, तो कभी की रातें बड़ी होती हैं.. और वैसे भी अंधेरे के बाद ही सूरज निकलता है... खुदा या भगवान तो सबका होता है.. अगर उसने दुनिया में भेजा है, तो रोज़ी-रोटी का इतज़ाम करना उसकी ज़िम्मेदारी है... चलते-चलते बिन मांगी सलाह उन लोगों के लिए है, जो मीडिया को अपना प्रोफेशन बनाने जा रहे हैं... कोई भी कदम बढ़ाने से पहले एक बार वॉयस ऑफ़ इंडिया का इतिहास ज़रूर पढ़ लेना...
अबयज़ ख़ान

ईद ख़त्म हो चुकी थी और अब घर से दिल्ली रवानगी का वक्त करीब आ रहा था। अम्मी ने बैग में करीब-करीब सारा सामान बांध दिया था। कपड़ों और किताबों के अलावा खाने का भी कुछ सामान बैग में था। फिर वो सुबह भी आई जब दिल्ली जाने का वक्त आया। घर से निकलते वक्त तमाम हिदायतें भी मिलीं। किसी से फालतू दोस्ती मत करना, रास्ते में कुछ खाना मत... वगैरह..वगैरह। अलसुबह हम बस में सवार हुए, घर से कोई सीधी बस दिल्ली नहीं जाती थी, इसलिए हमेशा की तरह पहले मुरादाबाद की बस ली, वहां से आगे दिल्ली की बस में सवार होना था। मुरादाबाद पहुंचे तो दिल्ली की बस भी तैयार मिल गई। अभी तक सफ़र बड़े आराम से कट रहा था। सफ़र लम्बा था, इसलिए मैंने सोचा क्यों न झपकी ही ले ली जाए।

लेकिन एक घंटे के बाद ही अचानक बस रुक गई, मालूम हुआ, कि बस एक रोडसाइड ढाबे पर रुकी है। दिल्ली के रास्ते में पड़ने वाले एक ढाबे पर.... कुछ नाम भी लिखा था, उस पर शायद वैष्णव ढाबा। किसी भी हाईवे या सड़क से आप गुज़र जाईये... थोड़ी-थोड़ी दूर पर आपको कुकुरमुत्तों की तरह उगे ऐसे हज़ारों ढाबे मिल जाएंगे। जिन पर लिखा होता है... काके दा ढाबा, पम्मी दा ढाबा, शेरे पंजाब ढाबा, माता वैष्णो ढाबा, गुलशन ढाबा, मुस्लिम ढाबा वगैरह वगैरह... कुछ ढाबे तो बाकायदा इस बात का दावा करते हैं, कि वो फलाने परिवहन निगम से अनुबंधित हैं। नेशनल हाईवे-24 की सुनसान सड़क के ऐसे ही एक ढाबे पर ड्राइवर ने यूपी रोडवेज़ की बस रोक दी। बस रोकने के बाद ढाबे वाले के साथ ही ड्राईवर और कंडक्टर भी आवाज़ लगा रहे थे, जिस किसी को कुछ खाना-पीना है, वो खाले... अभी आधे घंटे बस ढाबे पर रुकेगी... किसी को टॉयलेट बाथरूम जाना है, वो जा सकता है। एक-एक कर सारी सवारियां बस से नीचे उतर गईं।

ढाबे वाला आवाज लगा रहा था... बीस रुपये में भरपेट खाना खाइये। बीस रुपये की थाली है, जिसमें दाल-चावल रोटी, सब्ज़ी, रायता और अचार मिलेगा। हर कोई अपने-अपने अंदाज़ में आवाज़ लगा रहा था, ग्राहकों को लुभाने की या यूं कहें बेवकूफ बनाने की भरपूर कोशिश की जा रही थी। खाना तो मेरे बैग में ही था, जो अम्मी ने घर से चलते वक्त बनाकर दिया था, तो मैंने सोचा कि चलो एक कप चाय ही पी ली जाए, कुछ सुस्ती ही उतर जाएगी। आगे बढ़कर चाय वाले से एक चाय ली, जो पांच रुपये की थी। लेकिन उस चाय को मुंह में रखते ही ऐसा लगा जैसे कोई बदबूदार और कड़वी चीज़ मुंह में डाल ली हो, चाय के स्वाद से लगा, जैसे ये कई दिन पुरानी हो, उसका ज़ायका बयान करने लायक नहीं है। मैंने फौरन ही चाय पास ही कूड़ेदान में फेंक दी... चाय वाले से उसकी शिकायत की, तो ऐसा लगा जैसे वो मेरे ऊपर चढ़ बैठेगा। लेकिन इस अजनबी जगह में मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा, और अपने पांच रुपये पर अफ़सोस कर बस में वापस आकर बैठ गया।


लेकिन थोड़ी देर बाद अचानक फिर कुछ शोर सा सुनाई दिया। मारो-मारो साले को... आवाज़ सुनकर मैं भी नीचे उतर गया। भीड़ में कुछ लोग एक आदमी को पीट रहे थे और वो बेचारा बचाने की गुहार लगा रहा था... जब वो लोग मारकर चलते बने तो मैंने उससे हमदर्दी के बतौर पूछा... भाई साहब क्या हुआ, ये लोग आपको क्यों मार रहे थे?? इतना कहते ही उस बेचारे की रुलाई फूट पड़ी। कहने लगा भईया हमें क्या पता था... ये लोग चिल्ला रहे थे बीस रुपये में भरपेट खाना खाओ। मैं भी खाने बैठ गया, लेकिन खाने खाने के बाद ये लोग खाने का डेढ़ सौ रुपया मांग रहे थे। हमने कहा भईया आप तो बीस रुपये में आवाज़ लगा रहे थे, तो कहने लगे ज्यादा जबान मत लड़ा... चल पैसे निकाल... मैंने कहा, मैं बीस से ज्यादा नहीं दूंगा... तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाकर लूट रहे हो... बस इतना कहना था.. कि सारे लोग मुझे चिपट गये और मुझे मारने लगे। इतना सुनते ही मेरे बदन में कंपकपी छूट गई... मैंने सोचा मैं बड़ा खुशनसीब था, नहीं तो शायद वो चाय वाला मेरी भी ऐसी ही हालत करता। ये तो तस्वीर सिर्फ़ एक ढाबे की है, लेकिन सड़कों के किनारे पर बने ऐसे सैकड़ों-हज़ारों ढाबों का यही हाल है।

इन ढाबों पर बसों के ड्राईवर और कंडक्टर तो मुफ्त में खाना खाते हैं, लेकिन उसके बदले में उनकी सवारियों को बुरी तरह लूटा जाता है। अवैध तरीके से खुले इन ढाबों पर न तो पुलिस छापा मारती है और न ही प्रशासन कोई कार्रवाई करता है। जनता लुटती रहे तो उनकी बला से। उनका हफ्ता बंधा होता है जो तय वक्त पर उनके पास पहुंच जाता है। ढाबे वाले सवारियों से न सिर्फ़ मनमाने दाम वसूलते हैं, बल्कि उनके साथ बाउसरों और गुंडो की एक टीम भी होती है, जो आनाकानी करने वालों को मार-मार कर सबक सिखा देते हैं। उस आधे घंटे के दौरान ढाबे वालों का बस चले तो सवारियों के कपड़े उतार ले। हर चीज़ के दाम बाज़ार से तिगुने और चौगुने वसूले जाते हैं, और जो कोई रेट को लेकर एतराज़ करता है, उसे उनके मुस्टंडे अच्छी तरह से आटे-दाल का भाव समझा देते हैं। जनता आखिर करे भी तो क्या... सरकारें तो गूंगी-बहरी हैं।
अबयज़ ख़ान
पिता और पति.. दुनिया के किसी भी समाज के लिए इनकी वेल्यू एक जैसी ही है... एक मर्द की तमाम ज़िंदगी इन दो अल्फ़ाज़ों का बोझ ढोते-ढोते गुज़र जाती है... समाज में जब रिश्तों को नाम देने का चलन आया होगा, तो किसी को इस बात का गुमान नहीं होगा, कि जितने छोटे ये अल्फ़ाज हैं, उससे दस गुना ज्यादा बड़ी इनकी ज़िम्मेदारी होगी। आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको अल्फाज़ों की बाजीगरी सिखाने की कोशिश कर रहा हूं... लेकिन मेरा ऐसा मकसद कतई नहीं है... मेरी कोशिश होती है, कि हर बार कुछ अलग सा लिखूं, बहुत दिन से कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं... लेकिन मंदी की मार ने इन दो अल्फ़ाज़ों पर ही लिखने को मजबूर कर दिया..

हुआ यूं कि जब मंदी की मार ने एक पूरे दफ्तर को ही तबाह कर दिया, तो बुरे वक्त में साथी ही एक-दूसरे को दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे। हमेशा की तरह मैं टेंशन से दूर रहकर माहौल को हल्का करने की कोशिश कर रहा था... लोग एक दूसरे के साथ हमदर्दी के दो बोल बोलकर साथियों का गम बांट रहे थे। जो लोग अपना घर-बार छोड़कर दिल्ली जैसे अजनबी शहर में थे उनके साथ हमदर्दी कुछ ज्यादा थी। बातचीत के दौरान ऑफिस में ही मेरी एक साथी के मुंह से निकला, यार हम लड़कियों का तो कुछ नहीं, किसी तरह एडजस्ट कर लेंगे, लेकिन तुम लड़कों का क्या होगा... जो घर से दूर एक अजनबी शहर में अपने सपनो का घर बसाने आये थे। उसकी इस बात पर मुझे हंसी आ गई.. मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा, कि हां तुम सही कहती हो, लड़कियों को तो गॉड गिफ्ट मिला है, उनको तो कोई पालनहार मिल ही जाता है...

बचपन से जवानी तक पिता के कंधों पर ज़िम्मेदारी... और जवानी के बाद ये ज़िम्मेदारी बेचारे पति नाम के प्राणी पर आ जाती है। सिर्फ़ हिंदी की एक मात्रा का फर्क है...गौर से देखिए तो पिता में प पर लगने वाली छोटी इ की मात्रा... लड़की के जवान होते-होते पति के त पर लग जाती है... और ये छोटा सा लफ्ज बोझा ढोते-ढोते कमान बन जाता है... लेकिन तीर निशाने पर ही लगता है... अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते ये छोटा सा अल्फ़ाज़ आगे जाकर फिर पति से पिता बन जाता है... और ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है... पति बनकर पहले अपनी हमशीरा के नाज़-नखरे उठाना... फिर जब एक वक्त बाद आपके घर में किलकारियां गूंजने लगती हैं.. तो फिर दूसरी ज़िम्मेदारी आपके सामने हाथ फैलाकर खड़ी होती है... मंदी के इस दौर में अगर एक लड़की की नौकरी चली भी जाती है, तो क्या फर्क पड़ता है..

मां-बाप कुछ दिन बाद अपनी लाडली बिटिया के एक लिए सुंदर सुशील गृहकार्य दक्ष लड़का ढूंढ ही लाते हैं... और मान लीजिए लड़की का रिश्ता जिस लड़के से तय हुआ है, अगर उसकी नौकरी चली जाती है, तो बेचारे गरीब को तो नौकरी के साथ-साथ छोकरी से भी हाथ धोना पड़ता है... फिर चाहे लड़का लाख मिन्नतें करे, लेकिन कोई उस बदनसीब को एक मौका देने को तैयार नहीं होता... हारकर बेचारे को फिर उतरना पड़ता है एक और अग्नि-परीक्षा के लिए। हालांकि कुछ लड़कियां बहुत खुद्दार भी होती हैं, जो चाहती हैं कि वो भी कमाकर अपने हाथ-पैरों पर खड़ी हों और उनके सपनों की भी एक दुनिया हो, लेकिन पति उनको भी ऐसा ही चाहिए जो खूब कमाता हो, जिसका अपना बंग्ला हो, गाड़ी हो, बैंक-बेलेंस हो, जो शादी के बाद हनीमून पर उन्हें विदेश की सैर कराए, और जो उनके सपनों को पंख लगा सके।

क्या है कोई ऐसी लड़की जो किसी निकम्मे लड़के को अपना दूल्हा बनाएगी? या है कोई ऐसा परिवार जो किसी निकट्ठू को अपना दामाद बनाएगा? चाहे लड़की नौकरीपेशा ही क्यों न हो, चाहे उसका परिवार करोड़ो में ही क्यों न खेलता हो। जवाब होगा नहीं.. क्योंकि समाज ने ऐसी परंपरा बना दी है। और इसका पालन वो लोग भी सीना ठोंककर करते हैं, जो समाज में बदलाव की बात करते हैं। पिता और पति के ये दोनो कैरेक्टर लड़कियों के लिए इकॉनॉमिक सपोर्टर का रोल ही नहीं निभाते, बल्कि उन्हे तो उनके सिक्योरिटी गार्ड का रोल भी निभाना पड़ता है... पहले पिता अपनी बेटी के साथ साया बनकर चलता है, फिर मियां अपनी बेगम को ज़माने भर की निगाहों से बचाने में लगे रहते हैं। हालांकि मैं खुद इससे इत्तेफाक नहीं रखता, क्योंकि आज की लड़कियां इतनी कमज़ोर नहीं हैं, कि उन्हे किसी सिक्योरिटी गार्ड की ज़रूरत पड़े... इसके लिए आदिम युग का वो समाज ज़िम्मेदार है, जिसने हमेशा उनकी आज़ादी पर लगाम लगाने की कोशिश की है। और मर्द ज़ात का खौफ दिखाकर उनके अरमानों का गला घोंटा है। हालांकि इसमें बेचारी लड़कियों का कोई दोष नहीं है, ये तो समाज ही इतना गब्दू है.. कि आज भी सब चलता है से आगे ही नहीं बढ़ना चाहता....।